इतिहास जिसको पढ़ सके
जिसकी लकीरें गढ़ सके
जो हर दिशा में बढ़ सके ऐसी रवानी चाहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
हर घाव पर चंदन बने
हर आह पर क्रंदन बने
सपनें भले कम हों, नयन में ख़ूब पानी चाहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
जो चाँद को पहलू भरे
जो रात पर क़ाबू करे
छूकर हवा जिसको थमे, वह रातरानी चहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
रंगीन है हर ओढ़नी
खबरें हुई हैं सनसनी
इस गाँव को अब खेत में मेहंदी उगानी चाहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
हो चाँद पर बंगला जहाँ
बादल बने जंगला जहाँ
सब प्रेमियों को एक दुनिया आसमानी चाहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
हर ज्ञान, संयम खो चला
है भाग्यहीन शकुंतला
दुष्यंत को भूली हुई कोई निशानी चाहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
©मनीषा शुक्ला
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17 Feb 2021
23 Jan 2021
अलग बात है
प्रेम करना अलग बात है, प्रेम पाना अलग बात है
युद्ध लड़ना अलग बात है, जीत जाना अलग बात है
है गगन तो सभी का मग़र, पँख सबको कहाँ मिल सके
नींद सबको मिली है मग़र, ख़्वाब सबके नहीं हैं पके
फूल खिलना अलग बात है, रंग आना अलग बात है
जीत बैठें मुक़दमा मग़र फैसला हक़ में आया नहीं
एक बंधन न टूटा कभी, एक जाए निभाया नहीं
रो न पाना अलग बात है, मुस्कुराना अलग बात है
एक छत चाहिए जो बने, एक टुकड़ा निजी आसमाँ
एक मलबा मिला है मग़र तोड़कर ख़्वाहिशों का मकां
ईंट-पत्थर अलग बात है, आशियाना अलग बात है
आँसुओं को भला किस तरह शब्द से कोई सिंगार दे
आह से आह कैसे जुड़े, टीस को क्या अलंकार दे
पीर सहना अलग बात है, गीत गाना अलग बात है
17 Apr 2020
ज़िंदगी के सवालात थे
ज़िंदगी के सवालात थे, इसलिए लाजवाबी रही
सब मिला, सब गया छूटता, एक ये ही ख़राबी रही
पेट भरना सरल जब हुआ
भूख ने तब क्षमा माँग ली
प्रेम ने जब हृदय को छुआ
देह ने यातना माँग ली
चुक गई प्यास से दूध की हर नदी
एक लम्हे बिना, रो रही है सदी
भोर को चल न पाया पता, साँझ कितनी गुलाबी रही
ढल गई धूप, साए सभी
एड़ियों का बिछौना बने
आदमी की नियति है यही
खेलकर, फिर खिलौना बने
एक दिन जिस जगह से चला था कभी
ख़ूब दौड़े मग़र लौट आए वहीं
घट न पाया अँधेरा मग़र रौशनी बेहिसाबी रही
मुस्कुराहट रहे सींचते
आँसुओं का गला घोंटकर
ख़ुश दिखें, ख़ुश रहें ना रहें
ये सबक़ ही ग़लत था मग़र
हारकर जीतना, जीतकर हारना
जी सका ही न जो, क्या उसे मारना
अनुभवों की परीक्षा हुई, सीख लेकिन किताबी रही
©मनीषा शुक्ला
सब मिला, सब गया छूटता, एक ये ही ख़राबी रही
पेट भरना सरल जब हुआ
भूख ने तब क्षमा माँग ली
प्रेम ने जब हृदय को छुआ
देह ने यातना माँग ली
चुक गई प्यास से दूध की हर नदी
एक लम्हे बिना, रो रही है सदी
भोर को चल न पाया पता, साँझ कितनी गुलाबी रही
ढल गई धूप, साए सभी
एड़ियों का बिछौना बने
आदमी की नियति है यही
खेलकर, फिर खिलौना बने
एक दिन जिस जगह से चला था कभी
ख़ूब दौड़े मग़र लौट आए वहीं
घट न पाया अँधेरा मग़र रौशनी बेहिसाबी रही
मुस्कुराहट रहे सींचते
आँसुओं का गला घोंटकर
ख़ुश दिखें, ख़ुश रहें ना रहें
ये सबक़ ही ग़लत था मग़र
हारकर जीतना, जीतकर हारना
जी सका ही न जो, क्या उसे मारना
अनुभवों की परीक्षा हुई, सीख लेकिन किताबी रही
©मनीषा शुक्ला
8 Aug 2019
नदी
इस नदी को नाव अपनी सौंपना मत आज नाविक!
