सजाकर फूल राहों मे तुम्हारी खुद महकती है
तुम्हारे वास्ते हर रोज़ मीठे बेर रखती है
सुनो हे राम आने मे न करना देर अब ज़्यादा
यहाँ इक वावरी शबरी तुम्हारी राह तकती है
©मनीषा शुक्ला
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4 Aug 2020
26 Mar 2019
मंदोदरी की पीर
राम, रावण मारने को अब अगर आना धरा पर
दो घड़ी मंदोदरी की पीर से आँखे मिलाना
देखना वैधव्य पाकर तेज पर क्या बीतती है
द्वंद में पुरुषार्थ के देखो त्रिया क्या जीतती है
पुण्य को क्या-क्या मिला है, पाप की सहधर्मिणी बन
पूरने को हठ समंदर के नदी ही रीतती है
सौंप देना पत्थरों को जब समंदर के हवाले
हो सके तो बूंद भर उस नीर से आँखें मिलाना
एक जीवित माँ मिलेगी लाख पूतों के शवों पर
भाग्य पर रोते मिलेंगे हर जगह बिछुए महावर
मौन की चीत्कार बनकर लोरियां गाती मिलेंगी
देखना दुर्भाग्य सूनी गोदियों के साक्ष्य बनकर
तार आए हो अहिल्या, मृत शिला में प्राण भरकर
अब ज़रा जीवित शिला के धीर से आँखे मिलाना
जय पराजय हो किसी की, फ़र्क़ क्या विध्वंस तय था
हर किसी की देह में बस काठ का शायद ह्रदय था
धर्म ने जब रक्त का टीका लगाया भाल पर, तब
थम गया रण, चूड़ियों के टूटने का वह समय था
सातिए, तोरण सजाते द्वार पर जिसके विभीषण
उस किले की चीखती प्राचीर से आंखे मिलाना
© मनीषा शुक्ला
दो घड़ी मंदोदरी की पीर से आँखे मिलाना
देखना वैधव्य पाकर तेज पर क्या बीतती है
द्वंद में पुरुषार्थ के देखो त्रिया क्या जीतती है
पुण्य को क्या-क्या मिला है, पाप की सहधर्मिणी बन
पूरने को हठ समंदर के नदी ही रीतती है
सौंप देना पत्थरों को जब समंदर के हवाले
हो सके तो बूंद भर उस नीर से आँखें मिलाना
एक जीवित माँ मिलेगी लाख पूतों के शवों पर
भाग्य पर रोते मिलेंगे हर जगह बिछुए महावर
मौन की चीत्कार बनकर लोरियां गाती मिलेंगी
देखना दुर्भाग्य सूनी गोदियों के साक्ष्य बनकर
तार आए हो अहिल्या, मृत शिला में प्राण भरकर
अब ज़रा जीवित शिला के धीर से आँखे मिलाना
जय पराजय हो किसी की, फ़र्क़ क्या विध्वंस तय था
हर किसी की देह में बस काठ का शायद ह्रदय था
धर्म ने जब रक्त का टीका लगाया भाल पर, तब
थम गया रण, चूड़ियों के टूटने का वह समय था
सातिए, तोरण सजाते द्वार पर जिसके विभीषण
उस किले की चीखती प्राचीर से आंखे मिलाना
© मनीषा शुक्ला
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गीत
22 Sept 2018
सीढ़ियों पर वासनाएं, प्रार्थना बन आ रही हैं
सीढ़ियों पर वासनाएं, प्रार्थना बन आ रही हैं
मंदिरों में आज फिर से देवता कोई मरेगा
मन्थरा की जीभ फिर से एक नूतन स्वांग देगी
आज ममता स्वार्थ की हर देहरी को लांघ देगी
एक राजा की, पिता पर आज फिर से जीत होगी
कामनाएं, सूलियों पर नेह के शव टांग देगी
आज कुल वरदान का फिर से नपुंसक हो गया है
कैकई का मन किसी के प्राण लेकर ही भरेगा
पांडवों ने आज फिर से द्यूत का निर्णय किया है
वीरता ने आज फिर छल-दम्भ का परिचय दिया है
नीतियां सब लोभ का टीका लगाए घूमती हैं
हो अनैतिक पूर्वजों ने, मौन का आश्रय लिया है
आज अधनंगी हुई है फिर कहीं कोई विवशता
फिर कहीं कोई दुःशासन चीर कृष्णा की हरेगा
फिर कहीं दाक्षायणी ने चुन लिया है भाग्य, ईश्वर!
