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14 Sept 2020

हमने दो आंखों में पूरी दुनिया देखी है

लम्हों में कट जाने वाली सदियां देखी है
सागर की बाहों में कलकल नदिया देखी है
दुनिया वालो तुम देखो सूरज-चाँद-सितारे
हमने दो आंखों में पूरी दुनिया देखी है

तुम्हारे नाम की चिट्ठी, हमारे नाम

अगर तुम दर्द दे दो सब दवाएँ काम आ जाए
तुम्हारी याद में कुछ नींद को आराम आ जाए
इन्हीं बदनामियों में नाम हम कर जाएं जो इक दिन
तुम्हारे नाम की चिट्ठी, हमारे नाम आ जाए

©मनीषा शुक्ला

प्यार में दिल ये टूटे, दुआ कीजिए

इश्क़ है गर ख़ता, ये ख़ता कीजिए
प्यार में दिल ये टूटे, दुआ कीजिए
डूबकर उसकी आँखों के सैलाब में
मौत को ज़िन्दगी से बड़ा कीजिए

©मनीषा शुक्ला

17 Jan 2019

तीरगी आसान कर लें हम

अगर हो रोशनी तो तीरगी आसान कर लें हम
मिले इक ख़्वाब, सारी नींद का नुकसान कर लें हम
सुना है दिल धड़कता है, सुना है जान जाती है
हमें इक बार हो तो इश्क़ की पहचान कर लें हम

©मनीषा शुक्ला

26 Sept 2018

मीठा काग़ज़

हमसे पूछो दिन में कितने दिन, रातों में कितनी रातें
हमसे पूछो कोई ख़ुद से कर सकता है कितनी बातें

हमने याद किसी को कर के आंखों से हैं रातें नापी
दिन उसके बिन जैसे केवल है सूरज की आपा-धापी
उसके चाकर चाँद-सितारे, दुनिया उसके पीछे भागे
देख उसी को रोज़ उजाला, आंखें मलते-मलते जागे
हमसे पूछो,धरती-अम्बर में होती है काना-फूसी
हमने देखा है दोनों को उसके बारे में बतियाते

उसकी ख़ातिर ही बाँधे हैं खिड़की पर तारों ने झालर
सपने धानी हो जाते हैं दो पल उन आंखों में रहकर
उसकी ख़ातिर ही आँगन में भोर खिली है चम्पा बनकर
उसकी ख़ातिर ही बरखा ने पहनी है बूंदों की झांझर
उसके होठों पर सजती हैं खुशियों की सारी चौपालें
और थके सब आंसू उसकी पलकों पर बिस्तर लगवाते

काग़ज़ मीठा हो जाता है उसका नाम लिखा जाए तो
बातें ख़ुशबू हो जाती हैं उसके होंठों पर आए तो
मुस्कानों की उम्र बढ़ी है जबसे उसने होंठ छुए हैं
दोष किसी को देना क्या, हम पागल अपने-आप हुए हैं
अगर प्रतीक्षा में बैठें हम, शायद प्राण बचा लें अपने
लेकिन इतना तय है उसको पाकर तो हम मर ही जाते

© मनीषा शुक्ला

18 Apr 2018

आदाब नींदों के


न तो सूरज हुए इनके, न हैं महताब नींदों के
हमें मुद्दत हुई, आए नहीं आदाब नींदों के
हमारी और उनकी नींद का हासिल यही बस है
उधर हैं ख़्वाब नींदों में, इधर हैं ख़्वाब नींदों के

©मनीषा शुक्ला

27 Mar 2018

जिस दिन तुम पर गीत लिखेंगे

मन से मन जब मिल जाएगा, काग़ज़ पर भी मन
आएगा जिस दिन तुम पर गीत लिखेंगे, अक्षर-अक्षर बतियाएगा

तुमको पढ़कर मौन हुई हैं, कविता की सारी उपमाएं
गीत हमारे सोच रहे हैं, गीत-सद्य को कैसे गाएं?
हमने ग़ज़लों से भी पूछा, मन की बात कहो तो जानें
मिसरा-मिसरा आज चला क्यों, सांसे लेकर जीवन गाने
सब अर्थों को शब्द मिलेंगे, वो दिन भी इक दिन आएगा
थाम कलाई, दिल का कोना, तुमसे अक्सर बतियाएगा

