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4 Mar 2020

करोगे तब भी मुझसे प्यार?

करोगे तब भी मुझसे प्यार?
ढल जाएगा रूप, बदन पर रोएगा सिंगार!
करोगे तब भी मुझसे प्यार?

झुर्री वाला चाँद नहीं जब दरपन को भाएगा
नैनों के बदले नैनों से चश्मा टकराएगा
फिल्मी गीतों की धुन पर जब गाऊँगी चौपाई
ड्रेसिंग टेबल पर रक्खूँगी मरहम और दवाई
स्वेटर बुनने में बीतेगा मेरा हर इतवार!
करोगे तब भी मुझसे प्यार?

जब बालों से झाँकेगा थोड़ा-थोड़ा उजियारा
आँखों की झांईं से हारेगा काजल बेचारा
झीने-झीने सुर में थक कर जब कोयल गाएगी
धरकर हाथ कमर पर कोई नदिया सुस्ताएगी
एल्बम बनकर रह जाएगा सुधियों का संसार!
करोगे तब भी मुझसे प्यार?

गर तुमको, ठग लेगी मुझसे कोई उमर गुजरिया
फिर तो इश्क़-मुहब्बत, कच्चा सौदा है सांवरिया
सोच-समझ लो, फिर मत कहना, कर बैठे नादानी
सपनों की खेती में लगता है आँखों का पानी
क्या मुट्ठी में रख पाओगे, लम्हों की रफ्तार?
जताना तब ही मुझसे प्यार!

©मनीषा शुक्ला

31 Jan 2020

तुम्हारी जब-जब आई याद

तुम्हारी जब-जब आई याद!
मुस्कानों ने होंठ चखे, पाया आँखों का स्वाद,
तुम्हारी जब-जब आई याद!

जिन रस्तों ने हमको देखा मिलते और बिछड़ते
जिस नदिया ने गीत सुनाए आँजुर भरते-भरते
जिस पत्थर ने नाम हमारा बरसों तलक सहेजा
जिस बादल ने हम दोनों की ख़ातिर सावन भेजा
वो रस्ते, नदिया, पत्थर, वो बादल हों आबाद!
तुम्हारी फिर से आई याद!

मंदिर की देवी को रिश्वत वाले फूल चढ़ाएं
बूढ़े पीपल को थे बच्चों के सब नाम बताएं
जिस पुलिया पर बैठ किया हमने तय नक्शा घर का
सुनकर अपनी प्रेम कहानी, सीना उसका दरका
फिर भी मन के गठबंधन की रखते हैं मरजाद!
तुम्हीं को करके हर पल याद!

साथ तुम्हारे लगती दुनिया चलता-फिरता जादू
साथ तुम्हारे हमने रोएं केवल मीठे आँसू
गुँथ-गुँथ कर चोटी में थे तब लम्हें भी बतियाते
आज अकेलेपन में नैना, नैनों से घबराते
एक तुम्हारे पहले साथी! एक तुम्हारे बाद!
तुम्हारी कितनी आई याद!

©मनीषा शुक्ला

4 Nov 2019

ह्रदय चढाऊँ, तब मानोगे?

श्रद्धा की अनदेखी करके
अपना ही उपहास किया है
ईश्वर होकर लज्जित अपना
पूजन, व्रत, उपवास किया है
आँसू के कच्चे मोती का
आभूषण स्वीकार नहीं है
तो फिर तुमको पूजे जाने
का कोई अधिकार नहीं है
दरपन लेकर द्वार तुम्हारे आई हूँ, कब पहचानोगे ?
ह्रदय चढाऊँ, तब मानोगे?

प्रेम अगर परखा जाए तो
अग्नि-परीक्षा भी सह लेगा
और किसी तुलसी के मुख से
ख़ुद को, दुनिया से कह लेगा
लेकिन प्रश्न करेगा निश्चित
हर रघुकुल के सिंहासन से
किस धोबी का, कैसा हित था
एक सिया के निर्वासन से?
तन सोना है, मन है लोहा, पीर पराई क्या जानोगे ?
ह्रदय चढाऊँ, तब मानोगे?

कौन प्रमाण दिया करता है
प्राणों को जीवित होने का?
कैसे भोर छिपाए ज़ेवर
सूरज के पीले सोने का?
रजनीगंधा, देह चुरा ले
सबकुछ फिर भी गन्ध कहेगी
उगता हो या ढलता चंदा
किरण हमेशा किरण रहेगी
रातों से अंधियारा, दिन से धूप भला कैसे छानोगे ?
ह्रदय चढाऊँ, तब मानोगे?

आज अगर ठुकराओगे, कल
आलिंगन से मर जाएगा
और अगर ज़िद पर आया तो
जो कहता है, कर जाएगा
प्यासी धरती पर बरसेगा
तब सावन का सानी होगा
वरना बारिश का हर क़तरा
केवल पानी-पानी होगा
जब माटी का मोल न होगा, किसको जीवन वरदानोगे ?
ह्रदय चढाऊँ, तब मानोगे?

©मनीषा शुक्ला

29 Oct 2017

नभ की पीर लिए वसुधा को कोई सावन छू निकला


आज तुम्हारे दो नैनों का
हमको चुम्बन छू निकला
मन की देहरी को जैसे
भावों का आंगन छू निकला

आज नहीं आह्लाद है कोई, ना ही कोई उत्सव
बिना किसी त्यौहार भला क्यों गूँजे मन में कलरव
तन दमका कुंदन के जैसा
सांसे चंदन छू निकला

मिली भाग्य से हमको-तुमको इक जैसी रेखाएं
जन्म-जन्म में तुम्हे मिलें हम, तुमको ही हम पाएं
मिले हमें तुम, ज्यों प्राणों को
पूजन-तर्पण छू निकला

अनुष्ठान सी छुअन तुम्हारी, पत्थर भी हो पावन
देह छुई, साँसों को दे बैठे इक मधुर निवेदन
नभ की पीर लिए वसुधा को
कोई सावन छू निकला

© मनीषा शुक्ला

28 Aug 2017

प्यास का आदर

प्रीत के अनुप्रास का आदर किया
आज जल ने प्यास का आदर किया

नेह का सत्कार जब तुमने किया
उंगलियों ने थाम लीं तब उंगलियां
इक पहर तक थी अकेली नींद, अब
साथ इनके आस, सपने, लोरियां
चैन ने संत्रास का आदर किया
आज जल ने प्यास का आदर किया

हम विकलता के सजीले चित्र थे
और तुम तपलीन विश्वामित्र थे
हम अभागी भूमिजा युग-युग रहीं
तुम सदा श्रीराम थे, सौमित्र थे
धीर ने उच्छवास का आदर किया
आज जल ने प्यास का आदर किया

© मनीषा शुक्ला