उनींदे नैन को कुछ लोरियां मां की बुलाती थी
रही जो सात फेरों की रसम बाकी बुलाती थी
लिपटकर आज सैनिक सरहदों से फूटकर रोया
उधर राखी बुलाती थी, इधर खाकी बुलाती थी
©मनीषा शुक्ला
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15 Aug 2019
2 Mar 2018
होली
प्रीत रंग अंग-अंग रंग दे रंगीले पिया
रोज़-रोज़ रंगना न भाए किसी रंग में
बन के रँगीली नार चलूं ऐसी चाल मैं, कि
परबत बल खाए मोरे अंग-अंग में
पग धरूं धरती में ऐसे इतरा के पिया
धूल भी उड़े है आज कनक के ढंग में
मुसकाउं मद में लुटाऊं ऐसे मुसकान
चाशनी मिला के रख दी हो जैसे भंग में
© मनीषा शुक्ला
रोज़-रोज़ रंगना न भाए किसी रंग में
बन के रँगीली नार चलूं ऐसी चाल मैं, कि
परबत बल खाए मोरे अंग-अंग में
पग धरूं धरती में ऐसे इतरा के पिया
धूल भी उड़े है आज कनक के ढंग में
मुसकाउं मद में लुटाऊं ऐसे मुसकान
चाशनी मिला के रख दी हो जैसे भंग में
© मनीषा शुक्ला
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