दक्ष ने फिर प्रण लिया है, शिव-रहित होगा स्वयंवर
प्रेम की वरमाल तनपर आज फिर धरती गहेगी
त्याग कर कैलाश को फिर आ गए हैं आज शंकर
आज श्रद्धा से हुई है यज्ञ में फिर चूक कोई
हो न हो, फिर आज कोई शिव कहीं तांडव करेगा
© मनीषा शुक्ला
मंदिरों में आज फिर से देवता कोई मरेगा
मन्थरा की जीभ फिर से एक नूतन स्वांग देगी
आज ममता स्वार्थ की हर देहरी को लांघ देगी
एक राजा की, पिता पर आज फिर से जीत होगी
कामनाएं, सूलियों पर नेह के शव टांग देगी
आज कुल वरदान का फिर से नपुंसक हो गया है
कैकई का मन किसी के प्राण लेकर ही भरेगा
पांडवों ने आज फिर से द्यूत का निर्णय किया है
वीरता ने आज फिर छल-दम्भ का परिचय दिया है
नीतियां सब लोभ का टीका लगाए घूमती हैं
हो अनैतिक पूर्वजों ने, मौन का आश्रय लिया है
आज अधनंगी हुई है फिर कहीं कोई विवशता
फिर कहीं कोई दुःशासन चीर कृष्णा की हरेगा
फिर कहीं दाक्षायणी ने चुन लिया है भाग्य, ईश्वर!
दक्ष ने फिर प्रण लिया है, शिव-रहित होगा स्वयंवर
प्रेम की वरमाल तनपर आज फिर धरती गहेगी
त्याग कर कैलाश को फिर आ गए हैं आज शंकर
आज श्रद्धा से हुई है यज्ञ में फिर चूक कोई
हो न हो, फिर आज कोई शिव कहीं तांडव करेगा
© मनीषा शुक्ला
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गीत
18 Feb 2018
अधिकार
बस मुझे तुम प्रेम का अधिकार देना,
मैं संवर लूँ।
सौंपना चाहो जिसे, उपनाम उसको सौंप देना
दो मुझे वनवास, राजा राम उसको सौंप देना
जागने दो हर कंटीला स्वप्न मेरे ही नयन में
मांगती हूँ मैं तपस्या, धाम उसको सौंप देना
बस मुझे दो बाँह तक विस्तार देना,
मैं बिखर लूँ।
मैं संवर लूँ।
सौंपना चाहो जिसे, उपनाम उसको सौंप देना
दो मुझे वनवास, राजा राम उसको सौंप देना
जागने दो हर कंटीला स्वप्न मेरे ही नयन में
मांगती हूँ मैं तपस्या, धाम उसको सौंप देना
बस मुझे दो बाँह तक विस्तार देना,
मैं बिखर लूँ।
भान है मुझको, चरण की धूल सिर धरते नहीं हैं
राजमहलों के कलश, हर घाट पर भरते नहीं हैं
गन्ध भर ले देह में या रूप से ही स्नान कर लें,
केतकी के फूल फिर भी शिव ग्रहण करते नहीं हैं
देह माटी नेह की, आकार देना,
मैं निखर लूँ।
राजमहलों के कलश, हर घाट पर भरते नहीं हैं
गन्ध भर ले देह में या रूप से ही स्नान कर लें,
केतकी के फूल फिर भी शिव ग्रहण करते नहीं हैं
देह माटी नेह की, आकार देना,
मैं निखर लूँ।
आज प्यासी हूँ, तभी तो मांगती हूँ मेह तुमसे
प्रीत है नवजात जिसमें, प्राण मुझसे, देह तुमसे
फिर नहीं अवसर मिलेगा साधने को यह समर्पण
फिर नहीं धरती चलेगी, मांगने को गेह तुमसे
बाद में तुम प्राण का उपहार देना,
मैं अगर लूँ।
प्रीत है नवजात जिसमें, प्राण मुझसे, देह तुमसे
फिर नहीं अवसर मिलेगा साधने को यह समर्पण
फिर नहीं धरती चलेगी, मांगने को गेह तुमसे
बाद में तुम प्राण का उपहार देना,
मैं अगर लूँ।
© मनीषा शुक्ला
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