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1 May 2020

चल रोप लें थोड़े सितारे

रात का मतलब अँधेरा ही न समझें पीढियां कल
जोत कर आकाश को चल रोप लें थोड़े सितारे

चाँदनी रिश्वत बिना कुछ भी नहीं करती यहाँ पर
इंच भर चढ़ती नहीं अब, हो गई है धूप अजगर
पर सुना है जुगनुओं में आज भी थोड़ी नमी है
एक विधवा साँझ को देते दिलासा, रोज़ जलकर
सीख जाएगी सियाही आँसुओं से बात करना
बस इसे काजल बनाकर बाँध आँखों के किनारे

गिर चुकी ईमान से, आँधी बनीं सारी हवाएँ
दे रही हैं मश्विरा, हम दीप से घर को बचाएँ
पेट भरना तो नहीं केवल ज़रूरत आदमी की
है ज़रूरी, धान के संग आज अँगारे उगाएँ
बदलियों के केश उलझा चाँद पूजें हम भला क्यों
आज करवाचौथ सोचे, आज यह पूनम विचारे

ये बयां है रोशनी का आँख में पलती रहेगी
आग का उबटन निशा की देह पर मलती रहेगी
एक चिन्गारी बड़ी नादान, उसने ठान ली है
जिस तरफ़ होगा अँधेरा, उस तरफ़ चलती रहेगी
वो न जागा, तो न होगी भोर, समझेगा उजाला
साथ सूरज के अगर मन डूब जाएँगे हमारे

© मनीषा शुक्ला

22 Apr 2019

परिचय

फिर मिले या मिल न पाए, जग! तुझे दीपित अँधेरा
मांग! परिचय मांग मेरा!

सूर्य से पहले जली हूँ, चाँद से पहले ढली हूँ
चूमकर पदचिन्ह अपने, नाश पथ पर मैं चली हूँ
मैं सृजन का वंश हूँ, मैं ही प्रलय की उत्तरा हूँ
सेज पर अंगार के सोई हुई मादक कली हूँ
प्राण में मेरे पलेगा मृत्यु का कोई चितेरा
मांग! परिचय मांग मेरा!

वेदना का मोल पाकर, पीर की टकसाल होकर
मैं सदा फूली-फली हूँ आंसुओं के बीज बोकर
एक जुगनू सा अकेला जल रहा मुझमें दिवाकर
जागते मुझमें गगन के दीप सारी रात सोकर
रोज़ मेरे नैन का काजल उगलता है सवेरा मांग!
परिचय मांग मेरा!

है ह्रदय में आग बाक़ी, मेघ नैनों में सँवरते
कंठ में पीड़ा बसी है, गीत अधरों पर उतरते
पीर का यह गाँव मैंने ही बसाया है, अभागे!
दो घड़ी सुख-चैन जिसकी छांव में आकर ठहरते
सृष्टि सारी मांगती जिस टूटते घर में बसेरा
मांग! परिचय मांग मेरा!

© मनीषा शुक्ला

18 Sept 2018

आंसुओं का व्यय

आंख को ये है शिकायत आंसुओं का व्यय बहुत है
मान रखने को सभी का होंठ का अभिनय बहुत है

जो हृदय की आंच पाकर, बन गया जल आज ईंधन
हो चलेगी बूंद रस की, जग-प्रलय का एक साधन
जो न पाएगी कहीं पर दो घड़ी सम्मान पीड़ा
तोड़ देगा आज आंसू भी नयन से मोह-बन्धन
मानते हैं हम कठिन है, धैर्य कम, पीड़ा अगिन है
ठान ले तो आंधियों पर, दूब का निश्चय बहुत है

भावना का रक्त है जो, व्यर्थ क्यों उसको बहाएं
पीर के इस मूलधन को, हो सके जितना; बचाएं
ये ज़रूरी है, दुलारें आज मन की वेदना को
यूं न हम सागर उछालें, प्यास से ही चूक जाएं
जो समझना चाह लेगा, बस वही मन थाह लेगा
है कथानक एक ही, पर बात के आशय बहुत हैं

