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26 Jun 2020

तुम गए जबसे

तुम गए जबसे, सुबह सूरज जलाना भूल बैठी
तुम गए तबसे, अंगीठी चाँद की ठंडी पड़ी है

तुम गए क्या, रात ने गेसू नहीं तबसे सँवारे
बिन तुम्हारे बोझ लगते हैं गगन को ये सितारे
तुम गए जबसे लहर ने होंठ अपने सी लिए हैं
तुम गए जबसे, नदी से दूर बैठे हैं किनारे

तुम गए जबसे, न कहती रात से कुछ रातरानी
तुम गए तबसे, बगीचे में हिना गूँगी खड़ी है

तुम गए तो खुशबुओं ने फूल से अनुबंध तोड़े
तितलियों ने रंग की कारीगरी के काम छोड़े
तुम गए जबसे, हवा ने पँख गिरवी रख दिए हैं
तुम गए, सब मंज़िलों ने रास्तों से हाथ जोड़े

तुम गए जबसे, न गाया गीत कोई भी हृदय से
तुम गए तबसे, अधर से बाँसुरी हरदिन लड़ी है

कर रहा मन ख़र्च कोई रोज़ तुमको याद करके
चुक गई है नींद सारी आँसुओं का ब्याज भरके
तुम गए हो, अब न तोड़ेंगी कभी उपवास आँखें
तुम गए, सब थम गया है, साँझ तक भी दिन न सरके

तुम गए जबसे, समय की देह नीली पड़ गई है
तुम गए तबसे, बहुत धीमी कलाई की घड़ी है

©मनीषा शुक्ला

15 Jun 2020

तुम्हारी यादों का सामान

तुम्हारी यादों का सामान
खिड़की को साँसे देता है, दीवारों को कान

हरजाई अख़बार कि जिससे घण्टों बतियाते हो
नासपिटी शतरंज, नहीं तुम जिससे उकताते हो
बैरी चश्मा पल भर को भी नैन न छोड़े ख़ाली
छूकर होंठ तुम्हारे आई चाय भरी ये प्याली
और तुम्हारी टेबल पर मुस्काता मीठा पान
तुम्हारी यादों का सामान

काट रही है बालकनी वनवास तुम्हारा दिन भर
गमले की चंपा की ख़ातिर सौत तुम्हारा दफ़्तर
अलग लगे दरवाज़े की घण्टी को छुअन तुम्हारी
और तुम्हारे बिन लगता है समय घड़ी को भारी
तुम लौटो तो आ जाती है घर में फिर से जान
तुम्हारी यादों का सामान

अधखुलती खिड़की से लिपटे पर्दे की उलझन में
तुम साँसों के चन्दन में, तुम नैनों के दरपन में
तुम तकिए की ख़ुश्बू में, तुम सिलवट में चादर की
तुम घर में, तुम में रहती है परछाईं इस घर की
नाम लिखी तख़्ती की भी है तुमसे ही पहचान
तुम्हारी यादों का सामान

©मनीषा शुक्ला

11 Jun 2020

तुम सँजो लो!

हर घड़ी जिसको लुटाती जा रही है भाग्यरेखा;
हो सके तो तुम सँजो लो!

जिस नयन में एक आँसू भी नहीं ठहरा ख़ुशी से
पढ़ रहे हैं होंठ जिसके, मंत्र तर्पण के अभी से
दान ऐसा; जो अखरता ही रहा बस याचना को
मौन ऐसा; कह न पाया बात अपनी जो किसी से

मर गया वह दुःख अभागा, आज भरकर आँख रो लो!
हो सके तो तुम सँजो लो!

एक सूरज के लिए जलता रहा आकाश सारा
और धरती माँगती ही रह गई कोई सितारा
बाँटनेवाला बहुत अनुदार अपनी भूमिका में
मिल गए दोनों जहाँ, पर दे न पाया वह किनारा

अब तुम्हीं बढ़कर ज़रा आकुल क्षितिज के पँख खोलो!
हो सके तो तुम सँजो लो!

अब समर्पित है तुम्हीं को, चाह लो या राह अपनी
धर्म ख़ुश्बू का बिखरना, कब उसे परवाह अपनी
तुम निठुर हो भी गए तो मन बनेगा आज बादल
ख़ूब बरसेंगे नयन जो सह न पाए दाह अपनी

आज इस गीले हृदय में प्रार्थना के बीज बो लो !
हो सके तो तुम सँजो लो!

©मनीषा शुक्ला

26 Apr 2020

बिछड़ने का वादा करना

बिछड़ने का वादा करना,
इतना भी आसान नहीं था, जीवन भर मरना!

