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28 Jul 2021

नयन से दूर दुखी काजल

नयन से दूर दुखी काजल
बिन साजन के सजनी जैसे रुनझुन बिन पायल

जैसे ख़ुश्बू से हो जाए साँसों की कुछ अनबन
या फिर हाथों से ही जैसे रूठ गया हो कंगन
तुम बिन सारी खुशियाँ मुझसे रूठ गईं हैं ऐसे
ज़्यादा ख़र्चों से जैसे रूठे हों थोड़े पैसे

अब या तो मुझको मिल जाओ, या कर दो पागल

जैसे पूजा के शगुनों में पड़ जाए कुछ अड़चन
सीने में थक कर रुक जाए चलते-चलते धड़कन
ठोकर से पल भर में जैसे दरके कोरा दरपन
दुनियादारी में खो जाए जैसे मन का कचपन
खोई हूँ; जैसे आँखों में सपनों का जंगल


तुम बिन कोई भी तो मुझको देख नहीं पाता है
और पते से मेरे हर ख़त बैरंग ही जाता है
सुनती हूँ, इस बार शहर में ज़्यादा बरसा पानी
मेरी इन प्यासी आँखों की है सारी नादानी

फिर भी मन सूखा है जैसे बिन पानी बादल


©मनीषा शुक्ला

24 Jun 2021

निंदिया छू मंतर

हुई है निंदिया छू मंतर
रात छतों पर टाँग रही है तारों के झूमर !

यादों की टकसाल हुई है दो आँखों की जोड़ी
बेचैनी के हाट जिया में; चैन न फूटी कौड़ी
सारी रैन लगा रहता है सपनों पर जुर्माना
करवट से भरना पड़ता है बिस्तर का हर्जाना

काले धन जैसा अँधियारा, चँदा है फुटकर

गूँगा हो कंगन, जैसे पायल को लकवा मारे
बिंदिया उतनी लाल नहीं, कुछ फीके हैं लश्कारे
हारी मैं तो, लाख जतन कर गलहारों से हारी
और नहीं देखी जाती अब झुमके की लाचारी

क्या बिरहन का रूप सँवारें सोने के ज़ेवर

रात पहन ली पुरवाई ने ख़ुश्बू वाली साड़ी
या शायद लौटी थी पगली छूकर देह तुम्हारी
जमुहाई से फूल बिखरते; महकी है अँगड़ाई
छूकर तुमको आज हमारी साँसे बहुत लजाई

आज न बीते रैन, ग़लत हो घड़ियों का अटकर

©मनीषा शुक्ला

22 Jun 2021

हीर बूढ़ी हो गई है

हर प्रतीक्षा अब समय की देहरी को लाँघती है
देह के संग अब हृदय की पीर बूढ़ी हो गई है

बिन तुम्हारे भी धड़कता है कलेजा; जान पाई
अब नहीं रहती वहाँ पर एक भी धड़कन पराई
हो गया अरसा तुम्हारी याद से बिछड़े हुए भी
आज पहली बार बिन रोए मुझे भी नींद आई

जो हमें बाँधे हुए थी एक कच्ची डोर जैसे
अब समर्पण की वही ज़ंजीर बूढ़ी हो गई है

आँसुओं में अब हँसी के फूल भी खिलने लगे हैं
एक कमरे से मुझे मेरे निशाँ मिलने लगे हैं
पत्तियों की देह पर फिर ओस के चुंबन सजे हैं
दूर; उड़ने को क्षितिज के पँख भी हिलने लगे हैं

अब विरह की आग में वैसी अगन बाक़ी नहीं है
हो न हो अब प्यार की तासीर बूढ़ी हो गई है

साथ कैसा भी रहे, मिलता वही जो छूटता है
प्रेम होते ही लकीरों से विधाता रूठता है
है अमर वो ही कहानी जो रही आधी-अधूरी
गीत भी मीठा वही जिसमें कलेजा टूटता है

तुम उधर राँझा हुए लौटे न अब तक जोग लेकर
आँख रस्ते पर गड़ाए हीर बूढ़ी हो गई है

©मनीषा शुक्ला

27 May 2021

तुम गए...

