शौर्य का इतिहास लिखना था हमें अपने लहू से
इसलिए हम प्रेम की गाथा अधूरी छोड़ आए
उत्सवों की आंख गीली, प्रेम का त्योहार रूठा
चाँद की चूड़ी दिलाना फिर उसे इस बार छूटा
हम कलेजे को कलेजे से लगाकर रो न पाए
मज़हबों की साज़िशों ने प्यार का संसार लूटा
पंखुरी से होंठ, उलझी लट, नए मेहंदी-महावर
काम जाने और भी कितने ज़रूरी छोड़ आए
गांव का पनघट, कहीं आँगन तरसता छोड़ आए
हम किसी की आँख में सावन बरसता छोड़ आए
छोड़ आए हम बुढ़ापे को दिलासे के सहारे
अनसुनी किलकारियां, यौवन लरजता छोड़ आए
थी बसन्ती रंग से रँगनी हमें ये ज़िंदगानी
हम प्रणय की सेज पर सपने सिंदूरी छोड़ आए
मां! तुम्हारी आंख का तारा, सितारा बन गया है
मृत्यु का अभिमान, जीवन का दुलारा बन गया है
भारती की आरती जिससे उतारी जा सकेगी
अब पिता के ख़ून का क़तरा अँगारा बन गया है
एक अम्बर में नहीं दो सूर्य शोभित हो सकेंगे
इसलिए धरती-गगन के बीच दूरी छोड़ आए
© मनीषा शुक्ला
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14 Feb 2019
15 Dec 2018
मनाही
चन्द्रमा को पा सशंकित दीप-तारे सब डरे हैं
सूर्य को अब सूर्य कहने की मनाही हो गई है
रश्मियों की शुद्धता की जांच पर बैठे अंधेरे
सांझ को संदेह, कैसे दूधिया इतने सवेरे
रात को अवसर मिला है, भोर को कुल्टा बुलाए
चाँद पर दायित्व है ये, सूर्य पर धब्बे उकेरे
तय हुआ अपराध, बाग़ी हो गया है अब उजाला
और उस पर जुगनूओं की भी गवाही हो गई है
फूल की शुचिता, यहां पर विषलता अब तय करेगी
छू गया है कौन आँगन, देहरी निर्णय करेगी
छांव की निर्लज्जता, जाकर बताती धूप जग को
आज से जूठन प्रसादों पर नया संशय करेगी
बाढ़ बनकर फैलती संवेदनाएँ रोकने को
एक पत्थर की नदी फिर से प्रवाही हो गई है
आरती कितनी कुलीना, अब बताएंगी चिताएँ
आंधियां बतलाएँ घूँघट को कि कितना मुख दिखाएँ
अब नगरवधूएं सिखाएंगी सलीक़ा रानियों को
नग्नता बतला रही है शील को, थोड़ा लजाएँ
रोज़ सच के चीखने से हो न जाए कान बहरे
इसलिए आवाज़ पर ही कार्यवाही हो गई है
सूर्य को अब सूर्य कहने की मनाही हो गई है
रश्मियों की शुद्धता की जांच पर बैठे अंधेरे
सांझ को संदेह, कैसे दूधिया इतने सवेरे
रात को अवसर मिला है, भोर को कुल्टा बुलाए
चाँद पर दायित्व है ये, सूर्य पर धब्बे उकेरे
तय हुआ अपराध, बाग़ी हो गया है अब उजाला
और उस पर जुगनूओं की भी गवाही हो गई है
फूल की शुचिता, यहां पर विषलता अब तय करेगी
छू गया है कौन आँगन, देहरी निर्णय करेगी
छांव की निर्लज्जता, जाकर बताती धूप जग को
आज से जूठन प्रसादों पर नया संशय करेगी
बाढ़ बनकर फैलती संवेदनाएँ रोकने को
एक पत्थर की नदी फिर से प्रवाही हो गई है
आरती कितनी कुलीना, अब बताएंगी चिताएँ
आंधियां बतलाएँ घूँघट को कि कितना मुख दिखाएँ
अब नगरवधूएं सिखाएंगी सलीक़ा रानियों को
नग्नता बतला रही है शील को, थोड़ा लजाएँ
रोज़ सच के चीखने से हो न जाए कान बहरे
इसलिए आवाज़ पर ही कार्यवाही हो गई है
© मनीषा शुक्ला
15 Aug 2018
#happy_independence_day
वीरों की गाथा गाती हूँ
कर कंठ स्वरा चन्दन-चन्दन, जय भारत माता गाती हूँ
आकार मिला चाहे मध्यम
व्यवहार रहा सबसे उत्तम
अरबों की इस आबादी का
बस एक तिरंगा है परचम
केसर की क्यारी से लेकर
केरल के धानी आँचल तक
गुजराती गरबा से लेकर
अरुणारे उस अरुणाचल तक
जन-गण-मन अधिनायक जय हो, हे भाग्य विधाता गाती हूँ
© मनीषा शुक्ला
कर कंठ स्वरा चन्दन-चन्दन, जय भारत माता गाती हूँ
आकार मिला चाहे मध्यम
व्यवहार रहा सबसे उत्तम
अरबों की इस आबादी का
बस एक तिरंगा है परचम
केसर की क्यारी से लेकर
केरल के धानी आँचल तक
गुजराती गरबा से लेकर
अरुणारे उस अरुणाचल तक
जन-गण-मन अधिनायक जय हो, हे भाग्य विधाता गाती हूँ
© मनीषा शुक्ला
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