जैसे कोई नाव बिछड़कर लहरों से पछताए
नदिया को तो पार करे पर तट पर डूबी जाए
गीली लकड़ी सा कोई जैसे मन को सुलगाए
तेल बिना बाती पर जैसे अँधियारा मुस्काए
पागल होकर परछाईं को बाँहों में भरना!

अम्बर के सीने में जैसे कोई चाँद छिपाए
भीतर जेठ तपे, जीने पर सावन शोर मचाए
अंगारा कोई जैसे शबनम की माँग सजाए
निरवंशी सपना कोई आँखों से प्रीत लगाए
अनरोया आँसू पलकों की कोरों पर धरना!

जिस पानी में आग नहीं वो कैसे प्यास बुझाए
मेघ बिना बदली, प्रिय बिन, विधवा मधुमास कहाए
बिन प्राणों के साँस किसी का जीवन क्या महकाए
हर पूजन का भाग्य कहाँ जो मनचाहा वर पाए
लेकिन तुम बिन क्या पाना, क्या खोने से डरना!

©मनीषा शुक्ला

31 Jan 2020

तुम्हारी जब-जब आई याद

तुम्हारी जब-जब आई याद!
मुस्कानों ने होंठ चखे, पाया आँखों का स्वाद,
तुम्हारी जब-जब आई याद!

जिन रस्तों ने हमको देखा मिलते और बिछड़ते
जिस नदिया ने गीत सुनाए आँजुर भरते-भरते
जिस पत्थर ने नाम हमारा बरसों तलक सहेजा
जिस बादल ने हम दोनों की ख़ातिर सावन भेजा
वो रस्ते, नदिया, पत्थर, वो बादल हों आबाद!
तुम्हारी फिर से आई याद!

मंदिर की देवी को रिश्वत वाले फूल चढ़ाएं
बूढ़े पीपल को थे बच्चों के सब नाम बताएं
जिस पुलिया पर बैठ किया हमने तय नक्शा घर का
सुनकर अपनी प्रेम कहानी, सीना उसका दरका
फिर भी मन के गठबंधन की रखते हैं मरजाद!
तुम्हीं को करके हर पल याद!

साथ तुम्हारे लगती दुनिया चलता-फिरता जादू
साथ तुम्हारे हमने रोएं केवल मीठे आँसू
गुँथ-गुँथ कर चोटी में थे तब लम्हें भी बतियाते
आज अकेलेपन में नैना, नैनों से घबराते
एक तुम्हारे पहले साथी! एक तुम्हारे बाद!
तुम्हारी कितनी आई याद!

©मनीषा शुक्ला

3 Nov 2018

उन आंखों से गीत तुम्हारे बहते हैं

जिन आँखों में मीत रहा करते थे तुम
उन आंखों से गीत तुम्हारे बहते हैं

अब नदियों का शोर नहीं सुन पाती हूँ
रेती पर कुछ लिखने से कतराती हूँ
फूलों की तरुणाई से डर लगता है
तितली के रंगों से आँख बचाती हूँ
मेरे बचने की कोई उम्मीद नहीं
अब तो सारे दुनियावाले कहते हैं

जाने कैसे मैं इतनी आसान हुई
हर महफ़िल के कोने की पहचान हुई
तन्हाई की घड़ियों से हमजोली की
दरपन के बतियाने का सामान हुई
मुझसे अक्सर मेरी अनबन रहती है
“मुझमें“ जाने कितने “मुझ-से“ रहते हैं

दीप, बिना दीवाली जैसे जलता है
बिन धागे के जैसे मोम पिघलता है
तुम बिन मुझको भी कुछ ऐसा लगता है
साया मेरा मुझसे दूर टहलता है
मुझसे प्रेम सहा ना जाए पल भर भी
लोग तुम्हारी नफ़रत कैसे सहते हैं?

© मनीषा शुक्ला

30 Oct 2018

कितनी पूरी, पूरी दुनिया

एक तुम्हारे बिन लगती है हमको बहुत अधूरी दुनिया
और तुम्हारे होने भर से कितनी पूरी, पूरी दुनिया

तुमको छू लेने से सारे सपने शीशमहल होते हैं
और तुम्हारी ख़ातिर बहकर आंसू गंगाजल होते हैं
आंखों में जुगनू मिलते हैं, साँसों में सन्दल होते हैं
तुम हो तो, सारे दिन मंगल और शगुन सब पल होते हैं
जीवन को अबतक लगती थी सांसो की मजबूरी दुनिया
साथ तुम्हारे होकर लगती पहली बार ज़रूरी दुनिया