भोर की देह कुछ सांवली हो गई
रात पर रात का रंग चढ़ता नहीं
तुम गए, बुझ गए दीप आकाश के
चाँद भी रोशनी में उतरता नहीं 

अब अमलतास रहने लगा है दुखी
धूप से बोलती ही न सूरजमुखी
अब कहीं भी न सेमल दहकता मिले
रंग करने लगा रूप से बेरुखी

तुम गए तोड़कर हर नदी का भरम
झील में कोई मुखड़ा सँवरता नहीं

प्यास के काम आती दुआ ही नहीं
बादलों को हवा ने छुआ ही नहीं
तुम गए, खो गई है ज़मीं की नमी
ज्यों कि सावन कभी भी हुआ ही नहीं

थक गए रोज़ चलकर समय के चरण
पास पल भर, कोई पल ठहरता नहीं

हर घड़ी बर्फ़ सी गल रही है उमर
ओस जैसे टिकी कास के फूल पर
भाग्य में शीत का सूर्य था; इसलिए
शाम ज़्यादा हुई, कम हुई कुछ सहर

प्रेम करना सभी को सुहाता अगर
कोई मिलकर किसी से बिछड़ता नहीं

© मनीषा शुक्ला


25 May 2021

फिर याद आते हो तुम

रातरानी खिली आज फिर
आज फिर याद आते हो तुम

एक सपना कि जैसे नयन से मिले
देह जैसे अचानक छुअन से मिले
मिल रहे तुम हमें आज कुछ इस तरह
टूटकर चैन जैसे थकन से मिले

लो हथेली थमा दी तुम्हें
चाँद-सूरज उगाते हो तुम ?

आ रही हैं तुम्हें क्या अभी हिचकियाँ
क्या चुभा पैर में द्वार का सातिया
क्या तुम्हें भी चिढ़ाती मिली हैं कभी
एक-दूजे से उलझी हुई खिड़कियाँ

जो तुम्हें याद करती, उसे
किस तरह भूल जाते हो तुम?

प्यार करना, नहीं कुछ जताना कभी
रूठना, पर नहीं है मनाना कभी
है नदी की अगर प्यास से दोस्ती
तो हमें भी हुनर ये सिखाना कभी

मैं लगा ना सकूँ आलता
किस तरह जी लगाते हो तुम?

©मनीषा शुक्ला

24 Dec 2020

किसी ने देखा टूटा चाँद

किसी ने देखा टूटा चाँद
अम्बर के कोने में सिमटा रूठा-रूठा चाँद

चिंगारी से रूठ गया हो जैसे घर का चूल्हा
मुझसे रूठ गया है चँदा ज्यों दुल्हन से दूल्हा
लाड़ लड़ाऊँ या फिर ख़ूब सुनाऊँ मीठा-कोसा
या उसके माथे पर रख दूँ इन आँखों का बोसा

दुनिया के हिस्से में आए मेरा जूठा चाँद!


पूरा, आधा और कभी तो दिखता है चौथाई
और कभी ग़ुम हो जाता; बदली की ओढ़ रज़ाई
ऐसे साजन से कोई भी कैसे प्रीत लगाए
इक पल में 'साथी'; दूजे पल में 'मामा' बन जाए

तीजे पल पलने में खेले चूस अँगूठा चाँद !

इतनी सी थी बात इसी पर रूठा है हरजाई
सबसे आँख बचाकर मिलने छत पर रात न आई
क्या बतलाऊँ, घात लगाए बैठा था ध्रुव तारा
मैंने जल्दी में उसको ही 'मेरा चाँद' पुकारा

सचमुच ही तबसे गुस्सा है झूठा-मूठा चाँद !

