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13 Jul 2020

मुक़र्रर था, मग़र मुमकिन नहीं था!



तुम्हारे बाद, तुमको भूल जाना
मुक़र्रर था, मग़र मुमकिन नहीं था!

©मनीषा शुक्ला

1 Jul 2020

चिकित्सक (Doctors' Day)



वो धरती पर मानवता का प्रथम उपासक होता है
उसका हर इक स्पर्श हमेशा जीवन रक्षक होता है
जीवन देने से मुश्किल है जीवन की रक्षा करना
इस धरती पर उस ईश्वर का रूप चिकित्सक होता है

©मनीषा शुक्ला

28 Jun 2020

प्यास



हरेक बूँद में दरिया ही नज़र आता था
हमारी प्यास को पानी ने यूँ तराश दिया

©मनीषा शुक्ला

26 Jun 2020

तुम गए जबसे

तुम गए जबसे, सुबह सूरज जलाना भूल बैठी
तुम गए तबसे, अंगीठी चाँद की ठंडी पड़ी है

तुम गए क्या, रात ने गेसू नहीं तबसे सँवारे
बिन तुम्हारे बोझ लगते हैं गगन को ये सितारे
तुम गए जबसे लहर ने होंठ अपने सी लिए हैं
तुम गए जबसे, नदी से दूर बैठे हैं किनारे

तुम गए जबसे, न कहती रात से कुछ रातरानी
तुम गए तबसे, बगीचे में हिना गूँगी खड़ी है

तुम गए तो खुशबुओं ने फूल से अनुबंध तोड़े
तितलियों ने रंग की कारीगरी के काम छोड़े
तुम गए जबसे, हवा ने पँख गिरवी रख दिए हैं
तुम गए, सब मंज़िलों ने रास्तों से हाथ जोड़े

तुम गए जबसे, न गाया गीत कोई भी हृदय से
तुम गए तबसे, अधर से बाँसुरी हरदिन लड़ी है

कर रहा मन ख़र्च कोई रोज़ तुमको याद करके
चुक गई है नींद सारी आँसुओं का ब्याज भरके
तुम गए हो, अब न तोड़ेंगी कभी उपवास आँखें
तुम गए, सब थम गया है, साँझ तक भी दिन न सरके

तुम गए जबसे, समय की देह नीली पड़ गई है
तुम गए तबसे, बहुत धीमी कलाई की घड़ी है

©मनीषा शुक्ला

15 Jun 2020

तुम्हारी यादों का सामान

तुम्हारी यादों का सामान
खिड़की को साँसे देता है, दीवारों को कान

हरजाई अख़बार कि जिससे घण्टों बतियाते हो
नासपिटी शतरंज, नहीं तुम जिससे उकताते हो
बैरी चश्मा पल भर को भी नैन न छोड़े ख़ाली
छूकर होंठ तुम्हारे आई चाय भरी ये प्याली
और तुम्हारी टेबल पर मुस्काता मीठा पान
तुम्हारी यादों का सामान

काट रही है बालकनी वनवास तुम्हारा दिन भर
गमले की चंपा की ख़ातिर सौत तुम्हारा दफ़्तर
अलग लगे दरवाज़े की घण्टी को छुअन तुम्हारी
और तुम्हारे बिन लगता है समय घड़ी को भारी
तुम लौटो तो आ जाती है घर में फिर से जान
तुम्हारी यादों का सामान

अधखुलती खिड़की से लिपटे पर्दे की उलझन में
तुम साँसों के चन्दन में, तुम नैनों के दरपन में
तुम तकिए की ख़ुश्बू में, तुम सिलवट में चादर की
तुम घर में, तुम में रहती है परछाईं इस घर की
नाम लिखी तख़्ती की भी है तुमसे ही पहचान
तुम्हारी यादों का सामान

©मनीषा शुक्ला

14 Jun 2020

ज़िन्दगी

ख़्वाब को ख़्वाब की मानिंद दिखाया होता
ज़िन्दगी! ढंग से जीना तो सिखाया होता

©मनीषा शुक्ला

12 Jun 2020

एहसास



किसी ख़ुश्बू के जैसा है तेरे एहसास का होना
तुझे पाना भी मुश्किल है, तुझे खोना भी मुश्किल है

©मनीषा शुक्ला

11 Jun 2020

तुम सँजो लो!

हर घड़ी जिसको लुटाती जा रही है भाग्यरेखा;
हो सके तो तुम सँजो लो!

जिस नयन में एक आँसू भी नहीं ठहरा ख़ुशी से
पढ़ रहे हैं होंठ जिसके, मंत्र तर्पण के अभी से
दान ऐसा; जो अखरता ही रहा बस याचना को
मौन ऐसा; कह न पाया बात अपनी जो किसी से

मर गया वह दुःख अभागा, आज भरकर आँख रो लो!
हो सके तो तुम सँजो लो!