दुनिया में तुम हो तो दुनिया, दुनिया जितनी गोल, सरल है
वरना सुख का हर इक लम्हा,दु:ख की ताज़ा एक ग़ज़ल है
हम ये अब तक बूझ न पाए चन्दा या चातक पागल है
तुमको देखा तब ये जाना, दोनों एक प्रश्न का हल हैं
जैसे-तैसे काट रही थी जीवन की मजदूरी दुनिया
तुमको पाकर यूं महकी है, जैसे हो कस्तूरी दुनिया

पहली बार सुने हैं हमने आज हवा के पागल घुंघरू
पहली बार उतारे हमने आंखों से आंखों में आंसू
पहली बार मिली बतियाती फूलों से फूलों की ख़ुशबू
पहली बार हुआ है हमपर बातों ही बातों में जादू
बीच हमारे और तुम्हारे कल बोती थी दूरी दुनिया
अब आंखों-आंखों में देती प्यार भरी मंज़ूरी दुनिया

© मनीषा शुक्ला

26 Sept 2018

मीठा काग़ज़

हमसे पूछो दिन में कितने दिन, रातों में कितनी रातें
हमसे पूछो कोई ख़ुद से कर सकता है कितनी बातें

हमने याद किसी को कर के आंखों से हैं रातें नापी
दिन उसके बिन जैसे केवल है सूरज की आपा-धापी
उसके चाकर चाँद-सितारे, दुनिया उसके पीछे भागे
देख उसी को रोज़ उजाला, आंखें मलते-मलते जागे
हमसे पूछो,धरती-अम्बर में होती है काना-फूसी
हमने देखा है दोनों को उसके बारे में बतियाते

उसकी ख़ातिर ही बाँधे हैं खिड़की पर तारों ने झालर
सपने धानी हो जाते हैं दो पल उन आंखों में रहकर
उसकी ख़ातिर ही आँगन में भोर खिली है चम्पा बनकर
उसकी ख़ातिर ही बरखा ने पहनी है बूंदों की झांझर
उसके होठों पर सजती हैं खुशियों की सारी चौपालें
और थके सब आंसू उसकी पलकों पर बिस्तर लगवाते

काग़ज़ मीठा हो जाता है उसका नाम लिखा जाए तो
बातें ख़ुशबू हो जाती हैं उसके होंठों पर आए तो
मुस्कानों की उम्र बढ़ी है जबसे उसने होंठ छुए हैं
दोष किसी को देना क्या, हम पागल अपने-आप हुए हैं
अगर प्रतीक्षा में बैठें हम, शायद प्राण बचा लें अपने
लेकिन इतना तय है उसको पाकर तो हम मर ही जाते

© मनीषा शुक्ला

9 Sept 2018

प्यार हुआ है

ऐसे थोड़ी रंग अचानक
मन को भाने लग जाते हैं
ऐसे थोड़ी चंचल भौरें
खिलती कलियां ठग जाते हैं
ऐसे थोड़ी कोई बादल
धरती चूमें पागल होकर
ऐसे थोड़ी नदिया का मन
छू आता है कोई कंकर
ऐसे थोड़ी बातों में रस, गीतों में श्रृंगार हुआ है
मेरी मानो, प्यार हुआ है

ऐसे थोड़ी चीजें रखकर
कोई रोज़ भुला देता है
ऐसे थोड़ी कोई चेहरा
हमको रोज़ रुला देता है
ऐसे थोड़ी जल कर रोटी
रोज़ तवे पर मुस्काती है
ऐसे थोड़ी कॉफी में अब
शक्कर ज़्यादा हो जाती है
ऐसे थोड़ी टेढ़ा-मेढ़ा दुनिया का आकार हुआ है
मेरी मानो, प्यार हुआ है 

ऐसे थोड़ी कोई किस्सा
प्रेम-कहानी हो जाता है
ऐसे थोड़ी दो आंखों में
कोई दरपन खो जाता है
ऐसे थोड़ी एक गुलाबी
काग़ज़ पर कुछ मन आता है
ऐसे थोड़ी सूरज बिंदिया,
चन्दा कंगन बन जाता है
ऐसे थोड़ी ह्रदय सियाना, पागल सब संसार हुआ है
मेरी मानो, प्यार हुआ है 

ऐसे थोड़ी फ़िल्मी गाने
होंठों पर ठहरा करते हैं
ऐसे थोड़ी नैन हमारे
ख्वाबों का पहरा करते हैं
ऐसे थोड़ी नाम किसी का
लिखते हैं कॉपी के पीछे
ऐसे थोड़ी साथ किसी के
चल देते हैं आंखें मीचें
ऐसे थोड़ी इक क़तरे का लहज़ा पारावार हुआ है
मेरी मानो, प्यार हुआ है 