©मनीषा शुक्ला

14 Sept 2020

वो घर से आज तुझको याद करने निकला है

फ़क़ीर दिल को भी शहज़ाद करने निकला है
मेरी तनहाइयाँ आबाद करने निकला है
ये कहने आई थी हिचकी मुझे तसल्ली रख
वो घर से आज तुझको याद करने निकला है

©मनीषा शुक्ला

हमने दो आंखों में पूरी दुनिया देखी है

लम्हों में कट जाने वाली सदियां देखी है
सागर की बाहों में कलकल नदिया देखी है
दुनिया वालो तुम देखो सूरज-चाँद-सितारे
हमने दो आंखों में पूरी दुनिया देखी है

तुम्हारे नाम की चिट्ठी, हमारे नाम

अगर तुम दर्द दे दो सब दवाएँ काम आ जाए
तुम्हारी याद में कुछ नींद को आराम आ जाए
इन्हीं बदनामियों में नाम हम कर जाएं जो इक दिन
तुम्हारे नाम की चिट्ठी, हमारे नाम आ जाए

©मनीषा शुक्ला

हमारा दिल न संभलेगा, मग़र तुम जान मांगोगे

मुहब्बत के लिए इंसान से भगवान मांगोगे
उधर दिल भी चुराओगे, कहीं ईमान मांगोगे
इसी मासूमियत पर मत मिटे हैं, जानते हैं हम
हमारा दिल न संभलेगा, मग़र तुम जान मांगोगे

©मनीषा शुक्ला

प्यार में दिल ये टूटे, दुआ कीजिए

इश्क़ है गर ख़ता, ये ख़ता कीजिए
प्यार में दिल ये टूटे, दुआ कीजिए
डूबकर उसकी आँखों के सैलाब में
मौत को ज़िन्दगी से बड़ा कीजिए

©मनीषा शुक्ला

12 Sept 2020

याद करते, भूल जाते


ऊब जाती है घड़ी ठहरा हुआ लम्हा बिताते
कट रहे हैं दिन किसी को याद करते, भूल जाते

फिर महक लेकर किसी की हैं सुबह ने केश धोए
रात भर रो कर गगन ने मोतियों के बीज बोए
फिर किसी तस्वीर के सब रंग फूलों में मिले हैं
उस हँसी में ही खनकती धूप ने आँचल भिगोए
रात का चंदा न जाने अब कहाँ, किस ठौर होगा
बीतता है दिन किसी के साथ सूरज को निभाते 

फिर हुआ भारी किसी को याद करके साँझ का मन
दौड़कर परछाइयों के साथ कुछ थक-सा गया तन
रौशनी को दे विदाई लौटता सूरज अभागा
पोंछता है आँख, पानी में नदी के देख दरपन
टूटते ज़िंदा सितारे, प्रेम में असहाय होकर
रौशनी के वास्ते हैं चांद को ईंधन बनाते

फिर हवाएँ छेड़ती हैं गंध डूबी रातरानी
होंठ पर फिर कसमसाई एक भूली-सी कहानी
फिर अंधेरा चांदनी की चाशनी में घुल रहा है
लाँघता है फिर नयन की देहरी दो बून्द पानी
याद आई ज़िन्दगी के छंद से ख़ारिज जवानी
फिर कटेगी रात पूरी गीत कोई गुनगुनाते 

©मनीषा शुक्ला

8 Sept 2020

थाली के बैंगन

सजन तुम रूप, तुम्हीं यौवन
झाँकू रोज़ नयन में, देखूँ मनचाहा दरपन

चूल्हे में संसार पड़े; मैं मोती रोज़ लुटाऊँ
दूध नहाऊँ, पूत फलूँ मैं, सौ सौभाग कमाऊँ
धरती के चक्कर में चंदा, धरती चाहे सूरज
एक हमारी जोड़ी ही सबको लगती है अचरज

राम मिलाए जोड़ी अपनी ज्यों पानी-चंदन

तुमको नजर न लागे बालम बैरी हुआ जमाना
सीता, चंपा, मधुबाला की बातों में मत आना
तुमको देख खुला करता है महलों का चौबारा
गोरा रंग हुआ जामुन सा, ऐसे कौन निहारा

रोज़ तुम्हें अब लगवाऊँगी काजल का उबटन

जो थाली पर माता है, जो मधुमासों में रम्भा
वक़्त पड़े तो बन जाती है वो भी चंडी-अम्बा
साथ तुम्हारे जीना-मरना दोनों कर सकती हूँ
लेकिन तुमको बिन मारे मैं कैसे मर सकती हूँ?