शोर से कहनी भला क्या एक गूंगे की कहानी
भूलने वाला भला कब, याद रखता है निशानी?
जो सुखों की साधना है और दुख का एक साधन
वो ज़माने के लिए है, आंख का दो बूंद पानी
पीर का दर्शक रहा जो, नीर का ग्राहक बनेगा?
इस कुटिल संसार के व्यवहार पर संशय बहुत है

© मनीषा शुक्ला

5 Sept 2018

समय के वक्ष पर इतिहास

बस निराशा से भरी इक पौध कहकर मत भुलाओ
हम समय के वक्ष पर इतिहास लिखना चाहते हैं

हम संभलने के लिए सौ बार गिरना सीख लेंगे
आंसुओं की आंख में बन दीप तिरना सीख लेंगे
तुम हमें केवल सिखाओ कर्म से अभिमन्यु होना
काल के सब चक्रव्यूहों से उबरना सीख लेंगे
चीर-हरणों की कथाएं मत सुनाओ तुम हमें, हम
द्रौपदी का कृष्ण पर विश्वास लिखना चाहते हैं

चोट खाकर मरहमों का मान करते हम मिलेंगे
हर सफलता से नियति की मांग भरते हम मिलेंगे
तुम न मानों आज हमको भोर का संकेत कोई
कल इसी धरती तले इक सूर्य धरते हम मिलेंगे
आज विश्वामित्र बनकर तुम हमें बस राम कर दो
हम स्वयम ही भाग्य में वनवास लिखना चाहते हैं

हम तभी अर्जुन बनेंगे, द्रोण को जब हो भरोसा
फूलता-फलता नहीं वो पेड़ जिसने मूल कोसा
उस जगह आकर अंधेरा प्राण अपने त्याग देगा
है जहां पर आंधियों ने एक अदना दीप पोसा
तुम निरे संकल्प को बस पांव धरने दो धरा पर
हम सृजन के रूप में आकाश लिखना चाहते हैं

© मनीषा शुक्ला

4 Sept 2018

पीड़ा का संगम

आंसू में आंसू मिलने से पीड़ा का संगम होता है
औरों के संग रो लेने से, अपना भी दुःख कम होता है

हृदय लुटाया पीर कमाई, सबकी केवल एक कहानी
प्रेम नगर में सब दुखियारे, कैसा राजा, कैसी रानी
हर आंसू का स्वाद वही है, कैसा अपना, कौन पराया
दुःख तो केवल दुःख होता है, जिसके हिस्से, जैसा आया
चूम पसीने के माथे को, पुरवाई पाती है ठंडक
धरती को तर करने वाला बादल ख़ुद भी नम होता है

डूब रहे को अगर सहारा दे दे, तो तिनका तर जाए
जो मानव की पीड़ा लिख दे, गीत उसी के ईश्वर गाए
प्यासे अधरों को परसे बिन, पानी कैसे पुण्य कमाए
सावन में उतना सावन है, जितना धरती कण्ठ लगाए
भाग्य प्रतीक्षारत होता है, सिर्फ़ हथेली की आशा में
स्नेह भरा बस एक स्पर्श ही छाले का संयम होता है

अनबोला सुन लेने वाला, स्वयं कथानक हो जाता है
जो आंसू को जी लेता है, वो मुस्कानें बो जाता है
जो मन डाली से पत्ते की बिछुड़न का अवसाद चखेगा
उसको पाकर मोक्ष जिएगा, जीवन उसको याद रखेगा
उजियारे के रस्ते बिखरा हर इक तारा केवल जुगनू
अँधियारे को मिलने वाला दीपक सूरज-सम होता है

© मनीषा शुक्ला

19 Jul 2018

बस हमारे पाँव देखो!

ये न पूछो, किस तरह हम आ मिले हैं मंज़िलों से,
बस हमारे पाँव देखो!

चन्द्रमा नापो, हमारी पीर का अनुमान होगा
शूल का जीवन हमारे फूल से आसान होगा
हम लहर के वक्ष पर चलते हुए आए यहां तक
रेत पर भी तो हमारा श्रम भरा अनुदान होगा
ये न पूछो, किस तरह तूफ़ान से लड़ते रहे हम,
बस हमारी नाव देखो!

