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6 Dec 2019

हैदराबाद बलात्कार प्रकरण

हैदराबाद पुलिस ने चारो को मार गिराया!!!
आप चाहें तो मुझे संवेदनहीन कह सकते हैं, पर दिल को बहुत ठंडक मिली इस ख़बर से। मुझे बड़ी ख़ुशी होती है जब संसद में एक पढ़ी-लिखी अभिनेत्री कहती है कि बलात्कार के आरोपियों को भीड़ के हवाले कर देना चाहिए। वे महिलाएं जो देश की ज़िम्मेदार नागरिक हैं, जो अपने संविधान को भली भाँति समझती हैं, जो मानवीय अधिकारों के बारे में अत्यंत जागरूक हैं, वे भी जब कहती हैं कि ऐसे बलात्कारियों की सरेआम लिंचिंग कर देनी चाहिए, तब मुझे अपने स्त्री होने पर अभिमान होता है । 
मग़र, मुझे सचमुच दुःख होता है उस पल जब सालों से अपने पुरुष साथी के साथ रह रही महिला, अचानक किसी दिन थाने पहुँचती है और कहती है कि उसके साथ ज़बरदस्ती की गई है। और इस बात का आभास होते ही वह थाने चली आई। मुझे दुःख होता है, जब भले ही किसी विवशता के अधीन होकर, कोई स्त्री अपने कार्यक्षेत्र पर अपने स्त्रीत्व के साथ समझौता करती है, किसी पुरुष को अधिकार देती है अपना शोषण करने का और सालों बाद फेसबुक और ट्विटर पर मीटू अभियान की प्रणेता बन जाती हैं। करोड़ो महिलाओं को जागरूक करने का ज़िम्मा उठाती है। उन्हें बताती है कि अगर आपके साथ ग़लत हुआ तो आओ और सोशल मीडिया की पंचायत में खुल कर रखो अपनी बात। और सबसे ज़्यादा दुःख मुझे तब होता है जब स्वयं को चरित्रवान साबित करने के लिए, एक स्त्री ही दूसरी स्त्री को चरित्रहीन साबित करना चाहती है। 
कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि इतनी जाँच-पड़ताल क्यों की जाती है? सीधी बात है, किसी औरत की अस्मत के साथ खिलवाड़ हुआ है, दोषी को तुरंत सज़ा मिलनी ही चाहिए। मग़र दिक़्क़त ये है कि क़ानून और समाज ये बहुत अच्छी तरह समझते हैं कि एक औरत का सबसे कमजोर पक्ष यदि उसका स्त्रीत्व है तो उसका सबसे मज़बूत हथियार भी यही है। एक स्त्री यदि अपनी देह के कारण पुरुष की कुदृष्टि की पात्र बन सकती है, तो इसी देह की आड़ लेकर वह किसी पुरुष का शोषण भी कर सकती है। 
इसलिए ये ज़रूरी कि हम इस भ्रम से ऊपर उठें कि हम स्त्री हैं तो हम ही सही हैं। इस निर्णयात्मक भावना से निकलें कि यदि किसी महिला ने शिक़ायत की है तो दोष पुरुष का ही होगा। इस सत्य को स्वीकार करें कि स्त्री होने से पहले हर स्त्री मनुष्य ही है, उसमें वो सभी ख़ामियाँ हो सकती हैं जो एक पुरुष में होती हैं। 
याद रखिए, समाज और न्यायिक प्रक्रिया से आप न्याय की अपेक्षा तभी कर सकती हैं, जब आप स्वयं अपराधी न हों। 

#एक_अनुरोध_मेरी_हर_महिला_पाठक_से
एक फ़िल्म है सेक्शन 375। IMDb पर 8.2 की रेटिंग है। ज़रूर देखिए! क्योंकि कई बार दर्पण देखना ज़रूरी होता है, सुंदर दिखने के लिए नहीं, सच देखने के लिए। 

