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13 Sept 2020

समझौता

कल नदी के तीर पर दो दीप देखे मुस्कुराते
एक पल में सौ जनम के साथ की कसमें उठाते

कल जिएंगे या मरेंगे; ये न जाने क्या करेंगे
जब प्रणय के देवता अंगार फूलों पर धरेंगे
रेत पर सतिया बनाकर, चूमते हैं भाग्यरेखा
ये भला शुभ-लाभ वाली अटकलों से क्या डरेंगे
हैं बहुत भोले, न कुछ भी जानते हैं ये अभागे
बीत जाएगी उमर सरसों हथेली पर उगाते

कल ज़माना रीतियों की दे रहा होगा दुहाई
प्रेम के इस रूप को कुल मान लेगा जग-हँसाई
नेह के व्यापार में सम्बन्ध की बोली लगेगी
जीत जाएगी अँगूठी, हार जाएगी सगाई
बेबसी की चीख पर भारी पड़ेंगे मंत्र के स्वर
शव उठेगा हर वचन का, धूम से, गाते-बजाते

एक कोना मन हमेशा एक-दूजे से छिपाकर
ज़िन्दगी पूरी जिएँगे, रोज़ आधा प्यार पाकर
एक-दूजे में तलाशेंगे हमेशा तीसरे को
एक-दूजे को मिलेंगे ये हमेशा और कमतर
फिर किसी दिन ज़िन्दगी से आँख मिलने पर कहेंगे
एक समझौता हुआ था, बस उसी को हैं निभाते

©मनीषा शुक्ला

26 Apr 2020

बिछड़ने का वादा करना

बिछड़ने का वादा करना,
इतना भी आसान नहीं था, जीवन भर मरना!

जैसे कोई नाव बिछड़कर लहरों से पछताए
नदिया को तो पार करे पर तट पर डूबी जाए
गीली लकड़ी सा कोई जैसे मन को सुलगाए
तेल बिना बाती पर जैसे अँधियारा मुस्काए
पागल होकर परछाईं को बाँहों में भरना!

अम्बर के सीने में जैसे कोई चाँद छिपाए
भीतर जेठ तपे, जीने पर सावन शोर मचाए
अंगारा कोई जैसे शबनम की माँग सजाए
निरवंशी सपना कोई आँखों से प्रीत लगाए
अनरोया आँसू पलकों की कोरों पर धरना!

जिस पानी में आग नहीं वो कैसे प्यास बुझाए
मेघ बिना बदली, प्रिय बिन, विधवा मधुमास कहाए
बिन प्राणों के साँस किसी का जीवन क्या महकाए
हर पूजन का भाग्य कहाँ जो मनचाहा वर पाए
लेकिन तुम बिन क्या पाना, क्या खोने से डरना!

©मनीषा शुक्ला

12 Jan 2019

मेरी ख़ातिर मत रो

इस उपवन की हर सोनजुही अब कांटो से विस्थापित है
मेरी ख़ातिर मत रो अम्बर! मेरी धरती अभिशापित है

मेरी जानिब बढ़ता तारा, टूटे बिन लौट नहीं पाया
मेरी रातों के हिस्से में केवल टूटा सपना आया
हर दिन मेरा आधा चन्दा, रोता है मुझसे दूर कहीं
हर दिन मैंने पीड़ा का सुख, पूरा भोगा, आधा गाया
मेरी तृष्णा का मोल नहीं, मेरे घट का सम्मान नहीं
मेरी ख़ातिर मत रो बादल! मेरा सावन प्रतिबन्धित है

चन्दा से चातक की दूरी, गा-गा कर मुझको कहनी थी
पल भर आराम न हो मन को, पीड़ा उपजा कर सहनी थी
सपनों को पलकें देनी थी, पानी की प्यास बुझानी थी
नैनों ने मेरे दम पर ही काजल की रेखा पहनी थी
मेरा आंसू ही सम्बल है, हिचकी पर ठहरी सिसकी का
मेरी ख़ातिर मत रो कलरव ! मेरा उत्सव अपमानित है

सबका अनरोया रोना था, जीवन ही आंसू करना था
जलकर सूरज पिघलाना था, मेघों में नीरज भरना था
जाने कब से दुखियारे दुःख, मेरा रस्ता गुहराते थे
सुख के चौराहों से मुझको, बस आँखे मूंद गुज़रना था
मेरी सांसों का बोझ रहा प्राणों के हर इक झोंके पर
मेरी ख़ातिर मत रो जीवन! मेरा मरना प्रस्तावित है

© मनीषा शुक्ला

23 Jul 2018

गीत हैं बदनाम मेरे

प्यार, पूजा, प्रीत, परिणय, हैं बहुत से नाम मेरे
तुम मुझे मत गुनगुनाना, गीत हैं बदनाम मेरे