रहना मेरी ओर सदा ओ 'थाली के बैंगन' !

©मनीषा शुक्ला

26 Jun 2020

तुम गए जबसे

तुम गए जबसे, सुबह सूरज जलाना भूल बैठी
तुम गए तबसे, अंगीठी चाँद की ठंडी पड़ी है

तुम गए क्या, रात ने गेसू नहीं तबसे सँवारे
बिन तुम्हारे बोझ लगते हैं गगन को ये सितारे
तुम गए जबसे लहर ने होंठ अपने सी लिए हैं
तुम गए जबसे, नदी से दूर बैठे हैं किनारे

तुम गए जबसे, न कहती रात से कुछ रातरानी
तुम गए तबसे, बगीचे में हिना गूँगी खड़ी है

तुम गए तो खुशबुओं ने फूल से अनुबंध तोड़े
तितलियों ने रंग की कारीगरी के काम छोड़े
तुम गए जबसे, हवा ने पँख गिरवी रख दिए हैं
तुम गए, सब मंज़िलों ने रास्तों से हाथ जोड़े

तुम गए जबसे, न गाया गीत कोई भी हृदय से
तुम गए तबसे, अधर से बाँसुरी हरदिन लड़ी है

कर रहा मन ख़र्च कोई रोज़ तुमको याद करके
चुक गई है नींद सारी आँसुओं का ब्याज भरके
तुम गए हो, अब न तोड़ेंगी कभी उपवास आँखें
तुम गए, सब थम गया है, साँझ तक भी दिन न सरके

तुम गए जबसे, समय की देह नीली पड़ गई है
तुम गए तबसे, बहुत धीमी कलाई की घड़ी है

©मनीषा शुक्ला

15 Jun 2020

तुम्हारी यादों का सामान

तुम्हारी यादों का सामान
खिड़की को साँसे देता है, दीवारों को कान

हरजाई अख़बार कि जिससे घण्टों बतियाते हो
नासपिटी शतरंज, नहीं तुम जिससे उकताते हो
बैरी चश्मा पल भर को भी नैन न छोड़े ख़ाली
छूकर होंठ तुम्हारे आई चाय भरी ये प्याली
और तुम्हारी टेबल पर मुस्काता मीठा पान
तुम्हारी यादों का सामान

काट रही है बालकनी वनवास तुम्हारा दिन भर
गमले की चंपा की ख़ातिर सौत तुम्हारा दफ़्तर
अलग लगे दरवाज़े की घण्टी को छुअन तुम्हारी
और तुम्हारे बिन लगता है समय घड़ी को भारी
तुम लौटो तो आ जाती है घर में फिर से जान
तुम्हारी यादों का सामान

अधखुलती खिड़की से लिपटे पर्दे की उलझन में
तुम साँसों के चन्दन में, तुम नैनों के दरपन में
तुम तकिए की ख़ुश्बू में, तुम सिलवट में चादर की
तुम घर में, तुम में रहती है परछाईं इस घर की
नाम लिखी तख़्ती की भी है तुमसे ही पहचान
तुम्हारी यादों का सामान

©मनीषा शुक्ला

11 Jun 2020

तुम सँजो लो!

हर घड़ी जिसको लुटाती जा रही है भाग्यरेखा;
हो सके तो तुम सँजो लो!

जिस नयन में एक आँसू भी नहीं ठहरा ख़ुशी से
पढ़ रहे हैं होंठ जिसके, मंत्र तर्पण के अभी से
दान ऐसा; जो अखरता ही रहा बस याचना को
मौन ऐसा; कह न पाया बात अपनी जो किसी से

मर गया वह दुःख अभागा, आज भरकर आँख रो लो!
हो सके तो तुम सँजो लो!

एक सूरज के लिए जलता रहा आकाश सारा
और धरती माँगती ही रह गई कोई सितारा
बाँटनेवाला बहुत अनुदार अपनी भूमिका में
मिल गए दोनों जहाँ, पर दे न पाया वह किनारा

अब तुम्हीं बढ़कर ज़रा आकुल क्षितिज के पँख खोलो!
हो सके तो तुम सँजो लो!