©मनीषा शुक्ला

2 May 2019

बीमार सोच

अभी-अभी एक वीडियो देखी। जिसमें एक अधेड़ उम्र की महिला कुछ 20-25 साल की लड़कियों को अपने अनुभव की आंच पर पकी सीख दे रही है कि उन्हें "ढंग" के कपड़े पहनने चाहिए, अन्यथा महिलाओं के साथ होने वाली वारदातें जैसे बलात्कार आदि और भी ज़्यादा होंगे। वीडियो में लड़कियां महिला की इस बीमार सोच का पुरज़ोर विरोध करती दिख रही हैं। बहरहाल, महिला का तर्क उचित है या नहीं, इस पर कुछ कहने से पहले मैं इतना अवश्य कहना चाहूंगी कि वीडियो में लड़कियों द्वारा महिला के साथ किया गया व्यवहार देखकर बहुत निराशा हुई। ये वीडियो देखकर मुझे अनायास ही वो दिन याद आ गए जब मेरी माँ मुझे दुपट्टा ढंग से लेना सिखाती थी, इसलिए नहीं कि यदि मैंने दुपट्टा ढंग से लेना नहीं सीखा तो मेरे साथ कुछ ग़लत हो जाएगा, बल्कि इसलिए क्योंकि पुरुष और स्त्री की शारीरिक संरचना(केवल शारीरिक संरचना) का अंतर वह बख़ूबी जानती थी और मुझे भी वही समझाना चाहती थी। कई बार दिमाग़ की नसों पर पर्याप्त ज़ोर डालने के बाद भी मैं ये नहीं समझ पाती कि ऐसी कौन सी स्वतंत्रता है जो कपड़े उतारने से मिलती है? ऐसी कौन सी समानता है जो हम महिलाएं पुरुषों की नकल कर के हासिल करना चाहती हैं? मैं कभी भी पाश्चत्य परिधानों के विरोध में नहीं रही। न ही कभी पर्दे का समर्थन किया। मैं तो हमेशा से मानती हूँ कि अपने शरीर को कितना ढकना है, कितना दिखाना है, ये निर्णय मेरा होना चाहिए। मग़र मैं ये भी जानती हूँ कि ये निर्णय मेरे कम्फर्ट, मेरी सहूलियत के हिसाब से होना चाहिए। न कि दूसरों की दृष्टि में अपनी स्वतंत्रता या समानता सिद्ध करने के लिए। "महिलाओं को ये समझना चाहिए कि यदि कम कपड़े पहनना आपका अधिकार और स्वतन्त्रता है, तो आपको घूरने की हद तक घूरना पुरुषों की क्षमता और सामर्थ्य। अपनी वेश-भूषा, अपना व्यवहार ऐसा रखें कि करना चाहें या न करना चाहें, आपका सम्मान करना पुरुषों की विवशता बन जाए।" 