एक सूरज के लिए जलता रहा आकाश सारा
और धरती माँगती ही रह गई कोई सितारा
बाँटनेवाला बहुत अनुदार अपनी भूमिका में
मिल गए दोनों जहाँ, पर दे न पाया वह किनारा

अब तुम्हीं बढ़कर ज़रा आकुल क्षितिज के पँख खोलो!
हो सके तो तुम सँजो लो!

अब समर्पित है तुम्हीं को, चाह लो या राह अपनी
धर्म ख़ुश्बू का बिखरना, कब उसे परवाह अपनी
तुम निठुर हो भी गए तो मन बनेगा आज बादल
ख़ूब बरसेंगे नयन जो सह न पाए दाह अपनी

आज इस गीले हृदय में प्रार्थना के बीज बो लो !
हो सके तो तुम सँजो लो!

©मनीषा शुक्ला

10 Jun 2020

कविता



‘कविता’ का काम समाज की संवेदनाओं को दुरुस्त करना है ।

©मनीषा शुक्ला

24 May 2020

हर किसी की आँख में है एक टुकड़ा घर



हर किसी की आँख में है एक टुकड़ा घर

पेट में ईंधन नहीं पर पैर चलते हैं
मंज़िलों की चाह में रस्ते मचलते हैं
दुधमुँहे को ख़ून देकर पालती ममता
धूप में तपते बदन को सालती ममता
रोटियों में देखती तस्वीर सपनों की
हाय! थकने ही न देती फ़िक़्र अपनों की
जीभ से बिखरे निवाले को उठाते जब
सीज जाता है सड़क का भी कलेजा तब
इस सफ़र को देख रोया मील का पत्थर

ख़ुद मुसाफ़िर हैं, बनाते दूसरों के घर
है थकन इनआम इनका, भूख है ज़ेवर
हर महल की नींव में, दीवार, ज़ीने में
हैं अजब ये लोग, हँसते हैं पसीने में
ज़िन्दगी है ख़्वाब, साँसे ही हकीक़त हैं
ये रहें ज़िंदा, यही इनकी ज़रूरत है
योजनाओं में हमेशा आख़िरी दिखता
शून्य, जिस पर देश का सारा गणित टिकता
गिनतियों में छूट जाता है यही अक्सर

पटरियों पर लाश 'शायद' आदमी की है
मौत से बदतर कहानी ज़िन्दगी की है
देह पर कुछ बोटियाँ जिनकी सलामत हैं
वो चुनावी वोट हैं, इतनी ग़नीमत है
लोग ज़िंदा थे, तरक़्क़ी बस यही तो थी
आदमी की ज़ात अब तक 'आदमी' तो थी
हर तरफ़ आँसू दिलासे को तरसते हैं
दीप जलते, फूल मातम पर बरसते हैं
हो गई छाती सियासत की बहुत ऊसर

©मनीषा शुक्ला

5 May 2020

उम्र भर तुमको गुनगुनाएंगे



मेरे गीतों में आ बसों हमदम
उम्र भर तुमको गुनगुनाएंगे

©मनीषा शुक्ला

4 May 2020

नींदों के घर यादों का हंगामा है



सपनों का दमन आँखें कैसे थामें
नींदों के घर यादों का हंगामा है

©मनीषा शुक्ला

3 May 2020

हमको तुमसे कहना है


दिल को हमसे, हमको तुमसे कहना है
इन सपनों को उन आँखों में रहना है

©मनीषा शुक्ला

1 May 2020

चल रोप लें थोड़े सितारे

रात का मतलब अँधेरा ही न समझें पीढियां कल
जोत कर आकाश को चल रोप लें थोड़े सितारे

चाँदनी रिश्वत बिना कुछ भी नहीं करती यहाँ पर
इंच भर चढ़ती नहीं अब, हो गई है धूप अजगर
पर सुना है जुगनुओं में आज भी थोड़ी नमी है
एक विधवा साँझ को देते दिलासा, रोज़ जलकर
सीख जाएगी सियाही आँसुओं से बात करना
बस इसे काजल बनाकर बाँध आँखों के किनारे

गिर चुकी ईमान से, आँधी बनीं सारी हवाएँ
दे रही हैं मश्विरा, हम दीप से घर को बचाएँ
पेट भरना तो नहीं केवल ज़रूरत आदमी की
है ज़रूरी, धान के संग आज अँगारे उगाएँ
बदलियों के केश उलझा चाँद पूजें हम भला क्यों
आज करवाचौथ सोचे, आज यह पूनम विचारे

ये बयां है रोशनी का आँख में पलती रहेगी
आग का उबटन निशा की देह पर मलती रहेगी
एक चिन्गारी बड़ी नादान, उसने ठान ली है
जिस तरफ़ होगा अँधेरा, उस तरफ़ चलती रहेगी
वो न जागा, तो न होगी भोर, समझेगा उजाला
साथ सूरज के अगर मन डूब जाएँगे हमारे

© मनीषा शुक्ला

30 Apr 2020

मेरे ख्वाबों से मत भरो आँखें



मेरे ख्वाबों से मत भरो आँखें
ये तुम्हें रात भर जगाएंगे

©मनीषा शुक्ला

29 Apr 2020

अनबन



आज मेरी इन दो आँखों में फिर से थोड़ी अनबन है
एक ने तुमको देखा है और एक तुम्हारा दरपन है

© मनीषा शुक्ला

26 Apr 2020

बिछड़ने का वादा करना

बिछड़ने का वादा करना,
इतना भी आसान नहीं था, जीवन भर मरना!