अब समर्पित है तुम्हीं को, चाह लो या राह अपनी
धर्म ख़ुश्बू का बिखरना, कब उसे परवाह अपनी
तुम निठुर हो भी गए तो मन बनेगा आज बादल
ख़ूब बरसेंगे नयन जो सह न पाए दाह अपनी

आज इस गीले हृदय में प्रार्थना के बीज बो लो !
हो सके तो तुम सँजो लो!

©मनीषा शुक्ला

17 May 2020

किसी की जान लेनी हो तो उसको प्यार करते हैं

हमीं राहें बनाते हैं , हमीं दुश्वार करते हैं
सज़ा भी जानते हैं पर ख़ता हर बार करते हैं
किसी से प्यार करते हैं तो उस पर जान देते हैं
किसी की जान लेनी हो तो उसको प्यार करते हैं

©मनीषा शुक्ला


26 Apr 2020

बिछड़ने का वादा करना

बिछड़ने का वादा करना,
इतना भी आसान नहीं था, जीवन भर मरना!

जैसे कोई नाव बिछड़कर लहरों से पछताए
नदिया को तो पार करे पर तट पर डूबी जाए
गीली लकड़ी सा कोई जैसे मन को सुलगाए
तेल बिना बाती पर जैसे अँधियारा मुस्काए
पागल होकर परछाईं को बाँहों में भरना!

अम्बर के सीने में जैसे कोई चाँद छिपाए
भीतर जेठ तपे, जीने पर सावन शोर मचाए
अंगारा कोई जैसे शबनम की माँग सजाए
निरवंशी सपना कोई आँखों से प्रीत लगाए
अनरोया आँसू पलकों की कोरों पर धरना!

जिस पानी में आग नहीं वो कैसे प्यास बुझाए
मेघ बिना बदली, प्रिय बिन, विधवा मधुमास कहाए
बिन प्राणों के साँस किसी का जीवन क्या महकाए
हर पूजन का भाग्य कहाँ जो मनचाहा वर पाए
लेकिन तुम बिन क्या पाना, क्या खोने से डरना!

©मनीषा शुक्ला

4 Mar 2020

करोगे तब भी मुझसे प्यार?

करोगे तब भी मुझसे प्यार?
ढल जाएगा रूप, बदन पर रोएगा सिंगार!
करोगे तब भी मुझसे प्यार?

झुर्री वाला चाँद नहीं जब दरपन को भाएगा
नैनों के बदले नैनों से चश्मा टकराएगा
फिल्मी गीतों की धुन पर जब गाऊँगी चौपाई
ड्रेसिंग टेबल पर रक्खूँगी मरहम और दवाई
स्वेटर बुनने में बीतेगा मेरा हर इतवार!
करोगे तब भी मुझसे प्यार?

जब बालों से झाँकेगा थोड़ा-थोड़ा उजियारा
आँखों की झांईं से हारेगा काजल बेचारा
झीने-झीने सुर में थक कर जब कोयल गाएगी
धरकर हाथ कमर पर कोई नदिया सुस्ताएगी
एल्बम बनकर रह जाएगा सुधियों का संसार!
करोगे तब भी मुझसे प्यार?

गर तुमको, ठग लेगी मुझसे कोई उमर गुजरिया
फिर तो इश्क़-मुहब्बत, कच्चा सौदा है सांवरिया
सोच-समझ लो, फिर मत कहना, कर बैठे नादानी
सपनों की खेती में लगता है आँखों का पानी
क्या मुट्ठी में रख पाओगे, लम्हों की रफ्तार?
जताना तब ही मुझसे प्यार!

©मनीषा शुक्ला

12 Feb 2020

न इतना प्यार कर मुझसे, कहीं मर ही न जाऊं मैं

नज़र की बात होंठों से भला कैसे बताऊं मैं
ज़माने को पता है जो, वही कैसे छिपाऊं मैं
कहीं ऐसा न हो, मेरे बिना फिर जी न पाए तू
न इतना प्यार कर मुझसे, कहीं मर ही न जाऊं मैं

©मनीषा शुक्ला