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7 Jun 2024

सूर्य हो तुम इस सदी के



जागते रहना तुम्हारा काम था; तुमने कहा था
सूर्य हो तुम इस सदी के!

हां; ज़रा सा कम सही लेकिन यहां उजियार तो था
था सितारों पर भरोसा; चांद से कुछ प्यार तो था
तुम चले आए बताने रोशनी के चोर हैं सब
पर हमारे हाथ में कुछ रात का उपचार तो था
रोशनी की लूट में थोड़े - बहुत शामिल रहे सब
तुम मगर सौ फ़ीसदी थे !

पेट भरने को चले सबका; भुनाई भूख अपनी
बोरियों पर अन्न के तुमने छपाई भूख अपनी
नोट बदले पर न बदली भूख की सूरत, मगर हां
पीठ पर कानून के तुमने उगाई भूख अपनी
शक्ल रोटी की किताबों में छपी है; और बच्चे
गीत गाते त्रासदी के!

थी बुरी आदत किसी की; आपकी नीयत बुरी है
आपको चस्का लहू का, और उनकी बांसुरी है
वो हमें सपने दिखाकर आसमां के; तोड़ते हैं
पर सियासत आपकी सच की ज़मीं ही ले उड़ी है
वो गए थे चूक भरसक नेकियों की ले सहूलत
तुम नहीं चूके बदी से !

20 Jan 2024

चिढ़ाती दफ़्तर की फ़ाइल

चिढ़ाती दफ़्तर की फ़ाइल
गायब है चेहरे से घर से आई वो स्माइल!

लंच टिफिन में आया लेकिन स्वाद किचिन में छूटा
बिन पानी के टीस रहा मेरे गमले का बूटा
ब्लेजर में घुटती जाती है सकुचाती सी चुन्नी
देख घड़ी हाथों में अब तो कंगन काटे कन्नी

चार दफ़ा; दो पल में समय दिखाता मोबाइल!

दिन ढल जाए कंप्यूटर पर करते-करते करतब
एक्सेल, वर्ड धरम है; अब तो डाटा अपना मज़हब
पिछली मीटिंग से छूटे; करनी है अगली मीटिंग
समय बचाते हैं करके हम संबंधों से चीटिंग

ज्यों मिट्टी से नज़र चुराए ऑफिस की टाइल!

सुबह चले, फिर साथ हमारे लौटे सूरज थककर
खुशियां सिमट गई हैं अपनी संडे, सैटरडे पर
शाम, सुबह देखी है, देख न पाए हम दोपहरी
ईएल, सीएल, एचपीएल पर अपनी दुनिया ठहरी

अंतिम हफ़्ते से वेतन की दूरी सौ माइल!

©मनीषा शुक्ला

17 Jan 2024

तुम्हारे आने से भगवान

तुम्हारे आने से भगवान
क्या जाने धरती पर फिर से जी उठ्ठे इंसान!

यूं तो तुलसी ने जीवन भर रामचरित ही गाया
राम लला को पर दुनिया ने पूजा तक ही पाया
अब फिर से उम्मीद जगी है; कुछ तो अब बदलेगा
मंदिर के बाहर भी कोई नाम तुम्हारा लेगा

शायद मूरत से आ जाए मानवता में प्राण !

केवट या शबरी बनने को कोई कब है राज़ी
राम लला के दर्शन की पर होड़ लगी है ताज़ी
जग ने ढूंढा बचने का सबसे आसान तरीका
जिसको मुश्किल जाना उसको ईश्वर कहना सीखा

मंदिर के दर्शन से कुछ तो मन होगा आसान!

पहले से ईश्वर थें; फिर क्यों राम बने नारायण?
रामचरित क्यों आई जब पहले से थी रामायण?
इन प्रश्नों का उत्तर भी तो रामकथा से चुनते
हम रघुवर के संघर्षों को थोड़ा-थोड़ा गुनते

पर मुँह बनने की जल्दी में सुनना भूले कान!

©मनीषा शुक्ला

24 Dec 2023

धरती के हिस्से में आया बिन मांगे ही प्यार

कहीं पर चटका है मंदार
धरती के हिस्से में आया बिन मांगे ही प्यार

हार चुका है मन, करके मौसम की मान मनौती
बादल समझे बैठे हैं बूंदों को आज बपौती
थककर धरती ने भी कर ली है सूरज से यारी
रेतीले सोने से खुद ही अपनी देह सँवारी

तपते मरुथल पर जँचता है अब ये तेज़ बुख़ार

सागर की आशा में कब तक नदियों को ठुकराती
इससे अच्छा था पानी को जी भर प्यास लजाती
अपने सुख-दु:ख लेकर आती है हर प्रेम-कहानी
पर इस बार हुआ ऐसा याचक को तरसा दानी

कीकर के गहनों से जलता देखा हरसिंगार

दुनिया दु:खियारे के दु:ख में सुख ढूंढा करती है
पनघट को ख़ाली करके ही तो गागर भरती है
मांगे भीख न मिलती पर बिन मांगे, पाए मोती
काश किताबों से इतनी-सी बात समझ ली होती

सारी दुनियादारी ही हो जाती तब बेकार

©मनीषा शुक्ला

14 Dec 2023

सच लिखते हो!