हम शब्दों के सौदागर हैं, जितना जीते, उतना गाते
आंसू का सत्कार किए बिन, प्रेम कथा में कैसे आते?
कुछ-कुछ कच्चा, कुछ-कुछ पक्का, अनुभव हममें दीख रहा है
जैसे बचपन का पहनावा, यौवन से कुछ सीख रहा है
हम रह जाएं अनबोले तो इसमें कोई शोक न होगा
तुम अपनी हमसे कह लेना, हमसे ईश्वर बतियाएगा 

हम सीता हो जाएं तब तक, राम बने रह पाओगे क्या?
हम गंगा बन जाएंगे, तुम शिव बनकर सह पाओगे क्या?
जिस दिन हम सीखेंगे नैनों से नैनों की भाषा पढ़ना
लोग उसी दिन छोड़ चलेंगे मंदिर बीच शिलाएं धरना
अपनी मन्नत के द्वारे पर, देव बनेंगे पाहुन इक दिन
प्रीत हमारी रंग लाएगी, पत्थर-पत्थर बतियाएगा

© मनीषा शुक्ला

4 Mar 2018

धीर धरना

जब फलित होने लगे उपवास मन का,
धीर धरना!

मौन से सुनने लगो जब एक उत्तर, मुस्कुराना!
चैन से मिलने लगें दो नैन कातर, मुस्कुराना!
एक पल में, सांस जब भरने लगे मन के वचन सब
पीर से जब सीझनें लग जाएं पत्थर, मुस्कुराना!
बस प्रलय से एक बिंदु कम, नयन में नीर भरना,
धीर धरना!

चन्द्रमा के पग चकोरी की तरफ चलने लगेंगे
नैन के भी नैन में प्रेमी सपन पलने लगेंगे
क्या सहा है प्रेम ने बस इक मिलन को, देखकर ही,
छटपटा कर, इस विरह के प्राण ख़ुद गलने लगेंगे
सीख जाएंगे मुरारी, बांसुरी की पीर पढ़ना,
धीर धरना!

खेलने को हर घड़ी सब वार कर प्रस्तुत रहा है
जीतता केवल तभी जब भाग्य भी प्रत्युत रहा है
काम है ये हर सदी में कुछ निराले बावलों का
प्रेम में सब हार कर सब जीतना अद्भुत रहा है
एक तिनके के भरोसे, जिंदगी भर नीड़ गढ़ना,
धीर धरना!

© मनीषा शुक्ला

18 Feb 2018

अधिकार

बस मुझे तुम प्रेम का अधिकार देना,
मैं संवर लूँ।

सौंपना चाहो जिसे, उपनाम उसको सौंप देना
दो मुझे वनवास, राजा राम उसको सौंप देना
जागने दो हर कंटीला स्वप्न मेरे ही नयन में
मांगती हूँ मैं तपस्या, धाम उसको सौंप देना
बस मुझे दो बाँह तक विस्तार देना,
मैं बिखर लूँ।

भान है मुझको, चरण की धूल सिर धरते नहीं हैं
राजमहलों के कलश, हर घाट पर भरते नहीं हैं
गन्ध भर ले देह में या रूप से ही स्नान कर लें,
केतकी के फूल फिर भी शिव ग्रहण करते नहीं हैं
देह माटी नेह की, आकार देना,
मैं निखर लूँ।

आज प्यासी हूँ, तभी तो मांगती हूँ मेह तुमसे
प्रीत है नवजात जिसमें, प्राण मुझसे, देह तुमसे
फिर नहीं अवसर मिलेगा साधने को यह समर्पण
फिर नहीं धरती चलेगी, मांगने को गेह तुमसे
बाद में तुम प्राण का उपहार देना,
मैं अगर लूँ।

© मनीषा शुक्ला

13 Feb 2018

खो नहीं जाना कभी तुम!

ढूँढ़ना आसान है तुमको बहुत, पर मीत मेरे,
खो नहीं जाना कभी तुम!

पीर की पावन कमाई, चार आँसू, एक हिचकी
मंत्र बनकर प्रार्थनाएँ मंदिरों के द्वार सिसकी
पर तुम्हारी याचनाओं को कहाँ से मान मिलता
देवता अभिशप्त हैं ख़ुद, और है सामथ्र्य किसकी?
शिव नहीं जग में, प्रणय जो सत्य कर दे
मांगने हमको नहीं जाना कभी तुम!

तृप्ति से चूके हुए हैं, व्रत सभी, उपवास सारे
शूल पलकों से उठाए, फूल से तिनके बुहारे
इस तरह होती परीक्षा कामनाओं की यहाँ पर
घंटियों में शोर है पर देवता बहरे हमारे
महमहाए मन, न आए हाथ कुछ भी
आस गीली बो नहीं जाना कभी तुम!