इस नदी का है किसी तूफ़ान से नाता पुराना
इस नदी में मछलियाँ भी डूबकर मरती रही हैं
इस नदी से प्यास की परछाइयाँ डरती रही हैं
इस नदी ने रेत की सारी नमी नीलाम कर दी
रोज़, लहरें इस नदी की ख़ुदकशी करती रही हैं
इस नदी में है ज़माने की उदासी का ठिकाना
इस नदी का है किसी तूफ़ान से नाता पुराना
इस नदी के तीर पर लाशें मिलीं पतवार की कल
ये धधकती है निरंतर, इस नदी का आग है जल
इस नदी ने पोंछ डाले रेत के अनगिन घरौंदे
गर्भ से इसने गिराए मोतियों के सीप निर्बल
जानती ही ये नहीं तटबंध कोई भी निभाना
इस नदी का है किसी तूफ़ान से नाता पुराना
यह नदी पीती रही है मन्नतों के दीप सारे
इस नदी ने प्रार्थनाओं के सभी अवसर नकारे
इस नदी के कोर पर ठहरा दिवाकर रो रहा है
इस नदी में टूटते हैं भाग्य से हारे सितारे
ये न जाने प्रेम-पत्रों की अमिट स्याही पचाना
इस नदी का है किसी तूफ़ान से नाता पुराना
© मनीषा शुक्ला
इस नदी का है किसी तूफ़ान से नाता पुराना
इस नदी में मछलियाँ भी डूबकर मरती रही हैं
इस नदी से प्यास की परछाइयाँ डरती रही हैं
इस नदी ने रेत की सारी नमी नीलाम कर दी
रोज़, लहरें इस नदी की ख़ुदकशी करती रही हैं
इस नदी में है ज़माने की उदासी का ठिकाना
इस नदी का है किसी तूफ़ान से नाता पुराना
इस नदी के तीर पर लाशें मिलीं पतवार की कल
ये धधकती है निरंतर, इस नदी का आग है जल
इस नदी ने पोंछ डाले रेत के अनगिन घरौंदे
गर्भ से इसने गिराए मोतियों के सीप निर्बल
जानती ही ये नहीं तटबंध कोई भी निभाना
इस नदी का है किसी तूफ़ान से नाता पुराना
यह नदी पीती रही है मन्नतों के दीप सारे
इस नदी ने प्रार्थनाओं के सभी अवसर नकारे
इस नदी के कोर पर ठहरा दिवाकर रो रहा है
इस नदी में टूटते हैं भाग्य से हारे सितारे
ये न जाने प्रेम-पत्रों की अमिट स्याही पचाना
इस नदी का है किसी तूफ़ान से नाता पुराना
© मनीषा शुक्ला
7 Aug 2019
फिर थका सूरज गया बाज़ार में रोटी कमाने

सौंप कर सारे उजाले भूख के अंधे कुएँ को
फिर थका सूरज गया बाज़ार में रोटी कमाने
फिर थका सूरज गया बाज़ार में रोटी कमाने
रोशनी की सब किताबें खा गई बेरोज़गारी
डिग्रियों पर पड़ रही है भूख की तालीम भारी
ज़िंदगी का सब अँधेरा पढ़ नहीं पाया सवेरा
जेब पर बढ़ने लगी है अब ज़रूरत की उधारी
हार कर संसार से कोई अभागा दीप नभ का
फिर गया है जुगनुओं की चाकरी में गीत गाने
डिग्रियों पर पड़ रही है भूख की तालीम भारी
ज़िंदगी का सब अँधेरा पढ़ नहीं पाया सवेरा
जेब पर बढ़ने लगी है अब ज़रूरत की उधारी
हार कर संसार से कोई अभागा दीप नभ का
फिर गया है जुगनुओं की चाकरी में गीत गाने
भाग्य में होता अगर तो मांग संध्या की सजाता
या किसी सूरजमुखी की लाज का घूँघट उठाता
खेत को दुल्हन बनाता, क्यारियों की गोद भरता
या गुलाबों के अधर से ओस के मोती चुराता
चोट खाकर जब हथेली से हुई गुम प्रेम रेखा
वह पसीने से चला तब भाग्य की रेखा मिटाने
या किसी सूरजमुखी की लाज का घूँघट उठाता
खेत को दुल्हन बनाता, क्यारियों की गोद भरता
या गुलाबों के अधर से ओस के मोती चुराता
चोट खाकर जब हथेली से हुई गुम प्रेम रेखा
वह पसीने से चला तब भाग्य की रेखा मिटाने
रात तक केवल पहुंचने के लिए अब चल रहा है
भूल बैठा है दमकना, आज केवल जल रहा है
चाँद-तारों की ज़मानत दे रहा था जो अभी तक
नियति से होकर पराजित दिन-दहाड़े ढल रहा है
वह कि जिसके भाग्य में था, अर्घ्य का पावन चढ़ावा
मंदिरों में जा रहा है आँसुओं का मोल पाने
भूल बैठा है दमकना, आज केवल जल रहा है
चाँद-तारों की ज़मानत दे रहा था जो अभी तक
नियति से होकर पराजित दिन-दहाड़े ढल रहा है
वह कि जिसके भाग्य में था, अर्घ्य का पावन चढ़ावा
मंदिरों में जा रहा है आँसुओं का मोल पाने
© मनीषा शुक्ला
24 Jul 2019
इस पर कुछ अधिकार नहीं था
मेरा कंठ मिले पीड़ा को, मुझको यह स्वीकार नहीं था
पर पीड़ा को कंठ न देना, इस पर कुछ अधिकार नहीं था
जैसा भोगा, वैसा गाया, इसमें कुछ अपराध न पाया
मैंने हर टूटे तारे को लाकर मन्नत से मिलवाया
अनबाँची पुरवाई का दुःख, मेरा वैभव, मेरी थाती
धरती की प्यासी छाती पर मैं बादल की गीली पाती
आँसू, पीड़ा, सपने, अँखियाँ, प्रेम, विरह और बैरन सुधियाँ
सब कुछ मेरी ही ख़ातिर था, केवल यह संसार नहीं था
मैंने कुछ भी हेय न समझा, भाग्य मिला जो, शीश चढ़ाया
अधरों का सत्कार किया तो आँसू का भी मान बढ़ाया