जैसे कोई नाव बिछड़कर लहरों से पछताए
नदिया को तो पार करे पर तट पर डूबी जाए
गीली लकड़ी सा कोई जैसे मन को सुलगाए
तेल बिना बाती पर जैसे अँधियारा मुस्काए
पागल होकर परछाईं को बाँहों में भरना!

अम्बर के सीने में जैसे कोई चाँद छिपाए
भीतर जेठ तपे, जीने पर सावन शोर मचाए
अंगारा कोई जैसे शबनम की माँग सजाए
निरवंशी सपना कोई आँखों से प्रीत लगाए
अनरोया आँसू पलकों की कोरों पर धरना!

जिस पानी में आग नहीं वो कैसे प्यास बुझाए
मेघ बिना बदली, प्रिय बिन, विधवा मधुमास कहाए
बिन प्राणों के साँस किसी का जीवन क्या महकाए
हर पूजन का भाग्य कहाँ जो मनचाहा वर पाए
लेकिन तुम बिन क्या पाना, क्या खोने से डरना!

©मनीषा शुक्ला

20 Apr 2020

कविता



'कविता' मनुष्य के जीवन में घटित होने वाली सबसे नाज़ुक घटना है।

©मनीषा शुक्ला

17 Apr 2020

ज़िंदगी के सवालात थे

ज़िंदगी के सवालात थे, इसलिए लाजवाबी रही
सब मिला, सब गया छूटता, एक ये ही ख़राबी रही

पेट भरना सरल जब हुआ
भूख ने तब क्षमा माँग ली
प्रेम ने जब हृदय को छुआ
देह ने यातना माँग ली
चुक गई प्यास से दूध की हर नदी
एक लम्हे बिना, रो रही है सदी
भोर को चल न पाया पता, साँझ कितनी गुलाबी रही

ढल गई धूप, साए सभी
एड़ियों का बिछौना बने
आदमी की नियति है यही
खेलकर, फिर खिलौना बने
एक दिन जिस जगह से चला था कभी
ख़ूब दौड़े मग़र लौट आए वहीं
घट न पाया अँधेरा मग़र रौशनी बेहिसाबी रही

मुस्कुराहट रहे सींचते
आँसुओं का गला घोंटकर
ख़ुश दिखें, ख़ुश रहें ना रहें
ये सबक़ ही ग़लत था मग़र
हारकर जीतना, जीतकर हारना
जी सका ही न जो, क्या उसे मारना
अनुभवों की परीक्षा हुई, सीख लेकिन किताबी रही

©मनीषा शुक्ला

20 Mar 2020

दोषी ( निर्भया के लिए )

हम दोषी हैं!
हम लड़कियां सचमुच दोषी हैं!
हम अपनी ज़ात भूल जातीं हैं।
हम भूल जातीं हैं कि हम लड़कियां हैं
और इसीलिए हम समाज के किसी भी सवाल का जवाब ठीक-ठीक नहीं दे पातीं।
हम नहीं बता पातीं कि हम छोटे कपड़े क्यों पहनती हैं ?
हमें ये भी नहीं पता कि हम मेक-अप करके सुंदर क्यों दिखना चाहती हैं?
हम समझा ही नहीं पातीं कि हम रात साढ़े-बारह बजे सड़क पर क्यों घूम रही होती हैं?
हम अगर अकेले रात को घर से निकलीं तो पूछा जाता है -अकेले क्यों गई?
हम किसी पुरुष के साथ गईं तो पूछा जाता है
-उस पुरुष से हमारा सम्बन्ध क्या था?
हम लाजवाब हो जातीं हैं ये सुनकर कि इस समाज ने अधिकार दिया है
एक पिता (एडवोकेट ए. पी.सिंह) को अपनी बेटी पर पेट्रोल डालकर उसे ज़िंदा जला देने का।
हम समझ ही नहीं पातीं हैं कि सात साल बाद
हम पर हुए दानवीय अत्याचार के बदले हमें इंसाफ़ देने के बाद,
हमारे ही चरित्र को हथियार बना कर, अंतिम प्रहार हम पर ही क्यों किया जाता है?
हम नासमझ लड़कियां, समझा ही नहीं पातीं किसी को कि
"पँख वाली तितलियों का उड़ना अपराध क्यों नहीं होता है???"

©मनीषा शुक्ला