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18 Jan 2018

याद रखना!

अब हमारी याद में रोना मना है
याद रखना!

हम तुम्हें उपलब्ध थे, तब तक सरल थे, जान लो
प्रश्न अनगिन थे तुम्हारे, एक हल थे, जान लो
एक पत्थर पर चढ़ाकर देख लो जल गंग का
हम तुम्हारे प्रेम में कितने तरल थे, जान लो
प्रेम में छल के प्रसव की पीर पाकर
बालपन में मर चुकी संवेदना है
याद रखना!

हम हुए पातालवासी इक तुम्हारी खोज में
प्राण निकलेंगे अभागे एक ही दो रोज़ में
साध मिलने की असंभव हो गई है,जानकर
भूख के मारे अनिच्छा हो गई है भोज में
पूर्ति के आगार पर होती उपेक्षित
बन चुकी हर इक ज़रूरत वासना
है याद रखना!

जो प्रमुख है, वो विमुख है, बस नियति का खेल है
पटरियां अलगाव पर हों, दौड़ती तब रेल है
जानकर अनजान बनना चाहता है मन मुआ
छोड़ चंदन, ज्यों लिपटती कीकरों से बेल है
भूल के आग्रह बहुत ठुकरा चुका है
कुछ दिनों से मन बहुत ही अनमना है
याद रखना!

© मनीषा शुक्ला

17 Jan 2018

आ मिलो अब मीत मुझसे!

लो, गईं संवेदनाएँ जीत मुझसे
मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!

है ज़रा-सा ही सही पर पे्रम का आभास अब
नीर नयनों का चला है, भोगने हर प्यास अब
तुम अगर कुछ कर सको मेरे लिए, इतना करो
इंच-भर सूरज अंधेरे की हथेली पर धरो
रौशनी क्यों लग रही भयभीत मुझसे?

मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!
कंठ तक अब आ गए हैं वेदना के स्वर प्रिये!
मैं भटकती नींद के संग, रात-भर बिस्तर लिए
आज आकुलता तुम्हारी बह रही है रक्त बन
आ बसे हैं आज मुझमें क्या तुम्हारे, प्राण-तन
हो रहा शायद तभी नवगीत मुझसे
मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!

हाय कैसे, तुम शिला से थे, निभाते प्रीत तब
मौन के द्वारे तिरस्कृत हो रहे थे मंत्र जब
प्रार्थना की हद हुई, पत्थर नहीं नीरज हुआ
उस घड़ी भी क्यों नहीं तुमसे विदा धीरज हुआ
जब नहीं ईश्वर हुआ अभिनीत मुझसे!
मिल सको तो आ मिलो अब मीत मुझसे!

© मनीषा शुक्ला

11 Dec 2017

Women's Day

बहुत आधुनकि हूँ। विश्वास रखती हूं आत्म-निर्भरता में।कहीं न कहीं अपने-आपको पुरुष के समतुल्य भी मानती हूँ । मग़र जाने क्यों मुंशी प्रेमचंद जी के उपन्यास गोदान की इस एक पंक्ति को झुठला नहीं पाईं...
"पुरुष में नारी के गुण आ जाएं तो वह महात्मा हो जाता है और अगर नारी में पुरुष के गुण आ जाएं तो वह कुलटा हो जाती है"
यथार्थ है ये। जिन दो कृतियों को ईश्वर ने बराबर नहीं बनाया, जाने क्यों हम उन्हें बराबर करना चाहते हैं। कितना अच्छा हो अगर हम "स्त्री" को केवल स्त्री मानकर उसे उसका वांछित सम्मान दें। क्यों माने कि वो पुरुषों की तरह मज़बूत है? उसे उसकी कोमलता के लिए सम्मान क्यों न दें? क्यों ये कहें की वो पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चल सकती है? ये क्यों न माने की सम्पूर्ण विश्व-विजय कर लेने के बाद, दुनिया के सारे कष्टों पर विजय पा लेने के बाद, जब पुरुषार्थ श्रांत हो जाएगा तो उसके अश्रुओं का सत्कार करने के लिए एक स्त्री का स्त्रीत्व ही शेष होगा। हम ये क्यों नहीं मान लेते कि जब अपनी कटुता एक पुरुष से स्वयं न सही जाएगी तो एक स्त्री ही होगी जो उसके जीवन में प्रेम का मधुमास घोलेगी।
हम स्त्रियां जाने क्यों सबको विश्वास दिलाना चाहतीं हैं कि हम हर वो काम कर सकतीं हैं जो पुरुष कर सकतें हैं। हम ये क्यों नही कहतीं कि जो हम स्त्रियां कर सकतीं हैं वो तुम पुरुषों से किसी जन्म में नहीं होगा और इसलिए हमारा सम्मान करो। हमारा सम्मान इसलिए करो क्योंकि हम जैसी हैं, सम्मान की भागी हैं, इसलिए मत करो कि हम तुम पुरुषों जैसी हैं या हम तुमसे कम नहीं हैं। 
निरुत्तर हूँ अभी भी इस प्रश्न को लेकर कि
"एक स्त्री को केवल एक स्त्री बनकर रहने में कष्ट क्यों हैं और इस समाज को एक स्त्री को उसका यथोचित सम्मान देने में आपत्ति क्यों है???"

© मनीषा शुक्ला