दीपक की काया ढोने को अंधियारे का रूप लिया है
तुलसी का हर शाप उठाया, जीवन शालिग्राम किया है
शापित वरदानों को पूजा, खंडित भगवानों को पूजा
इतने पर भी इस दुनिया पर मेरा कुछ उपकार नहीं था
दुःख वाली सारी रेखाएँ जिनके हाथों में आई थी
मैंने बस उनकी ही ख़ातिर जीवन की साखी गाई थी
खिलने को तैयार नहीं थी नागफनी भी जिनके आंगन
बस उनकी ही ख़ातिर, मैंने कर डाला पीड़ा को चंदन
मैंने ही केवल समझा है, सागर में कितनी तृष्णा है
मेरे हिस्से में सब कुछ था, सिर्फ़ किसी का प्यार नहीं था
© मनीषा शुक्ला
पर पीड़ा को कंठ न देना, इस पर कुछ अधिकार नहीं था
जैसा भोगा, वैसा गाया, इसमें कुछ अपराध न पाया
मैंने हर टूटे तारे को लाकर मन्नत से मिलवाया
अनबाँची पुरवाई का दुःख, मेरा वैभव, मेरी थाती
धरती की प्यासी छाती पर मैं बादल की गीली पाती
आँसू, पीड़ा, सपने, अँखियाँ, प्रेम, विरह और बैरन सुधियाँ
सब कुछ मेरी ही ख़ातिर था, केवल यह संसार नहीं था
मैंने कुछ भी हेय न समझा, भाग्य मिला जो, शीश चढ़ाया
अधरों का सत्कार किया तो आँसू का भी मान बढ़ाया
दीपक की काया ढोने को अंधियारे का रूप लिया है
तुलसी का हर शाप उठाया, जीवन शालिग्राम किया है
शापित वरदानों को पूजा, खंडित भगवानों को पूजा
इतने पर भी इस दुनिया पर मेरा कुछ उपकार नहीं था
दुःख वाली सारी रेखाएँ जिनके हाथों में आई थी
मैंने बस उनकी ही ख़ातिर जीवन की साखी गाई थी
खिलने को तैयार नहीं थी नागफनी भी जिनके आंगन
बस उनकी ही ख़ातिर, मैंने कर डाला पीड़ा को चंदन
मैंने ही केवल समझा है, सागर में कितनी तृष्णा है
मेरे हिस्से में सब कुछ था, सिर्फ़ किसी का प्यार नहीं था
© मनीषा शुक्ला
15 Dec 2018
मनाही
चन्द्रमा को पा सशंकित दीप-तारे सब डरे हैं
सूर्य को अब सूर्य कहने की मनाही हो गई है
रश्मियों की शुद्धता की जांच पर बैठे अंधेरे
सांझ को संदेह, कैसे दूधिया इतने सवेरे
रात को अवसर मिला है, भोर को कुल्टा बुलाए
चाँद पर दायित्व है ये, सूर्य पर धब्बे उकेरे
तय हुआ अपराध, बाग़ी हो गया है अब उजाला
और उस पर जुगनूओं की भी गवाही हो गई है
फूल की शुचिता, यहां पर विषलता अब तय करेगी
छू गया है कौन आँगन, देहरी निर्णय करेगी
छांव की निर्लज्जता, जाकर बताती धूप जग को
आज से जूठन प्रसादों पर नया संशय करेगी
बाढ़ बनकर फैलती संवेदनाएँ रोकने को
एक पत्थर की नदी फिर से प्रवाही हो गई है
आरती कितनी कुलीना, अब बताएंगी चिताएँ
आंधियां बतलाएँ घूँघट को कि कितना मुख दिखाएँ
अब नगरवधूएं सिखाएंगी सलीक़ा रानियों को
नग्नता बतला रही है शील को, थोड़ा लजाएँ
रोज़ सच के चीखने से हो न जाए कान बहरे
इसलिए आवाज़ पर ही कार्यवाही हो गई है
सूर्य को अब सूर्य कहने की मनाही हो गई है
रश्मियों की शुद्धता की जांच पर बैठे अंधेरे
सांझ को संदेह, कैसे दूधिया इतने सवेरे
रात को अवसर मिला है, भोर को कुल्टा बुलाए
चाँद पर दायित्व है ये, सूर्य पर धब्बे उकेरे
तय हुआ अपराध, बाग़ी हो गया है अब उजाला
और उस पर जुगनूओं की भी गवाही हो गई है
फूल की शुचिता, यहां पर विषलता अब तय करेगी
छू गया है कौन आँगन, देहरी निर्णय करेगी
छांव की निर्लज्जता, जाकर बताती धूप जग को
आज से जूठन प्रसादों पर नया संशय करेगी
बाढ़ बनकर फैलती संवेदनाएँ रोकने को
एक पत्थर की नदी फिर से प्रवाही हो गई है
आरती कितनी कुलीना, अब बताएंगी चिताएँ
आंधियां बतलाएँ घूँघट को कि कितना मुख दिखाएँ
अब नगरवधूएं सिखाएंगी सलीक़ा रानियों को
नग्नता बतला रही है शील को, थोड़ा लजाएँ
रोज़ सच के चीखने से हो न जाए कान बहरे
इसलिए आवाज़ पर ही कार्यवाही हो गई है
© मनीषा शुक्ला
25 Nov 2018
वरदान
हमने अक्षत-चन्दन लेकर चरण न पूजे देव तुम्हारे
आज इसी से इस आँचल में कोई भी वरदान नहीं है
द्वार तुम्हारे जाकर हम भी, अभिमानी यह शीश नवाते
तुमको और बड़ा करने में हम बेहद छोटे हो जाते
छूकर हम भी देह तुम्हारी पतझर से पाटल कहलाते
फिर सोचा, दुःख के मौसम को किस मुख से ये मुख दिखलाते
लघुता पर अभिमान जताना, गुरुता का अपमान नहीं है
सीधी-सादी बातें हैं ये, इसमें कुछ विज्ञान नहीं है
आज इसी से इस आँचल में कोई भी वरदान नहीं है
द्वार तुम्हारे जाकर हम भी, अभिमानी यह शीश नवाते
तुमको और बड़ा करने में हम बेहद छोटे हो जाते
छूकर हम भी देह तुम्हारी पतझर से पाटल कहलाते
फिर सोचा, दुःख के मौसम को किस मुख से ये मुख दिखलाते