जग न समझेगा, मग़र हम जानते हैं मन हमारा
प्रीत है पूजा हमारी, मीत है भगवन हमारा
हम बरसते बादलों से क्यों कहें अपनी कहानी
है अलग ही प्यास अपनी, है अलग सावन हमारा
गुनगुनाएँ सब, न समझे पीर कोई
गीत का मन हो नहीं जाना कभी तुम!

© मनीषा शुक्ला

28 Jan 2018

पातियां अधर पर

तुम न पढ़ पाओ, तुम्हारा दोष होगा
पातियां हमने अधर पर छोड़ दी हैं

मुस्कराहट में मिलाकर टीस थोड़ी छोड़ आए
जोड़ लेना तुम किसी दिन, हम स्वयं को तोड़ आए
हो सके तो उन सभी संबोधनों की लाज रखना
इंगितों की राह लेकर जो तुम्हारी ठौर आए
मौन के सत्कार से श्रृंगार देना
बोलियां हमने अधर पर छोड़ दी हैं

वर्ण माला ने दिए हैं शब्द हमको सब दिवंगत
एक राजा, एक रानी, इस कहानी में असंगत
हम अकथ ही रह गए इस बार भी, हर बार जैसे
रातरानी, रात को ही दे न पाई गंध-रंगत
किंतु तुमसे बात अब खुलकर करेंगी
चुप्पियां हमने अधर पर छोड़ दी हैं

एक अनबोली निशानी,जब कभी भी याद आए
कुछ तुम्हारा सा तुम्हीं में, गर हमारे बाद आए
जान लेना कुछ ग़लत है ज़िन्दगी के व्याकरण में
श्लोक में आनंद के यदि पीर का अनुवाद आए
मत सहेजो अब नई कटुता यहां पर
मिसरियां हमने अधर पर छोड़ दी हैं

© मनीषा शुक्ला

29 Oct 2017

नभ की पीर लिए वसुधा को कोई सावन छू निकला


आज तुम्हारे दो नैनों का
हमको चुम्बन छू निकला
मन की देहरी को जैसे
भावों का आंगन छू निकला

आज नहीं आह्लाद है कोई, ना ही कोई उत्सव
बिना किसी त्यौहार भला क्यों गूँजे मन में कलरव
तन दमका कुंदन के जैसा
सांसे चंदन छू निकला

मिली भाग्य से हमको-तुमको इक जैसी रेखाएं
जन्म-जन्म में तुम्हे मिलें हम, तुमको ही हम पाएं
मिले हमें तुम, ज्यों प्राणों को
पूजन-तर्पण छू निकला

अनुष्ठान सी छुअन तुम्हारी, पत्थर भी हो पावन
देह छुई, साँसों को दे बैठे इक मधुर निवेदन
नभ की पीर लिए वसुधा को
कोई सावन छू निकला

© मनीषा शुक्ला

23 Oct 2017

शब्द के संताप

तुम अजन्मे, हम अमर युग-युग रहे हैं
श्वास के अभिशाप दोनों ने सहे हैं

मुक्त शब्दों को अधर से बिन किए तुम
औ‘ प्रलय का नीर नैनों में लिए हम
अनलिखे तुम और हम भी अनकहे हैं
शब्द के संताप दोनों ने सहे हैं

तुम विवशता से बँधे तटबँध जैसे
हम निभाते धार के अनुबँध जैसे
तुम अडिग, हम छू किनारों को बहे हैं
कूल के परिमाप दोनों ने सहे हैं

दे सके ना तुम हमें वर कोई ऐसा
देव ! कर पाता हमें जो एक जैसा
देवता बन तुम, मनुज बन हम दहे हैं
भाग्य के परिताप दोनों ने सहे हैं

© मनीषा शुक्ला

28 Aug 2017

प्यास का आदर

प्रीत के अनुप्रास का आदर किया
आज जल ने प्यास का आदर किया

नेह का सत्कार जब तुमने किया
उंगलियों ने थाम लीं तब उंगलियां
इक पहर तक थी अकेली नींद, अब
साथ इनके आस, सपने, लोरियां
चैन ने संत्रास का आदर किया
आज जल ने प्यास का आदर किया

हम विकलता के सजीले चित्र थे
और तुम तपलीन विश्वामित्र थे
हम अभागी भूमिजा युग-युग रहीं
तुम सदा श्रीराम थे, सौमित्र थे
धीर ने उच्छवास का आदर किया
आज जल ने प्यास का आदर किया

© मनीषा शुक्ला