क्या कहते हो? सच लिखते हो!

अभी-अभी क्यों तुमने खोजा
ट्विटर पर क्या-क्या ट्रेंडिंग है
अभी-अभी क्यों तुमने देखा
अख़बारों की क्या हेडिंग है
अभी बताया तुमने हमको
"राम" लिखो; प्रासंगिक होगा
अभी बताया गया कि कवि को
"दिखना" तो नैसर्गिक होगा
लेकिन तुम तो चाल-चलन से
बिलकुल मायावी दिखते हो
इतने पर भी सच लिखते हो?

एक तरफ़ तो कहते हो तुम
जैसा देखो, वैसा गाना
फिर हमको समझाया तुमने
वायरल होने का पैमाना
पहले तुमने हर झरने की
"स्पीड बढ़ाओ" -ज्ञान दिया है
तब जाकर तुमने नदिया के
ठहरावों को मान दिया है
किन्तु प्रभु! इतना बतलाओ
स्वयं, कहाँ, कितना टिकते हो
सचमुच क्या तुम सच लिखते हो?

पैसे का क्या? कल तो केवल
प्रतिभा को सम्मान मिलेगा
उसको इक दिन झरना होगा
जो भी बनकर फूल खिलेगा
मौसम के संग रंग बदल ले
वह कविता का बोल नहीं है
फिर तुमने ही ये भी बोला
"सच का कोई मोल नहीं है"
पर शब्दों की मंडी में तो
तुम भी सिक्कों पर बिकते हो
सच बतलाना? सच लिखते हो!

सच लिखते तो आज तुम्हारी
दुनिया कुछ "बैरागी" होती
सच कहते तो तुमने अपनी
कोई इच्छा "त्यागी" होती
सच गाते तो आज तुम्हारा
हर इक आँसू "नीरज" होता
सच लिखनेवाला थोड़ा-सा
"दिनकर" होता; सूरज होता
चांदी का गस्सा खाते हो
सोने की रोटी छिकते हो
ऐसे कैसे सच लिखते हो?

©मनीषा शुक्ला

29 Jun 2023

हम हुए इक-दूसरे के

काटती हैं आज आँखें एक-दूजे को चिकोटी
हम हुए इक-दूसरे के; है कठिन विश्वास करना

बन गया झूमर; ज़माने से मिला हर एक ताना
पड़ गया भारी समय को भाग्य पर उंगली उठाना
रंग गया हर एक अशगुन आज हल्दी की छुअन से
ढूंढते अपशब्द सारे अब बधाई में ठिकाना
हो गई अनुकूल, मंगलगान बनकर सब दिशाएँ
अब हमारे हाथ में है शून्य को आकाश करना

झूमता है मन, कि जैसे झील में कोई शिकारा
जो "हमारा" था अभी तक, हो गया "केवल हमारा"
कल तलक जिस नाम को सबसे छिपाया जा रहा था
आज अपना नाम उसके नाम से हमने सँवारा
घुल रहा वातावरण में लाज संग सिंदूर का रंग
है अभी बाकी प्रणय की इस हवा को श्वास करना

जो सहा; ईश्वर! न उसको शत्रु के भी हाथ लिखना
प्रेम लिखना तो हमेशा प्रेमियों का साथ लिखना
अब न लिखना प्रेम के हिस्से कभी अग्नि-परीक्षा
हो सके तो आँख में सपने नहीं, औक़ात लिखना
अब कभी भी प्रेम को मत भाग्य के करना हवाले
अब हथेली को लकीरों का कभी मत दास करना

©मनीषा शुक्ला जैन

18 Dec 2022

अपरिचित

प्रेम में सब कुछ मिला
तुमसे अपरिचित!

क्या हुआ जो मोगरे के फूल बालों में नहीं है
बात मेरी रात में जो है, उजालों में नहीं है
क्यों किसी की मांग का सिंदूर मुझको मुंह चिढ़ाता
जिस तरह मेरे हुए तुम, कौन तुमको जीत पाता

हो गई निश्चिंत मैं,
होकर अनिश्चित!

चैन जितना था तुम्हारे साथ, अब उतने सपन हैं
सब तुम्हारे बिन, तुम्हारे साथ होने के जतन हैं
हर किसी के द्वार पर जब चांद डेरा डालता है
हां, ज़रा सी देर मन अभिनय हँसी का टालता है

कर रही चुपचाप इक
आँसू विसर्जित!