लघुता पर अभिमान जताना, गुरुता का अपमान नहीं है
सीधी-सादी बातें हैं ये, इसमें कुछ विज्ञान नहीं है
होगे तुम भगवान, तुम्हारे होंगे लाखों भक्त-उपासक
सूरज से समझौता करके, हो जाता है दीप नपुंसक
तुम पर कुछ विश्वास हमें हो, हमने भी ये चाहा भरसक
पर जब-जब आवाज़ लगाई, तुम बैठे थे बनके दर्शक
कश्ती पर एहसान जताना सागर की पहचान नहीं है
सूरज से समझौता करके, हो जाता है दीप नपुंसक
तुम पर कुछ विश्वास हमें हो, हमने भी ये चाहा भरसक
पर जब-जब आवाज़ लगाई, तुम बैठे थे बनके दर्शक
कश्ती पर एहसान जताना सागर की पहचान नहीं है
जो छोटे को छोटा समझे, ज्ञानी हो, विद्वान नहीं है
जो जितना ऊंचा उठता है, उतना एकाकी होता है
ख़ुद ही ख़ुद में जीने वाला कांधे पर पर्वत ढोता है
जो प्यासे को ठुकराए वो अंदर से सूखा स्रोता है
जिसने अँधियारा स्वीकारा, वो हरदिन सूरज बोता है
बोझ सृजन का धरती है पर, धरती ये वीरान नहीं है
और उधर अम्बर में लाखों तारे हैं, इंसान नहीं है
ख़ुद ही ख़ुद में जीने वाला कांधे पर पर्वत ढोता है
जो प्यासे को ठुकराए वो अंदर से सूखा स्रोता है
जिसने अँधियारा स्वीकारा, वो हरदिन सूरज बोता है
बोझ सृजन का धरती है पर, धरती ये वीरान नहीं है
और उधर अम्बर में लाखों तारे हैं, इंसान नहीं है
© मनीषा शुक्ला
18 Sept 2018
आंसुओं का व्यय
आंख को ये है शिकायत आंसुओं का व्यय बहुत है
मान रखने को सभी का होंठ का अभिनय बहुत है
जो हृदय की आंच पाकर, बन गया जल आज ईंधन
हो चलेगी बूंद रस की, जग-प्रलय का एक साधन
जो न पाएगी कहीं पर दो घड़ी सम्मान पीड़ा
तोड़ देगा आज आंसू भी नयन से मोह-बन्धन
मानते हैं हम कठिन है, धैर्य कम, पीड़ा अगिन है
ठान ले तो आंधियों पर, दूब का निश्चय बहुत है
भावना का रक्त है जो, व्यर्थ क्यों उसको बहाएं
पीर के इस मूलधन को, हो सके जितना; बचाएं
ये ज़रूरी है, दुलारें आज मन की वेदना को
यूं न हम सागर उछालें, प्यास से ही चूक जाएं
जो समझना चाह लेगा, बस वही मन थाह लेगा
है कथानक एक ही, पर बात के आशय बहुत हैं
शोर से कहनी भला क्या एक गूंगे की कहानी
भूलने वाला भला कब, याद रखता है निशानी?
जो सुखों की साधना है और दुख का एक साधन
वो ज़माने के लिए है, आंख का दो बूंद पानी
पीर का दर्शक रहा जो, नीर का ग्राहक बनेगा?
इस कुटिल संसार के व्यवहार पर संशय बहुत है
© मनीषा शुक्ला
मान रखने को सभी का होंठ का अभिनय बहुत है
जो हृदय की आंच पाकर, बन गया जल आज ईंधन
हो चलेगी बूंद रस की, जग-प्रलय का एक साधन
जो न पाएगी कहीं पर दो घड़ी सम्मान पीड़ा
तोड़ देगा आज आंसू भी नयन से मोह-बन्धन
मानते हैं हम कठिन है, धैर्य कम, पीड़ा अगिन है
ठान ले तो आंधियों पर, दूब का निश्चय बहुत है
भावना का रक्त है जो, व्यर्थ क्यों उसको बहाएं
पीर के इस मूलधन को, हो सके जितना; बचाएं
ये ज़रूरी है, दुलारें आज मन की वेदना को
यूं न हम सागर उछालें, प्यास से ही चूक जाएं
जो समझना चाह लेगा, बस वही मन थाह लेगा
है कथानक एक ही, पर बात के आशय बहुत हैं
शोर से कहनी भला क्या एक गूंगे की कहानी
भूलने वाला भला कब, याद रखता है निशानी?
जो सुखों की साधना है और दुख का एक साधन
वो ज़माने के लिए है, आंख का दो बूंद पानी
पीर का दर्शक रहा जो, नीर का ग्राहक बनेगा?
इस कुटिल संसार के व्यवहार पर संशय बहुत है
© मनीषा शुक्ला
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4 Sept 2018
पीड़ा का संगम
आंसू में आंसू मिलने से पीड़ा का संगम होता है
औरों के संग रो लेने से, अपना भी दुःख कम होता है
हृदय लुटाया पीर कमाई, सबकी केवल एक कहानी
प्रेम नगर में सब दुखियारे, कैसा राजा, कैसी रानी
हर आंसू का स्वाद वही है, कैसा अपना, कौन पराया
दुःख तो केवल दुःख होता है, जिसके हिस्से, जैसा आया
चूम पसीने के माथे को, पुरवाई पाती है ठंडक
धरती को तर करने वाला बादल ख़ुद भी नम होता है
डूब रहे को अगर सहारा दे दे, तो तिनका तर जाए
जो मानव की पीड़ा लिख दे, गीत उसी के ईश्वर गाए
प्यासे अधरों को परसे बिन, पानी कैसे पुण्य कमाए
सावन में उतना सावन है, जितना धरती कण्ठ लगाए
भाग्य प्रतीक्षारत होता है, सिर्फ़ हथेली की आशा में
स्नेह भरा बस एक स्पर्श ही छाले का संयम होता है
अनबोला सुन लेने वाला, स्वयं कथानक हो जाता है
जो आंसू को जी लेता है, वो मुस्कानें बो जाता है
जो मन डाली से पत्ते की बिछुड़न का अवसाद चखेगा