© मनीषा शुक्ला

10 Aug 2018

कौन

कौन है जो अक्षरों को मंत्र करता जा रहा है
कौन है जो गीत में पल-पल उतरता जा रहा है

कौन, जिसको छू, अपावन होंठ अमृत हो रहे हैं
दीप-से दो नैन नभ में चाँद-तारे बो रहे हैं
कौन है जिससे बिछड़कर, फूल पर है रात रोई
कौन, जिसकी थपकियों पर स्वप्न सारे सो रहे हैं
कौन, जिसको ताकता है चन्द्रमा भी कनखियों से
कौन, जिसके रूप से दरपन संवरता जा रहा है

कौन, जिसके बोलने से, हो रहे हैं शब्द सोना
कौन है जिसकी पलक में है क्षितिज का एक कोना
कौन, जिसका रूप पाकर देह धरती हैं उमंगें
कौन दुनिया को सिखाता, बाँह भर विस्तार होना
कौन छूकर पूरता है सोलहों सिंगार तन में
कौन, जिसको चूमकर यौवन निखरता जा रहा है

कौन, जिसने तितलियों पर, रंग छिड़के प्यार वाले
कौन डाली पर सजाता, फूल हरसिंगार वाले
डूबकर किसमें हमारी कामनाएं तर रही हैं
कौन देता कीकरों को ढंग सब कचनार वाले
कौन, जिससे जोड़ बंधन ब्याहता सब दुःख हुए हैं
कौन है जो आंसुओं से मांग भरता जा रहा है

© मनीषा शुक्ला

18 Jul 2018

गोपालदास नीरज

अब पीड़ा के आलिंगन में कौन ह्रदय से बात करेगा
अब उत्सव के मदिर अधर पर कैसे कोई गीत धरेगा

अब यौवन की बेचैनी से कौन गुथेगा आखर-माला
आखों से रिसते काजल का हाथ बटाएँ कौन उजाला
दुनिया के आंसू की गठरी अब कांधे पर कौन उठाए
निर्मोही बादल को जाके कौन धरा की पीर सुनाए
अब कैसे गीतों से होकर मन तक आएगी पुरवाई
अब कैसे कानों से होकर नैनों में नीरज उतरेगा

अब कैसे जब जेठ मिला तो, हंसकर सावन मान करेगा
अब कैसे मुस्काता मोती, आंसू का सम्मान करेगा
अब पीड़ा के राजकुंवर की कैसे होगी रूपकुमारी
ख़ुश्बू का क्या, जब उपवन ने कर ली चलने की तैयारी
अब कैसे कोई दिन के माथे को चुम्बन से दुलराए
अब कैसे कोई रजनी की अलकों में मधुमास भरेगा

अब किसके होंठों को छूकर सारा जग मधुबन बांचेगा
अब किसकी पीड़ा की पाती दुःख का पूरा कुल जांचेगा
धरती फिर से गीत-प्रसूता अब किस रोज़ बनेगी जाने
अब कोई कैसे जाएगा उठकर हर दिन गीत कमाने
अब कैसे दो अक्षर लिखकर कोई काग़ज़ महकाएगा
अब कैसे कोई भी तिनका आंधी से संग्राम लड़ेगा

© मनीषा शुक्ला

12 Jun 2018

अब हमारी प्यास रीती

ओ लबालब नेह से भरते, उफनते, टूटते तट!
अब हमारी प्यास रीती।

तब तुम्हारे ही लिए थी, ओस तिनके से चुराई
बूंद बरखा की सहेजी, याद से सांसे तराईं
अब नयन के गांव में कोई नहीं रहता तुम्हारा
आंख के हर एक आंसू की हुई दु:ख से सगाई
अनसुनी कुछ याचनाओं पर हृदय को कोसना मत,
जो गई, वो बात बीती।

भाग्य है सबका, तुम्हारा दोष कुछ भी तो नहीं है
जो हमारा था, कहीं है, जो तुम्हारा था, कहीं है
आज स्वीकारो यही अंतिम निवेदन वेदना का
स्वप्न जो मिल के जना था, कल उसी की तेरही है
हो गए हमसे पराजित आज जीवन और तर्पण,
पर विरह की रात जीती।

आज हम में और तुम में प्रेम दुहराया गया है
रो दिए जब-जब बिछड़कर, तब हमें गाया गया है
आज फिर निश्चित रचेगा प्रेम में इतिहास कोई
देह से सम्बन्ध मन का आज ठुकराया गया है
प्रेम है असहाय तब से, जब नियति ने भाग्यरेखा,
पत्थरों के हाथ दी थी।

© मनीषा शुक्ला

29 Mar 2018

क्या पाए मन?