मान बैठे किस तरह तुम यह, सहज दिनमान होगा?
सूर्य निकला तो किसी रजनीश का अवसान होगा
रोशनी के आख़िरी कण से मिलो, मालूम होगा,
वो अगर थक जाएगी तो भोर का नुकसान होगा
ये न पूछो, एक प्राची ने तिमिर का क्या बिगाड़ा?
रजनियों के गाँव देखो!

है हमें विश्वास इक दिन, धीर का सम्मान होगा
लांछनों से कब कलंकित वीर का अभिमान होगा?
मंदिरों से आएगा सुनकर हमारी प्रार्थना जो
देवता चाहे न हो पर कम से कम इंसान होगा
ये न पूछो, एक बिरवा आस का क्या दे सका है?
सप्तवर्णी छाँव देखो!

© मनीषा शुक्ला

3 Jul 2018

कल कहीं भगवान होंगे

आज धरती पर उजाला बाँट कर दोषी हुए हम
आज प्रतिबंधित हुए हैं,कल हमीं प्रतिमान होंगे

आज है संदेह तुमको चमचमाते कुन्दनों पर
दंश का आरोप डाला है तुम्हीं ने चन्दनों पर
पर हमें स्वीकार हैं ये भाग्य के सारे छलावे
दोष रहता है शलभ का दीप के अभिनन्दनों पर
आज जो हम में घटित है, कल वही इतिहास होगा
आज निष्काषित हुए हैं, कल कहीं भगवान होंगे

हाँ! हमें स्वीकार हमने आँधियों को बरगलाया
बांध अनुशासन, हवा को भी इशारों पर चलाया
आज नीयत पर हमारी संशयों के बाण छोड़ो
कल इन्हीं चिंगारियों से पूछना, घर क्यों जलाया?
आज ढूंढो तुम हमारे आचरण में लाख अवगुण
कल धरा पर एक हम ही बुद्ध का अनुमान होंगे

रीतियाँ ऐसी रही हैं, विष बहुत सुकरात कम हैं
पाप तो है वंशवादी, पर यहाँ अभिजात कम हैं
रोक पाओगे बताओ किस तरह अन्याय जग में
आज भी जब रावणों से राम का अनुपात कम है
आज हम सच बोलने से दंड के भागी बने हैं
कल हमें उपलब्ध सब पूजन, सुयश, सम्मान होंगे

© मनीषा शुक्ला

18 May 2018

हों हमारे प्राण के प्यासे भले ही सूर्य सारे

हों हमारे प्राण के प्यासे भले ही सूर्य सारे
हम न मांगेंगे कभी भी छाँव अब वंशीवटों से

भिक्षुकों का क्या प्रयोजन, स्वर्ण के सम्मोहनों से
भूख का नाता रहा कब राजसी आयोजनों से
हम अभागों को रुचे हैं श्वास के अंतिम निवेदन
देह का नाता भला क्या स्वर्ग के आमन्त्रणों से
ढूंढना हमको नहीं आनन्द की अमरावती में
गन्ध आएगी हमारी सिर्फ़ शाश्वत मरघटों से

बोझ धरती का बढ़ाकर जी रहे, ये ही बहुत है
हम नहीं जग के, स्वयं के ही रहे, ये ही बहुत है
हम नहीं शंकर, गरल पीकर अमर हो जाएंगे जो
हम गरल होकर अमरता पी रहे, ये ही बहुत है
आग गोदी में सजाकर, क्यों छुएँ आकाशगंगा
प्यास लेकर लौट आए हम हमेशा पनघटों से

हम भला देवत्व पाकर, क्या करेंगे ये बताओ
देव मेरे! आदमी को, आदमी जैसा बनाओ
दो घड़ी ठहरो धरा पर भूल कर देवत्व सारा
और जीवन को ज़रा हो के मनुज जीकर दिखाओ
हो चलेगा प्रेम तुमको मृत्यु के एकांत से ही
ऊब जाओगे किसी दिन श्वास के इन जमघटों से

© मनीषा शुक्ला

17 Mar 2018

दीप धरती आ रही हूँ!

रात के निर्जीव तन में, प्राण भरती आ रही हूँ
दीप धरती आ रही हूँ!