उसको पाकर मोक्ष जिएगा, जीवन उसको याद रखेगा
उजियारे के रस्ते बिखरा हर इक तारा केवल जुगनू
अँधियारे को मिलने वाला दीपक सूरज-सम होता है
© मनीषा शुक्ला
औरों के संग रो लेने से, अपना भी दुःख कम होता है
हृदय लुटाया पीर कमाई, सबकी केवल एक कहानी
प्रेम नगर में सब दुखियारे, कैसा राजा, कैसी रानी
हर आंसू का स्वाद वही है, कैसा अपना, कौन पराया
दुःख तो केवल दुःख होता है, जिसके हिस्से, जैसा आया
चूम पसीने के माथे को, पुरवाई पाती है ठंडक
धरती को तर करने वाला बादल ख़ुद भी नम होता है
डूब रहे को अगर सहारा दे दे, तो तिनका तर जाए
जो मानव की पीड़ा लिख दे, गीत उसी के ईश्वर गाए
प्यासे अधरों को परसे बिन, पानी कैसे पुण्य कमाए
सावन में उतना सावन है, जितना धरती कण्ठ लगाए
भाग्य प्रतीक्षारत होता है, सिर्फ़ हथेली की आशा में
स्नेह भरा बस एक स्पर्श ही छाले का संयम होता है
अनबोला सुन लेने वाला, स्वयं कथानक हो जाता है
जो आंसू को जी लेता है, वो मुस्कानें बो जाता है
जो मन डाली से पत्ते की बिछुड़न का अवसाद चखेगा
उसको पाकर मोक्ष जिएगा, जीवन उसको याद रखेगा
उजियारे के रस्ते बिखरा हर इक तारा केवल जुगनू
अँधियारे को मिलने वाला दीपक सूरज-सम होता है
© मनीषा शुक्ला
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13 Aug 2018
भगवान नहीं है
इक जीवन है, दो नैना है, आंसू चार मग़र दुःख इतने
कितना गाएँ, कितना रोएँ, कुछ भी तो अनुमान नहीं है
जितनी दूर चले आए हम, उतनी दूर अभी जाना है
फिर पीड़ा का आमंत्रण है, फिर से अधरों को गाना है
नैनों का कर्तव्य यही है, रोते-रोते मुस्काना है
चाहे सौ टुकड़े हो जाए, दरपन को सच दिखलाना है
विपदाओं से लग्न मिला है, कष्ट हुए संबंधी अपने
दुःख से जन्मों का नाता है, सुख से कुछ पहचान नहीं है
बिखरे पन्ने, कोरी स्याही, इतना सा इतिहास हमारा
उस अम्बर के सूरज, हम ही इस धरती का टूटा तारा
गीत हमारे गाकर कलकल होती है नदिया की धारा
इक दिन हमसे मिलकर रोया, तबसे है ये सागर खारा
हम आंसू का परिचय, हम ही वंश बढ़ाते हैं पीड़ा का
इस दुनिया में हम जैसों का कोई भी उपमान नहीं है
हम धरती पर आए जग में कुछ पापों का भार घटाने
यौवन के कुछ गीत सुनाकर बदनामी में नाम कमाने
हम आए सूखे चंदन में नम आंखों का अर्क मिलाने
हम आए हैं जीवन रेखा से थोड़ा दुर्भाग्य चुराने
हमने बस अभिशाप उठाएं, वरदानों के दरवाज़े से
जान चुके हम इस धरती पर सबकुछ है, भगवान नहीं है
© मनीषा शुक्ला
कितना गाएँ, कितना रोएँ, कुछ भी तो अनुमान नहीं है
जितनी दूर चले आए हम, उतनी दूर अभी जाना है
फिर पीड़ा का आमंत्रण है, फिर से अधरों को गाना है
नैनों का कर्तव्य यही है, रोते-रोते मुस्काना है
चाहे सौ टुकड़े हो जाए, दरपन को सच दिखलाना है
विपदाओं से लग्न मिला है, कष्ट हुए संबंधी अपने
दुःख से जन्मों का नाता है, सुख से कुछ पहचान नहीं है
बिखरे पन्ने, कोरी स्याही, इतना सा इतिहास हमारा
उस अम्बर के सूरज, हम ही इस धरती का टूटा तारा
गीत हमारे गाकर कलकल होती है नदिया की धारा
इक दिन हमसे मिलकर रोया, तबसे है ये सागर खारा
हम आंसू का परिचय, हम ही वंश बढ़ाते हैं पीड़ा का
इस दुनिया में हम जैसों का कोई भी उपमान नहीं है
हम धरती पर आए जग में कुछ पापों का भार घटाने
यौवन के कुछ गीत सुनाकर बदनामी में नाम कमाने
हम आए सूखे चंदन में नम आंखों का अर्क मिलाने
हम आए हैं जीवन रेखा से थोड़ा दुर्भाग्य चुराने
हमने बस अभिशाप उठाएं, वरदानों के दरवाज़े से
जान चुके हम इस धरती पर सबकुछ है, भगवान नहीं है
© मनीषा शुक्ला
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गीत
1 Aug 2018
सांसों का श्राद्ध
शेष अभी हैं प्राण हृदय में, शेष अभी अंतस में पीड़ा
मुझको थोड़ा और जलाओ, मैं कष्टों की अभ्यासिन हूं
याद दिलाओ मुझको मेरा,तुम पर कुछ अधिकार नहीं है
जलना ही जीवन दीपक का, इसमें कुछ उपकार नहीं है
जाने क्यों है आशा, इसका कुछ भी तो आधार नहीं है
सपनों के शव पर लेटा मन, मरने को तैयार नहीं है
हाय! न कुछ भी उसने पाया, जिसने केवल हृदय गंवाया
मुझमें मैं भी शेष नहीं हूँ, मैं तो सचमुच बड़भागिन हूँ
मुझको थोड़ा और जलाओ, मैं कष्टों की अभ्यासिन हूं
याद दिलाओ मुझको मेरा,तुम पर कुछ अधिकार नहीं है
जलना ही जीवन दीपक का, इसमें कुछ उपकार नहीं है
जाने क्यों है आशा, इसका कुछ भी तो आधार नहीं है
