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17 Feb 2021

कोई कहानी चाहिए

इतिहास जिसको पढ़ सके

जिसकी लकीरें गढ़ सके

जो हर दिशा में बढ़ सके ऐसी रवानी चाहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


हर घाव पर चंदन बने

हर आह पर क्रंदन बने

सपनें भले कम हों, नयन में ख़ूब पानी चाहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


जो चाँद को पहलू भरे

जो रात पर क़ाबू करे

छूकर हवा जिसको थमे, वह रातरानी चहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


रंगीन है हर ओढ़नी

खबरें हुई हैं सनसनी

इस गाँव को अब खेत में मेहंदी उगानी चाहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


हो चाँद पर बंगला जहाँ

बादल बने जंगला जहाँ

सब प्रेमियों को एक दुनिया आसमानी चाहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


हर ज्ञान, संयम खो चला

है भाग्यहीन शकुंतला

दुष्यंत को भूली हुई कोई निशानी चाहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


©मनीषा शुक्ला

31 Jan 2021

ग़लत होगा

सही, सही नहीं; ग़लत अगर ग़लत होगा

हवा के साथ चराग़ों का घर ग़लत होगा 

©मनीषा शुक्ला

30 Oct 2020

बदलाव

हमीं से आएगा बदलाव;
जिन पेड़ों ने धूप चखी हो, वे ही देंगे छाँव !

जिन नदियों ने सीखा है पत्थर की देह गलाना
उनके ज़िम्मे है पर्वत पर ताज़ा फूल खिलाना
धरती की चोटी में सजती जिन मेघों की बूँदें
उनके पीछे चलती है पुरवाई आँखें मूँदें

केवल सूरज से डरते हैं अँधियारों के गाँव !

जिनके माथे पर सजता है मेहनत का अंगारा
उन आँखों में ख़ुश रहता है हरदम मोती खारा
जिनकी रेखाओं के घिसने से है माटी, सोना
उन हाथों की बाँदी किस्मत, क्या पाना, क्या खोना

नापेंगे इक रोज़ अमरता छालों वाले पाँव !

हर टुकड़े में जिसने पूरा-पूरा सच दिखलाया
पूरी दिखती है जिसमें अंधी आँखों की छाया
अच्छे और बुरे का जिसमें शेष नहीं आकर्षण
छाया जिसका धर्म उसी को मानेगा जग 'दर्पण'

ऐसे दर्पण पर ख़ाली है हर पत्थर का दाँव !

©मनीषा शुक्ला



5 Apr 2017

अधूरा ख़्वाब

जो रह-रह कर उमड़ता है, वही सैलाब रक्खा है 

ज़रा सी आब रक्खी है, ज़रा सा ताब रक्खा है

अभी नींदों से कह दो मेरी आंखों में नहीं आएँ

मेरी पलकों के नीचे इक अधूरा ख़्वाब रक्खा है


©मनीषा शुक्ला