Showing posts with label Political Satire. Show all posts
Showing posts with label Political Satire. Show all posts

14 Sept 2020

हमारे मुल्क़ में भगवान की तस्वीर बिकती है

कहीं पर ख़्वाब बिकते हैं, कहीं ताबीर बिकती है
ज़रूरत के मुताबिक भूख की तासीर बिकती है
ज़माना सीख ले हमसे इबादत की सही सूरत
हमारे मुल्क़ में भगवान की तस्वीर बिकती है

©मनीषा शुक्ला

24 May 2020

हर किसी की आँख में है एक टुकड़ा घर



हर किसी की आँख में है एक टुकड़ा घर

पेट में ईंधन नहीं पर पैर चलते हैं
मंज़िलों की चाह में रस्ते मचलते हैं
दुधमुँहे को ख़ून देकर पालती ममता
धूप में तपते बदन को सालती ममता
रोटियों में देखती तस्वीर सपनों की
हाय! थकने ही न देती फ़िक़्र अपनों की
जीभ से बिखरे निवाले को उठाते जब
सीज जाता है सड़क का भी कलेजा तब
इस सफ़र को देख रोया मील का पत्थर

ख़ुद मुसाफ़िर हैं, बनाते दूसरों के घर
है थकन इनआम इनका, भूख है ज़ेवर
हर महल की नींव में, दीवार, ज़ीने में
हैं अजब ये लोग, हँसते हैं पसीने में
ज़िन्दगी है ख़्वाब, साँसे ही हकीक़त हैं
ये रहें ज़िंदा, यही इनकी ज़रूरत है
योजनाओं में हमेशा आख़िरी दिखता
शून्य, जिस पर देश का सारा गणित टिकता
गिनतियों में छूट जाता है यही अक्सर

पटरियों पर लाश 'शायद' आदमी की है
मौत से बदतर कहानी ज़िन्दगी की है
देह पर कुछ बोटियाँ जिनकी सलामत हैं
वो चुनावी वोट हैं, इतनी ग़नीमत है
लोग ज़िंदा थे, तरक़्क़ी बस यही तो थी
आदमी की ज़ात अब तक 'आदमी' तो थी
हर तरफ़ आँसू दिलासे को तरसते हैं
दीप जलते, फूल मातम पर बरसते हैं
हो गई छाती सियासत की बहुत ऊसर

©मनीषा शुक्ला

28 Feb 2020

आग से अनुबंध होगा

हो न हो, इन मालियों का आग से अनुबंध होगा,
बिजलियों को पाँव देकर, क्यारियों तक भेजते हैं!

लाल, पीले- सा नहीं है, फूल कांटें-सा नहीं है
इस चमन की ख़ुश्बुओं पर ख़ून का धब्बा नहीं है
खादियों से टोपियों तक एक ही चिंता सभी को
अब सियासत के लिए कोई नया मुद्दा नहीं है
इक तमाशा है तबाही, रुक न जाए, इसलिए बस
आशियाने को यही चिंगारियों तक भेजते हैं

रोटियाँ माँगे न कोई, हाथ में तलवार दे दो!
उन्नति की नाव डूबे, धर्म की पतवार दे दो!
आदमी को आदमी से है बहुत ख़तरा यहाँ पर
जो न मानें, तुम उन्हें बस आज का अख़बार दे दो!
डिग्रियां लेकर न कोई माँग ले अधिकार अपने
इसलिए ये अक़्ल को लाचारियों तक भेजते हैं

बो रहे इंसानियत के वक्ष पर बंदूक हर दिन
मंदिरों औ' मस्जिदों को देखने हैं और दुर्दिन
क्या हवन, कैसी नमाज़ें, किसलिए काशी, मदीना?
स्वार्थ में घिरकर हुईं हैं प्रार्थनाएँ आज कोढ़िन
मारने-मरने चले जो, वो कहाँ इनके सगे हैं
शौक़ से ये गर्दनों को आरियों तक भेजते हैं!

©मनीषा शुक्ला

22 Jan 2019

गीत गाना है ज़रूरी!

राजपथ पर सिसकियों के शव सजाना है ज़रूरी
गीत गाना है ज़रूरी!

भूख के आगे परोसे जब दिलासे देखती हूँ
देश के यौवन भ्रमित, बचपन रुआँसे देखती हूँ
रोज़ टुकड़े देखती हूँ न्याय के, न्यायालयों में
सीलती हर आँख में कुछ ख़्वाब प्यासे देखती हूँ
एक चिंगारी कहीं से ढूंढ़ लाना है ज़रूरी
गीत गाना है ज़रूरी!

देवता को भी यहाँ पर घर मिलेगा, तय हुआ है
बेटियाँ बाहर न घूमेंगी, यही निर्णय हुआ है
जानवर को मारना अपराध, मारो आदमी को
आज जाकर देश के गणतंत्र से परिचय हुआ है
सो रही इस भीड़ को फिर से जगाना है
ज़रूरी गीत गाना है ज़रूरी!

चूड़ियों को बेचकर राशन ख़रीदा जा रहा है
हर विवेकानंद क़िस्मत की दिहाड़ी पा रहा है
राजशाही में बहुत से दोष थे, बस इसलिए ही
लूटने को देश, अब जनतंत्र सीधा आ रहा है
मैं क़लम हूँ, सो समय पर चेत जाना है
ज़रूरी गीत गाना है ज़रूरी!

© मनीषा शुक्ला

8 May 2018

निर्णय

फूल जिसके, गंध जिसकी, मेल खाएगी हवा से
अब यही हुआ है, बस वही उपवन हँसेगा

मालियों को कह रखा है, बीज वे अनुकूल बोएं
जो चुनिंदा उंगलियों में चुभ सकें, वो शूल बोएं
छांव का सौदा करें जो, पात हों वे टहनियों पर
जो उखड़ जाएं समय पर, वृक्ष वो निर्मूल बोएं
जो सदा आदेश पाकर बेहिचक महका करेगा
अब यही निर्णय हुआ है, बस वही चन्दन हँसेगा

है वही जुगनू, सदा जो रौशनी का साथ देगा
भोर को बांटे उजाला, रात के घर रात देगा
जो अंधेरा देख कर आँखें चुरा ले, सूर्य है वह
दीप जो तम से लड़ेगा, प्राण को आघात देगा
जो हमेशा धूप का आगत लिए तत्पर रहेगा
अब यही निर्णय हुआ है, बस वही आँगन हँसेगा

हर क़लम वैसा लिखेगी, जो उसे बतलाएंगे वे
जो चुनेंगे राह अपनी, कम प्रशंसा पाएंगे वे
स्याहियो! लेकर लहू तैयार बैठो तुम अभी से
चोट जनवादी बनाएगी अगर, बन जाएंगे वे
जो उन्हीं के गीत का स्वर साधकर कोरस बनेगा
अब यही निर्णय हुआ है, बस वही लेखन हँसेगा

© मनीषा शुक्ला