सपनों के शव पर लेटा मन, मरने को तैयार नहीं है
हाय! न कुछ भी उसने पाया, जिसने केवल हृदय गंवाया
मुझमें मैं भी शेष नहीं हूँ, मैं तो सचमुच बड़भागिन हूँ
महलों की अभिलाषा जिनको, है संत्रास उन्हीं को वन में
मैं तुलसी तो वनवासिन हूँ, अपने ही घर के आँगन में
प्यास सखी है जिसकी, पानी मरता जिसके आलिंगन में
विष पीकर अमृत ही बाँटा, उसने हर सागर-मंथन में
जिसके पास रखी है गिरवी, सागर की सारी मधुशाला
फिर भी जिसके सब घट रीते, मैं ऐसी इक पनिहारिन हूँ
मैं तुलसी तो वनवासिन हूँ, अपने ही घर के आँगन में
प्यास सखी है जिसकी, पानी मरता जिसके आलिंगन में
विष पीकर अमृत ही बाँटा, उसने हर सागर-मंथन में
जिसके पास रखी है गिरवी, सागर की सारी मधुशाला
फिर भी जिसके सब घट रीते, मैं ऐसी इक पनिहारिन हूँ
दरपन पर मुस्काने वालो, लोहा पिघला कर दिखलाओ
सुख के घर मेहंदी बोई है, दुःख के भी तो हाथ सजाओ
दहता है तो दह जाए जग, तुम केवल पानी बरसाओ
नैनों में अब भी सावन है, मुझको थोड़ा और रुलाओ
उत्सव की नगरी के लोगो, मुझ पर हर अभियोग लगाओ
मैंने श्राद्ध किया सांसों का, मैं जीवन की अपराधिन हूँ
सुख के घर मेहंदी बोई है, दुःख के भी तो हाथ सजाओ
दहता है तो दह जाए जग, तुम केवल पानी बरसाओ
नैनों में अब भी सावन है, मुझको थोड़ा और रुलाओ
उत्सव की नगरी के लोगो, मुझ पर हर अभियोग लगाओ
मैंने श्राद्ध किया सांसों का, मैं जीवन की अपराधिन हूँ
© मनीषा शुक्ला
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गीत
19 Jul 2018
बस हमारे पाँव देखो!
ये न पूछो, किस तरह हम आ मिले हैं मंज़िलों से,
बस हमारे पाँव देखो!
चन्द्रमा नापो, हमारी पीर का अनुमान होगा
शूल का जीवन हमारे फूल से आसान होगा
हम लहर के वक्ष पर चलते हुए आए यहां तक
रेत पर भी तो हमारा श्रम भरा अनुदान होगा
ये न पूछो, किस तरह तूफ़ान से लड़ते रहे हम,
बस हमारी नाव देखो!
बस हमारे पाँव देखो!
चन्द्रमा नापो, हमारी पीर का अनुमान होगा
शूल का जीवन हमारे फूल से आसान होगा
हम लहर के वक्ष पर चलते हुए आए यहां तक
रेत पर भी तो हमारा श्रम भरा अनुदान होगा
ये न पूछो, किस तरह तूफ़ान से लड़ते रहे हम,
बस हमारी नाव देखो!
मान बैठे किस तरह तुम यह, सहज दिनमान होगा?
सूर्य निकला तो किसी रजनीश का अवसान होगा
रोशनी के आख़िरी कण से मिलो, मालूम होगा,
वो अगर थक जाएगी तो भोर का नुकसान होगा
ये न पूछो, एक प्राची ने तिमिर का क्या बिगाड़ा?
रजनियों के गाँव देखो!
सूर्य निकला तो किसी रजनीश का अवसान होगा
रोशनी के आख़िरी कण से मिलो, मालूम होगा,
वो अगर थक जाएगी तो भोर का नुकसान होगा
ये न पूछो, एक प्राची ने तिमिर का क्या बिगाड़ा?
रजनियों के गाँव देखो!
है हमें विश्वास इक दिन, धीर का सम्मान होगा
लांछनों से कब कलंकित वीर का अभिमान होगा?
मंदिरों से आएगा सुनकर हमारी प्रार्थना जो
देवता चाहे न हो पर कम से कम इंसान होगा
ये न पूछो, एक बिरवा आस का क्या दे सका है?
सप्तवर्णी छाँव देखो!
लांछनों से कब कलंकित वीर का अभिमान होगा?
मंदिरों से आएगा सुनकर हमारी प्रार्थना जो
देवता चाहे न हो पर कम से कम इंसान होगा
ये न पूछो, एक बिरवा आस का क्या दे सका है?
सप्तवर्णी छाँव देखो!
© मनीषा शुक्ला
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गीत
17 Jul 2018
जाने तुमसे क्या छूटा है
जाने तुमसे क्या छूटा है, सबको साथ लिए जाते हो
जाने तुमपर क्या बीती है, मन को गीत किए जाते हो
जाने कब से आंखे भर के गीला चंदा देख रहे हो
इक टूटे तारे के आगे अब भी माथा टेक रहे हो
यादों पर मन टांक रहे हो, भावों का अतिरेक रहे हो
यूं लगता है अपने जैसे केवल तुम ही एक रहे हो
होठों पर नदिया रक्खी है, फिर भी प्यास पिए जाते हो
ख़ुद से अपनी एक न बनती, जग को मीत किए जाते
अनगढ़ पत्थर पूज रहे हो, शायद देवों से हारे हो
प्यासों के आगत पर ख़ुश हो, शायद नदिया के मारे हो
मुस्कानें बोते रहते हो, क्या उत्सव के हरकारे हो?
आंसू से रूठे रहते हो, क्या काजल के रखवारे हो?
मूल्य न जिनके पास ह्रदय का,उनपर प्राण दिए जाते हो
जिसने मन पर घाव लगाया, उससे प्रीत किए जाते हो
मोल रहे हो पीर पराई, इतने आंसू रो पाओगे?
दुनिया को ठुकराने वाले, क्या दुनिया के हो पाओगे?
इक मीठे चुम्बन के दम पर सारी पीड़ा धो पाओगे?
क्या लगता है, सब देकर भी, जो खोया था, वो पाओगे?