© मनीषा शुक्ला

1 Jan 2018

नव-वर्ष

दिक्क़त ये है कि हम गिरने के डर से चलने नहीं देना चाहते, हवाओं के डर से रोशनी छुपाते हैं, ग़लती हो जाने के डर से सही भी नहीं करने देते। जबकि ज़रूरत है विश्वास करने की। "मेरी लाडो का ख़्याल रखना"। हाथ जोड़कर एक वृद्ध व्यक्ति को अपने से आधे से भी बहुत कम उम्र के व्यक्ति से जब ऐसा कहते देखती हूँ , तो बहुत दुख होता है। उस पल मन विवश हो जाता है ये स्वीकारने को इन माता-पिता को अपने संस्कारों, अपनी परवरिश पर इतना भी भरोसा नहीं है कि इनका अंश अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकेगा। कम से कम अपने आप को खुश रख सकेगी इनकी बिटिया, ये भी भरोसा नहीं इन्हें। विदा होती लड़की को अगली सलाह उसकी मां से मिलती है "ससुराल ही तुम्हारा घर है"। अप्रत्यक्षतः वो ये कहना चाहती है कि हम से अब तुम्हारा कोई नाता नहीं। सही हों या ग़लत हों अब तुम्हारे ससुराल वाले ही तुम्हारे अपने हैं। काश हम अपनी बेटियों को विदा करते समय उनसे इतना भर कह पाते कि: "बेटी! अपनी सूझ-बूझ से, अपने संस्कारों से, अपनी समझ से जो तुम्हें ठीक लगे, वो करना। अगर तुम सही साबित हुई तो पूरी दुनिया तुम्हारे साथ होगी और अगर तुम ग़लत साबित हुई तो हम हर हाल में तुम्हारे साथ होंगे।" यक़ीन मानिए जिस दिन हम हमारी बेटियों को ऐसे संस्कार देंगे उस दिन इस देश में न तो कोई कन्या भ्रूण हत्या होगी, न तो बलात्कार होगा और न ही कोई औरत दहेज के लिए जलाई जाएगी। जिस दिन हम ये जान जाएंगी कि हम पर सबसे पहला अधिकार हमारा है उस दिन से हमारे साथ कुछ ग़लत न हो सकेगा। जिस दिन हम ये स्वीकार लेंगी कि हमें प्रसन्न रखना हमारी ज़िम्मेदारी है, उस दिन हम हर किसी को प्रसन्न रख सकेंगी। बदलाव तो ज़रूरी है। शुरू कहाँ से करना है, ये आप तय करें। आप सबका नव-वर्ष मंगलमय हो। कविता का कलरव आपके जीवन में बना रहे। प्रेम अपने पवित्रतम रूप में आपको प्राप्त हो। आंनद स्वयं आपके सानिध्य का याचक बनें। ईश्वर आपके हृदय में बसे। इन शुभकामनाओं के साथ... "हो सके तो नव-वर्ष सचमुच नूतन करें"। 

© मनीषा शुक्ला

11 Dec 2017

Women's Day

बहुत आधुनकि हूँ। विश्वास रखती हूं आत्म-निर्भरता में।कहीं न कहीं अपने-आपको पुरुष के समतुल्य भी मानती हूँ । मग़र जाने क्यों मुंशी प्रेमचंद जी के उपन्यास गोदान की इस एक पंक्ति को झुठला नहीं पाईं...
"पुरुष में नारी के गुण आ जाएं तो वह महात्मा हो जाता है और अगर नारी में पुरुष के गुण आ जाएं तो वह कुलटा हो जाती है"
यथार्थ है ये। जिन दो कृतियों को ईश्वर ने बराबर नहीं बनाया, जाने क्यों हम उन्हें बराबर करना चाहते हैं। कितना अच्छा हो अगर हम "स्त्री" को केवल स्त्री मानकर उसे उसका वांछित सम्मान दें। क्यों माने कि वो पुरुषों की तरह मज़बूत है? उसे उसकी कोमलता के लिए सम्मान क्यों न दें? क्यों ये कहें की वो पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चल सकती है? ये क्यों न माने की सम्पूर्ण विश्व-विजय कर लेने के बाद, दुनिया के सारे कष्टों पर विजय पा लेने के बाद, जब पुरुषार्थ श्रांत हो जाएगा तो उसके अश्रुओं का सत्कार करने के लिए एक स्त्री का स्त्रीत्व ही शेष होगा। हम ये क्यों नहीं मान लेते कि जब अपनी कटुता एक पुरुष से स्वयं न सही जाएगी तो एक स्त्री ही होगी जो उसके जीवन में प्रेम का मधुमास घोलेगी।
हम स्त्रियां जाने क्यों सबको विश्वास दिलाना चाहतीं हैं कि हम हर वो काम कर सकतीं हैं जो पुरुष कर सकतें हैं। हम ये क्यों नही कहतीं कि जो हम स्त्रियां कर सकतीं हैं वो तुम पुरुषों से किसी जन्म में नहीं होगा और इसलिए हमारा सम्मान करो। हमारा सम्मान इसलिए करो क्योंकि हम जैसी हैं, सम्मान की भागी हैं, इसलिए मत करो कि हम तुम पुरुषों जैसी हैं या हम तुमसे कम नहीं हैं। 
निरुत्तर हूँ अभी भी इस प्रश्न को लेकर कि
"एक स्त्री को केवल एक स्त्री बनकर रहने में कष्ट क्यों हैं और इस समाज को एक स्त्री को उसका यथोचित सम्मान देने में आपत्ति क्यों है???"

© मनीषा शुक्ला