अब गीतों में रस उतरा है,
अब कविता में मन पसरा है
हम सबकी पहचान हुए हैं,
हम सबके प्रतिमान हुए हैं
हम नदिया की रेत हुए हैं,
हम पीड़ा के खेत हुए हैं
आंसू बोकर हरियाए मन,
तुमको खो कर क्या पाए मन?

जब हमने उल्लास मनाया लोग नहीं मिल पाएं अपने
सबकी आँखों को भाते हैं कुछ आँखों के टूटे सपने
होती है हर जगह उपेक्षित मधुमासों की गीत, रुबाई
होकर बहुत विवश हमने भी इन अधरों से पीड़ा गाई
अब टीसों पर मुस्काए मन
अब घावों के मन भाए मन
तुमको खोकर क्या पाए मन?

हमने भाग्य किसी का, अपनी रेखाओं में लाख बसाया
प्रेम कथा को जीवन में बस मिलना और बिछड़ना भाया
हमको तो बस जीना था, फिर संग तुम्हारे मर जाना था
जीवन रेखा को अपने संग इतनी दूर नहीं आना था
अब सांसों से उकताए मन
जीते-जीते मर जाए
मन तुमको खोकर क्या पाए मन?

सुनते हैं, तुम भाल किसी के इक सूरज रोज़ उगाते हो
टांक चन्द्रमा, नरम हथेली मेहंदी रोज़ सजाते हो सुनते हैं,
उस भाग्यवती की मांग तुम्हारा ही कुमकुम है
बीता कल है प्रेम हमारा यादों में केवल हम-तुम हैं
उन यादों से भर आए मन
अक्सर उन पर ललचाए मन
तुमको खोकर क्या पाए मन?

© मनीषा शुक्ला

17 Jan 2018

आ मिलो अब मीत मुझसे!

लो, गईं संवेदनाएँ जीत मुझसे
मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!

है ज़रा-सा ही सही पर पे्रम का आभास अब
नीर नयनों का चला है, भोगने हर प्यास अब
तुम अगर कुछ कर सको मेरे लिए, इतना करो
इंच-भर सूरज अंधेरे की हथेली पर धरो
रौशनी क्यों लग रही भयभीत मुझसे?

मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!
कंठ तक अब आ गए हैं वेदना के स्वर प्रिये!
मैं भटकती नींद के संग, रात-भर बिस्तर लिए
आज आकुलता तुम्हारी बह रही है रक्त बन
आ बसे हैं आज मुझमें क्या तुम्हारे, प्राण-तन
हो रहा शायद तभी नवगीत मुझसे
मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!

हाय कैसे, तुम शिला से थे, निभाते प्रीत तब
मौन के द्वारे तिरस्कृत हो रहे थे मंत्र जब
प्रार्थना की हद हुई, पत्थर नहीं नीरज हुआ
उस घड़ी भी क्यों नहीं तुमसे विदा धीरज हुआ
जब नहीं ईश्वर हुआ अभिनीत मुझसे!
मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!

© मनीषा शुक्ला

12 Jan 2018

कोई आता नहीं लौटकर

"शहर से कोई आता नहीं लौटकर"
बात ऐसी अगिन झूठ कर आए तुम
प्रीत पर पीर की जब परत जम गई
तब किसी बीज-से फूटकर आए तुम

मानसी पर प्रतीक्षा चिरांकित किए
प्रेम के दृश्य मन ये रहा खींचता
आस ही त्रास में झूलता था हृदय
युग गए बीतते, पल नहीं बीतता
तोड़कर चल पड़े स्वप्न जिस नैन के
अब उसी नैन में टूटकर आए तुम

एक छवि शेष तो थी हृदय में कहीं
व्यस्तता से विवश हो दिया था भुला
हँस पड़ी हर रुआंसी प्रतीक्षा, यहां
गढ़ रहा है समय इक नया चुटकुला
थक गए नेह, अनुनय-विनय जिस जगह
आए भी तो प्रिये रूठकर आए तुम

मानकर नियति के देवता का कहा
हार, सुधि ने समय का हलाहल पिया
भाग्यवश ही कुँवारी रही कामना
पीर ने प्रेम का जब वरण कर लिया
प्रीत को छांव का था वहीं आसरा
जिस प्रणय-वृक्ष को ठूंठ कर आए तुम

© मनीषा शुक्ला