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5 Apr 2018

आज अंतिम रात साथी

प्रेम के हर इक वचन की, आज अंतिम रात साथी
आज कुछ मत शेष रखना!

आज से ख़ुद पर जताना, तुम स्वयं अधिकार अपने
सौंप कर संकल्प सारे, हम चले संसार अपने
आज से हम हो रहे हैं, इक नदी के दो किनारे
आज अपनी बाँह में ही बांध लो अभिसार अपने
आज से केवल नयन में नेह के अवशेष रखना
आज कुछ मत शेष रखना!

चांद से अब मत उलझना, याद कर सूरत हमारी
अब नदी की चाल में मत ढूंढना कोई ख़ुमारी
अब नहीं रंगत परखना धूप से, कच्चे बदन की
अब हमारी ख़ुश्बुओं से हो चलेंगे फूल भारी
मात्र सुधियों में हमारे श्यामवर्णी केश रखना
आज कुछ मत शेष रखना!

देखकर पानी बरसता, आज से बस मन रिसेगा
अब हमेशा प्रेम के हर रूप पर दरपन हंसेगा
मेघ की लय पर सिसकती बूंद अब छम-से गिरेगी
आज जूड़े में ज़रा-सा अनमना सावन कसेगा
है कठिन अब बिजलियों के प्राण में आवेश रखना
आज कुछ मत शेष रखना!

© मनीषा शुक्ला

17 Jan 2018

आ मिलो अब मीत मुझसे!

लो, गईं संवेदनाएँ जीत मुझसे
मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!

है ज़रा-सा ही सही पर पे्रम का आभास अब
नीर नयनों का चला है, भोगने हर प्यास अब
तुम अगर कुछ कर सको मेरे लिए, इतना करो
इंच-भर सूरज अंधेरे की हथेली पर धरो
रौशनी क्यों लग रही भयभीत मुझसे?

मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!
कंठ तक अब आ गए हैं वेदना के स्वर प्रिये!
मैं भटकती नींद के संग, रात-भर बिस्तर लिए
आज आकुलता तुम्हारी बह रही है रक्त बन
आ बसे हैं आज मुझमें क्या तुम्हारे, प्राण-तन
हो रहा शायद तभी नवगीत मुझसे
मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!

हाय कैसे, तुम शिला से थे, निभाते प्रीत तब
मौन के द्वारे तिरस्कृत हो रहे थे मंत्र जब
प्रार्थना की हद हुई, पत्थर नहीं नीरज हुआ
उस घड़ी भी क्यों नहीं तुमसे विदा धीरज हुआ
जब नहीं ईश्वर हुआ अभिनीत मुझसे!
मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!

© मनीषा शुक्ला