मैं तुम्हारी सभ्यताओं में सदा वर्जित रहा हूँ
लांछनों का गढ़ बना हूँ, पीर का अर्जित रहा हूँ
मैं कुंआरी कोख से जन्में हुए अभिशाप जैसा
बन न पाया, मिट न पाया, भाग्य में सर्जित रहा हूँ
नेह में दिन-रात पगती, प्रेम से परमेश ठगती
शबरियाँ मेरी हुई हैं और उनके राम मेरे

मैं वही, जो हर हृदय में उग गया हूँ, बिन उगाए
पुण्य हूँ मैं वो जिसे सब, पाप कह कर हैं छुपाए
ज्ञान के उर में समाई मेनका का रूप हूँ मैं
आयु का वह मोड़ हूँ जिसपर हिमालय डगमगाए
प्रेम का सत्कार लेते, बन मनुज अवतार लेते
देवता मेरे हुए हैं और उनके धाम मेरे

मैं वही, जिसका दिया जग को सदा संदेश तुमने
ताजमहलों में सजाए प्रेम के अवशेष तुमने
चाँद की होगी चकोरी, जातियों की शर्त पर ही
किस हवा का कौन सा गुल, दे दिए निर्देश तुमने
न्याय से अन्याय पाते, डालियों पर झूल जाते
शव सभी मेरे हुए हैं और सब परिणाम मेरे

© मनीषा शुक्ला

3 May 2018

शुभकामनाएँ

हार कर हमको गया जो, है उसे शुभकामनाएँ
प्रेम के हर इक समर में, वो अधूरी जीत पाए

होंठ पर कलियां खिलाए, पीर बस पोसे नयन में
चन्दनी बाँहें गहे फिर कसमसा जाए घुटन में
प्राण के बिन देह जैसा, बिन समर्पण प्रेम पाए
फूल को अंगिया लगाए तो चुभन पाए छुअन में
सौंप कर हमको गया जो, पीर की पावन कथाएँ
गीत हमको कर गया जो, वो हमेशा गीत गाए

रूठने वाला मिले ना, वो जिसे जाकर मनाए
मोल पानी का रही हैं, प्यास की सम्भावनाएँ
चाह कर भी कर न पाए प्रेम का सम्मान अब वो
देवता बिन लौट जाएं, अनछुई सब अर्चनाएँ
इक नदी जो मांगने इक बूंद सागर, द्वार आए
एक आंसू भी न बरसे, वो उसी दिन रीत जाए

एक पत्थर पूजने को, एक पत्थर ही मिलेगा
हां! उसे इक दिन हमारे नेह का वर भी फलेगा
रेत पर लगते नहीं हैं बाग हरसिंगार वाले
इक बसंती प्रार्थना से, कब तलक पतझर टलेगा ?
चांद को ख़ाली कटोरा, अश्रु को पानी बताए
शेष ये ही कामना है, वो, उसी-सा मीत पाए

© मनीषा शुक्ला

8 Apr 2018

हमको देख के तुम मुस्काए थे

आशाओं के सागर से बस ख़ाली सीप उठाए थे
हम तो जीते-जीते, जीवन जीने से उकताए थे
उस पल जाना, इक पल मरना फिर जी जाना कैसा है
जाते-जाते मुड़कर हमको देख के तुम मुस्काए थे

©मनीषा शुक्ला

5 Apr 2018

आज अंतिम रात साथी

प्रेम के हर इक वचन की, आज अंतिम रात साथी
आज कुछ मत शेष रखना!

आज से ख़ुद पर जताना, तुम स्वयं अधिकार अपने
सौंप कर संकल्प सारे, हम चले संसार अपने
आज से हम हो रहे हैं, इक नदी के दो किनारे
आज अपनी बाँह में ही बांध लो अभिसार अपने
आज से केवल नयन में नेह के अवशेष रखना
आज कुछ मत शेष रखना!

चांद से अब मत उलझना, याद कर सूरत हमारी
अब नदी की चाल में मत ढूंढना कोई ख़ुमारी
अब नहीं रंगत परखना धूप से, कच्चे बदन की
अब हमारी ख़ुश्बुओं से हो चलेंगे फूल भारी
मात्र सुधियों में हमारे श्यामवर्णी केश रखना
आज कुछ मत शेष रखना!

देखकर पानी बरसता, आज से बस मन रिसेगा
अब हमेशा प्रेम के हर रूप पर दरपन हंसेगा
मेघ की लय पर सिसकती बूंद अब छम-से गिरेगी
आज जूड़े में ज़रा-सा अनमना सावन कसेगा
है कठिन अब बिजलियों के प्राण में आवेश रखना
आज कुछ मत शेष रखना!