साँसों से अनुबंध किया है, इक संत्रास जिए जाते हो
दुनिया धारा की अनुयायी, तुम विपरीत किए जाते हो
© मनीषा शुक्ला
जाने तुमपर क्या बीती है, मन को गीत किए जाते हो
जाने कब से आंखे भर के गीला चंदा देख रहे हो
इक टूटे तारे के आगे अब भी माथा टेक रहे हो
यादों पर मन टांक रहे हो, भावों का अतिरेक रहे हो
यूं लगता है अपने जैसे केवल तुम ही एक रहे हो
होठों पर नदिया रक्खी है, फिर भी प्यास पिए जाते हो
ख़ुद से अपनी एक न बनती, जग को मीत किए जाते
अनगढ़ पत्थर पूज रहे हो, शायद देवों से हारे हो
प्यासों के आगत पर ख़ुश हो, शायद नदिया के मारे हो
मुस्कानें बोते रहते हो, क्या उत्सव के हरकारे हो?
आंसू से रूठे रहते हो, क्या काजल के रखवारे हो?
मूल्य न जिनके पास ह्रदय का,उनपर प्राण दिए जाते हो
जिसने मन पर घाव लगाया, उससे प्रीत किए जाते हो
मोल रहे हो पीर पराई, इतने आंसू रो पाओगे?
दुनिया को ठुकराने वाले, क्या दुनिया के हो पाओगे?
इक मीठे चुम्बन के दम पर सारी पीड़ा धो पाओगे?
क्या लगता है, सब देकर भी, जो खोया था, वो पाओगे?
साँसों से अनुबंध किया है, इक संत्रास जिए जाते हो
दुनिया धारा की अनुयायी, तुम विपरीत किए जाते हो
© मनीषा शुक्ला
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गीत
18 May 2018
हों हमारे प्राण के प्यासे भले ही सूर्य सारे
हों हमारे प्राण के प्यासे भले ही सूर्य सारे
हम न मांगेंगे कभी भी छाँव अब वंशीवटों से
भिक्षुकों का क्या प्रयोजन, स्वर्ण के सम्मोहनों से
भूख का नाता रहा कब राजसी आयोजनों से
हम अभागों को रुचे हैं श्वास के अंतिम निवेदन
देह का नाता भला क्या स्वर्ग के आमन्त्रणों से
ढूंढना हमको नहीं आनन्द की अमरावती में
गन्ध आएगी हमारी सिर्फ़ शाश्वत मरघटों से
बोझ धरती का बढ़ाकर जी रहे, ये ही बहुत है
हम नहीं जग के, स्वयं के ही रहे, ये ही बहुत है
हम नहीं शंकर, गरल पीकर अमर हो जाएंगे जो
हम गरल होकर अमरता पी रहे, ये ही बहुत है
आग गोदी में सजाकर, क्यों छुएँ आकाशगंगा
प्यास लेकर लौट आए हम हमेशा पनघटों से
हम भला देवत्व पाकर, क्या करेंगे ये बताओ
देव मेरे! आदमी को, आदमी जैसा बनाओ
दो घड़ी ठहरो धरा पर भूल कर देवत्व सारा
और जीवन को ज़रा हो के मनुज जीकर दिखाओ
हो चलेगा प्रेम तुमको मृत्यु के एकांत से ही
ऊब जाओगे किसी दिन श्वास के इन जमघटों से
© मनीषा शुक्ला
हम न मांगेंगे कभी भी छाँव अब वंशीवटों से
भिक्षुकों का क्या प्रयोजन, स्वर्ण के सम्मोहनों से
भूख का नाता रहा कब राजसी आयोजनों से
हम अभागों को रुचे हैं श्वास के अंतिम निवेदन
देह का नाता भला क्या स्वर्ग के आमन्त्रणों से
ढूंढना हमको नहीं आनन्द की अमरावती में
गन्ध आएगी हमारी सिर्फ़ शाश्वत मरघटों से
बोझ धरती का बढ़ाकर जी रहे, ये ही बहुत है
हम नहीं जग के, स्वयं के ही रहे, ये ही बहुत है
हम नहीं शंकर, गरल पीकर अमर हो जाएंगे जो
हम गरल होकर अमरता पी रहे, ये ही बहुत है
आग गोदी में सजाकर, क्यों छुएँ आकाशगंगा
प्यास लेकर लौट आए हम हमेशा पनघटों से
हम भला देवत्व पाकर, क्या करेंगे ये बताओ
देव मेरे! आदमी को, आदमी जैसा बनाओ
दो घड़ी ठहरो धरा पर भूल कर देवत्व सारा
और जीवन को ज़रा हो के मनुज जीकर दिखाओ
हो चलेगा प्रेम तुमको मृत्यु के एकांत से ही
ऊब जाओगे किसी दिन श्वास के इन जमघटों से
© मनीषा शुक्ला
27 Apr 2018
मेरे गीतों का कहना है
मेरे गीतों का कहना है, मैं उनसे छल कर बैठी हूँ
लिखने बैठी थी नेह मग़र पीड़ा के छंद बना बैठी
अनुबंधों की सीमाओं तक, बिखरे संबंध बना बैठी
इक ताना-बाना बुनने बैठी थी मैं अपने जीवन का
शब्दों से मन के आँचल में झीने पैबन्द बना बैठी
बतलाते हैं मुझको अक्षर, अपराध नहीं ये क्षम्य कभी
रच कर सारे उल्टे सतिये, पल-पल मंगल कर बैठी हूँ
इन गीतों को विश्वास रहा, मैं अक्षर चंदन कर दूंगी
अमरत्व पिए आनंद जहां, कविता नंदनवन कर दूंगी
सुख गाएगा कविता मेरी, दुख गूंगा होकर तरसेगा
जिस रोज़ स्वरा बन गाऊँगी, धरती में स्पंदन कर दूंगी
लेकिन पन्नों पर वो उतरा, जो मेरे मन में बैठा था
गीतों की दुनिया में तबसे, परिचय 'पागल' कर बैठी हूँ