भाग्य से होती पराजित, तो बहुत सत्कार होता
रो अगर देती घड़ी भर, मेघ पर उपकार होता
बुझ अगर जाती बरसती आंख में अंतिम समय भी
सीलती चिंगारियों का आग पर आभार होता
रजनियों की ताल पर लेकिन प्रभाती गा रही हूँ
दीप धरती आ रही हूँ!

मैं चुनौती सूर्य की हूँ, जुगनुओं की आन हूँ मैं
प्यास की अड़चन बनी हर बूंद का अभिमान हूँ मैं
मैं दिशाओं को करारा एक उत्तर भटकनों का
मृत्यु साधे वक्ष पर इक प्राण का वरदान हूँ मैं
आंधियों की राह में तिनके बिछाती जा रही हूँ
दीप धरती आ रही हूँ!

हैं अभागी बदलियां जो पीर का भावार्थ होती
रोज़ ख़ुद को ढूंढती हैं, रोज़ अपने-आप खोती
लहलहाएगी किसी दिन ये फ़सल छू कर अधर को
मैं नयन में बस इसी से मोतियों के खेत बोती
घुप अंधेरा चीरने को एक बाती ला रही हूँ
दीप धरती आ रही हूँ!

© मनीषा शुक्ला

15 Feb 2018

लड़कियाँ लिखने लगी हैं!

लड़कियाँ अच्छा-बुरा, लिखने लगी हैं!
देखकर अपनी लकीरें, नियति को पहचानती हैं

कुछ गल़ त हाने से पहल,कुछ गल़ त कब मानती हैं
ढूंढ़ने को रंग, भरकर कोर में आकाश सारा उड़ चली हैं,
तितलियों के सब ठिकाने जानती हैं
रात की नींदें उड़ा, लिखने लगी हैं!

अब नहीं बनना-सँवरना चाहती हैं लड़कियाँ ये
अब नहीं सौगंध भरना चाहती हैं लड़कियाँ ये
मांग कर पुरुषत्व से कोरा समर्पण नेह का; बस
प्रेम में इक बार पड़ना चाहती हैं लड़कियाँ ये
आँख से काजल चुरा, लिखने लगी हैं!

अब यही बदलाव इनका, जग हज़म करने लगा है
उत्तरों का भान ही तो प्रश्न कम करने लगा है
देखकर विश्वास इनका, डर चुकी हैं मान्यताएँ
अब इन्हें स्वीकार, जग का हर नियम करने लगा है
भाग्य में कुछ खुरदुरा, लिखने लगी है!

© मनीषा शुक्ला

8 Feb 2018

गीतगन्धा

तुम महादेवी, सुभद्रा, तुम हुई हो गीतगन्धा
आज फिर से गीत की नव कोंपलों को प्राण दे दो !

गोद खेले हैं तुम्हारी ये यमक, अनुप्रास सारे
श्वास-गति को छंद कर दो, हैं तुम्हें अभ्यास सारे
तुम जगी, तो जाग जाएंगी अभागी सर्जनाएँ
लौट जाएंगी अयोध्या, काटकर वनवास सारे
अब सयानी हो गई है, गीत-कुल की हर कुमारी
लक्ष्य के सन्धान तत्पर अर्जुनों को बाण दे दो!

जग कभी ना कर सकेगा, तुम स्वयं का मान कर लो
आंख में काजल नहीं, तुम आज थोड़ी आन भर लो
अग्नि कर लो चीर को तुम, छू नहीं पाए दुशासन
लेखनी आँचल बनाओ, शीश पर अभिमान धर लो
भावना के राम को जिसकी प्रतीक्षा है युगों से
तुम अहिल्या बन, समय को बस वही पाषाण दे दो!

मौन का अभिप्राय दुर्बलता न समझा जाए, बोलो!
ये पुरानी रीत है, जब कष्ट हो पलकें भिगो लो
न्याय कर दो आज अपनी भावनाओं का स्वयं ही
व्यंजना आशा लगाकर देखती है, होंठ खोलो
है अकथ वाल्मीकि से सीता सदा रामायणों की
कंठ से छूकर, स्वयं ही पीर को निर्वाण दे दो!

© मनीषा शुक्ला