© मनीषा शुक्ला

18 Feb 2018

अधिकार

बस मुझे तुम प्रेम का अधिकार देना,
मैं संवर लूँ।

सौंपना चाहो जिसे, उपनाम उसको सौंप देना
दो मुझे वनवास, राजा राम उसको सौंप देना
जागने दो हर कंटीला स्वप्न मेरे ही नयन में
मांगती हूँ मैं तपस्या, धाम उसको सौंप देना
बस मुझे दो बाँह तक विस्तार देना,
मैं बिखर लूँ।

भान है मुझको, चरण की धूल सिर धरते नहीं हैं
राजमहलों के कलश, हर घाट पर भरते नहीं हैं
गन्ध भर ले देह में या रूप से ही स्नान कर लें,
केतकी के फूल फिर भी शिव ग्रहण करते नहीं हैं
देह माटी नेह की, आकार देना,
मैं निखर लूँ।

आज प्यासी हूँ, तभी तो मांगती हूँ मेह तुमसे
प्रीत है नवजात जिसमें, प्राण मुझसे, देह तुमसे
फिर नहीं अवसर मिलेगा साधने को यह समर्पण
फिर नहीं धरती चलेगी, मांगने को गेह तुमसे
बाद में तुम प्राण का उपहार देना,
मैं अगर लूँ।

© मनीषा शुक्ला

3 Feb 2018

अबूझा प्रश्न

जब समय गढ़ने चलेगा पात्र नूतन
तुम नहीं देना कभी परिचय हमारा

धर चलेगी अंजुरी पर अंजुरी सौभाग्यबाला
प्रेम की सुधियां चुनेंगी बस उसी दिन घर-निकाला
इक कुलीना मोल लेगी रीतियों से हर समर्पण
जीत कर तुमको नियति से, डाल देगी वरणमाला
ओढ़नी से जोड़ लेगी पीत अम्बर,
और टूटेगा वहीं निश्चय हमारा

मांग भरना जब कुँआरी, देखना ना हाथ कांपे
मंत्र के उच्चारणों को, यति हृदय की भी न भांपे
जब हमारी ओर देखो, तब तनिक अनजान बनना
मुस्कुराएँगी नयन में बदलियां कुछ मेघ ढांपे
जग नहीं पढ़ता पनीली चिठ्ठियों को
तुम समझ लेना मग़र आशय हमारा

स्वर्गवासी नेह को अंतिम विदाई सौंप आए
अब लिखे कुछ भी विधाता, हम कलाई सौंप आए
अब मिलेंगे हर कसौटी को अधूरे प्राण अपने
हम हुए थे पूर्ण जिससे वो इकाई सौंप आए
उत्तरों की खोज में है जग-नियंता
इक अबूझा प्रश्न है परिणय हमारा

© मनीषा शुक्ला

18 Jan 2018

याद रखना!

अब हमारी याद में रोना मना है
याद रखना!

हम तुम्हें उपलब्ध थे, तब तक सरल थे, जान लो
प्रश्न अनगिन थे तुम्हारे, एक हल थे, जान लो
एक पत्थर पर चढ़ाकर देख लो जल गंग का
हम तुम्हारे प्रेम में कितने तरल थे, जान लो
प्रेम में छल के प्रसव की पीर पाकर
बालपन में मर चुकी संवेदना है
याद रखना!

हम हुए पातालवासी इक तुम्हारी खोज में
प्राण निकलेंगे अभागे एक ही दो रोज़ में
साध मिलने की असंभव हो गई है,जानकर
भूख के मारे अनिच्छा हो गई है भोज में
पूर्ति के आगार पर होती उपेक्षित
बन चुकी हर इक ज़रूरत वासना
है याद रखना!

जो प्रमुख है, वो विमुख है, बस नियति का खेल है
पटरियां अलगाव पर हों, दौड़ती तब रेल है
जानकर अनजान बनना चाहता है मन मुआ
छोड़ चंदन, ज्यों लिपटती कीकरों से बेल है
भूल के आग्रह बहुत ठुकरा चुका है
कुछ दिनों से मन बहुत ही अनमना है
याद रखना!

© मनीषा शुक्ला

28 Nov 2017

जो भी था वह प्रेम ही था

इक अलग सा प्रेम था जो, मुझमें भी था, तुममें भी था
लोग चाहे कुछ कहें, पर जो भी था वह प्रेम ही था

जब अनैतिक और नैतिक के हों सब झंझट अनर्गल
ज्ञान को निःशब्द कर दे, प्रेम का इक प्रश्न अदना
एक ही पल में मिलें नन्हें सपन को पाँख अपने
चाह ले अम्बर धरा की दो भुजाओं में सिमटना
कौन उस पल ये बताये क्या गलत है, क्या सही था
लोग चाहे कुछ कहें, पर जो भी था, वह प्रेम ही था

जब नियम, सीमाएं सब लगने लगें निष्प्राण मन को
एक अकुलाहट पे हो मन का न्यौछावर धीर सारा
जब नयन के नीर की ऊष्मा ह्रदय के पास पहुंचे
धार को बंधन से ख़ुद ही मुक्त कर बैठे किनारा
एक अनरोया सा आँसू जब कहे मैं भी यहीं था
लोग चाहे कुछ कहें पर जो भी था वह प्रेम ही था

© मनीषा शुक्ला