सुन गीत! प्रभाती मन रख कर, संध्या का गान नहीं गाते
सूखे सावन के आंगन में मेघों के राग नहीं भाते
प्यासे के कुल जन्मीं कोई, गंगा अभिजात नहीं होती
हो भाग अमावस जिनके वो, चंदा को ब्याह नहीं लाते
इतने पर भी 'मन हार गया', मुझको ऐसा स्वीकार नहीं
सपनों के बिरवे बो-बो कर, आंखे जंगल कर बैठी हूँ
कैसे समझाऊं इन सबको, ये गीत नहीं हैं, दुश्मन हैं
इनसे कुछ भी अनछुआ नहीं, ये गीत नहीं, मेरा मन है
इनको तजना असमंजस तो इनसे बचना अपराध हुआ
ये राधा हैं, ये कान्हा हैं, ये गीत नहीं, वृंदावन है
जैसे भी हो मुस्काना है, गीतों की ख़ातिर गाना है
दो-चार उजालों की ख़ातिर, जीवन काजल कर बैठी हूँ
© मनीषा शुक्ला
लिखने बैठी थी नेह मग़र पीड़ा के छंद बना बैठी
अनुबंधों की सीमाओं तक, बिखरे संबंध बना बैठी
इक ताना-बाना बुनने बैठी थी मैं अपने जीवन का
शब्दों से मन के आँचल में झीने पैबन्द बना बैठी
बतलाते हैं मुझको अक्षर, अपराध नहीं ये क्षम्य कभी
रच कर सारे उल्टे सतिये, पल-पल मंगल कर बैठी हूँ
इन गीतों को विश्वास रहा, मैं अक्षर चंदन कर दूंगी
अमरत्व पिए आनंद जहां, कविता नंदनवन कर दूंगी
सुख गाएगा कविता मेरी, दुख गूंगा होकर तरसेगा
जिस रोज़ स्वरा बन गाऊँगी, धरती में स्पंदन कर दूंगी
लेकिन पन्नों पर वो उतरा, जो मेरे मन में बैठा था
गीतों की दुनिया में तबसे, परिचय 'पागल' कर बैठी हूँ
सुन गीत! प्रभाती मन रख कर, संध्या का गान नहीं गाते
सूखे सावन के आंगन में मेघों के राग नहीं भाते
प्यासे के कुल जन्मीं कोई, गंगा अभिजात नहीं होती
हो भाग अमावस जिनके वो, चंदा को ब्याह नहीं लाते
इतने पर भी 'मन हार गया', मुझको ऐसा स्वीकार नहीं
सपनों के बिरवे बो-बो कर, आंखे जंगल कर बैठी हूँ
कैसे समझाऊं इन सबको, ये गीत नहीं हैं, दुश्मन हैं
इनसे कुछ भी अनछुआ नहीं, ये गीत नहीं, मेरा मन है
इनको तजना असमंजस तो इनसे बचना अपराध हुआ
ये राधा हैं, ये कान्हा हैं, ये गीत नहीं, वृंदावन है
जैसे भी हो मुस्काना है, गीतों की ख़ातिर गाना है
दो-चार उजालों की ख़ातिर, जीवन काजल कर बैठी हूँ
© मनीषा शुक्ला
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1 Apr 2018
मौन का भी दंड होगा
लेखनी! पीड़ा-व्यथा की टेर पर मत मौन रहना
मौन का भी दंड होगा, जब कभी भी न्याय होगा
मौन का भी दंड होगा, जब कभी भी न्याय होगा
जब कभी बादल बिलखती प्यास से मोती चुराए
जब कभी दीपक अंधेरा देखकर बाती चुराए
जब न पिघले पत्थरों की आंख गीली आंच पाकर
जब कभी, कोई तिजोरी भूख से रोटी चुराए
दरपनों को सच दिखाना, मृत्यु को जीवट दिखाना
क्योंकि उस क्षण गीत गाना, शब्द का व्यवसाय होगा
जब कभी दीपक अंधेरा देखकर बाती चुराए
जब न पिघले पत्थरों की आंख गीली आंच पाकर
जब कभी, कोई तिजोरी भूख से रोटी चुराए
दरपनों को सच दिखाना, मृत्यु को जीवट दिखाना
क्योंकि उस क्षण गीत गाना, शब्द का व्यवसाय होगा
एक धोबी फिर कभी जब, जानकी पर प्रश्न दागे
जब कभी धर्मान्ध लक्ष्मण, उर्मिला का नेह त्यागे
जब कभी इतिहास पढ़कर, कैकेयी को दोष दे जग
उर्वशी के भाग्य में जब श्राप का संताप जागे
तब तनिक साहस जुटाना, पीर को धीरज बंधाना
क्योंकि उस क्षण मुस्कुराना, शोक का पर्याय होगा
जब कभी धर्मान्ध लक्ष्मण, उर्मिला का नेह त्यागे
जब कभी इतिहास पढ़कर, कैकेयी को दोष दे जग
उर्वशी के भाग्य में जब श्राप का संताप जागे
तब तनिक साहस जुटाना, पीर को धीरज बंधाना
क्योंकि उस क्षण मुस्कुराना, शोक का पर्याय होगा
इक तुम्हारे बोलने से, कुछ अलग इतिहास होगा
उत्तरा होगी सुहागिन, कौरवों का नाश होगा
और यदि तुम रख न पाई द्रौपदी की लाज, फिर से
इस धरा का एक कोना, हस्तिनापुर आज होगा
ग़लतियों से सीख पाना, अब समय पर चेत जाना
क्योंकि इस क्षण डगमगाना, अंत का अध्याय होगा
उत्तरा होगी सुहागिन, कौरवों का नाश होगा
और यदि तुम रख न पाई द्रौपदी की लाज, फिर से
इस धरा का एक कोना, हस्तिनापुर आज होगा
ग़लतियों से सीख पाना, अब समय पर चेत जाना
क्योंकि इस क्षण डगमगाना, अंत का अध्याय होगा
© मनीषा शुक्ला
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