लग रही है उम्र छोटी, याद तुमको कर रही हूं
मैं तुम्हारे नाम से हर एक अक्षर पढ़ रही हूं
संग तुम्हारे जोड़कर ख़ुद को घटाऊं, किस तरह अब
तोड़कर तुमसे स्वयं को जोड़ पाऊँ, किस तरह अब

शून्य से अब हो चुकी
हूं, मैं अपरिमित!

©मनीषा शुक्ला

31 Jul 2022

गुजरिया है कितनी सुंदर

गुजरिया है कितनी सुंदर 
जगर-मगर कजरारी आँखें, बातें चटर-पटर

अंगड़ाई से तोड़ रही है जाने कितने दरपन
रोज़ बदलता रंग दुपट्टा, सूट बदलता पैटर्न
मीठी नीम सरीखा गुस्सा, गुड़ जैसी दे गाली
चंदा के कंगन पहने हैं और हवा की बाली

इसकी जुल्फों में करती हैं रातें गुज़र - बसर 
गुजरिया है कितनी सुंदर 

कुछ खोया है जिसको जाने ढूंढ रही है कबसे
बदली सी लगती है ट्यूशन से लौटी है जबसे
ख़ुद ही ख़ुद की बाहों में सिमटी जाती है ऐसे
झुककर पहली बार किरण ने ओस छुई हो जैसे

हां या ना के बीच लगाती कितने अगर -मगर
गुजरिया है कितनी सुंदर 

सतरंगी अख़बार हुआ है इक सादा सा चेहरा
सुर्खी का सारा ज़िम्मा होंठों के तिल पर ठहरा
लाइब्रेरी से कैंटीन तक बस इनका ही चर्चा
लड़कों की खातिर ये आंखें हैं बी ए का पर्चा

जितने मुंह उतनी ही बातें होती शहर -डगर 
गुजरिया है कितनी सुंदर 

लिख भेजी है जाने किसने चिट्ठी चूम रही है
अनजानी इक धुन पर लट्टू बनकर घूम रही है
उमर लगी है गिनने अब तो उंगली की  पोरों पर
जी लगता घर पर ना ही अब लगता घर के बाहर 

तटबंधों से उलझी नदिया करती कसर -मसर 
गुजरिया है कितनी सुंदर 

यौवन ने बस देह नहीं मन को आकार दिया है
नींदों ने पलकों पर सपनों का सब भार दिया है
शहद मिला अमचूर हुआ है खट्टा -मीठा लहज़ा   
एक किसी का नाम लबों पर बिखरा रेज़ा - रेज़ा
 
उड़ती फिरती है भीगी चिंगारी इधर - उधर 
गुजरिया है कितनी सुंदर 

©मनीषा शुक्ला

28 Apr 2022

मिलना साधारण हो जाता


यह ठीक हुआ, हम मिल न सके, मिलना साधारण हो जाता
हर दूजी प्रेम कहानी-सा अपना भी जीवन हो जाता

बेहद साधारण होता है संयोग-मिलन, जीना-मरना
ना पीर सही, ना प्रेम किया, ऐसे जीवन का क्या करना
जितना टूटे, उतना मीठा गाता है गीत हृदय जग में
जितना हारा, उतना ज़्यादा होता है मीत अजय जग में

कैसे यह प्रेम, समर्पण के मानक से आगे बढ़ पाता
जिसको तीरथ माना है यदि वो घर का आंगन हो जात

इक-दूजे को पाकर कोई कब कहता है इक़रार हुआ
हम तुमसे दूर हुए जबसे; कुछ ज़्यादा तुमसे प्यार हुआ
इक-दूजे को पा लेते तो हम इतने ख़ास नहीं होते
इक-दूजे के संग होते तो, हम इतने पास नहीं होते

तस्वीरों का फिर क्या होता, क्या होता सूखे फूलों का
इक-दूजे की यादों के बिन कितना ख़ाली मन हो जाता


चल एक अधूरे किस्से का मनचाहा अंत लिखें दोनों
जैसे चाहा इक-दूजे को, वैसे ही रोज़ दिखें दोनों
इक-दूजे के सपनों में रहने का हमको अधिकार रहे
इक-दूजे के हों हम दोनों, हम दोनों का संसार रहे

अब आधी प्रेम कहानी में कस्तूरी बनकर महकेंगे
हम दोनों का संयोग महज़ ख़ुश्बू का बंधन हो जाता


©मनीषा शुक्ला

24 Apr 2022

जंगली फूलों

जंगली फूलों तुम्हारी ख़ुश्बुओं का मोल क्या है
तुम कि जैसे रूप के माथे लगा काजल डिठौना

जन्म; जैसे एक अनचाही दुआ स्वीकार होना
मृत्यु, जैसे क्यारियों की क़ौम पर उपकार होना
उम्र जैसे हो घड़ी की नोंक पर ठहरा हुआ पल
तुम धरा की देह पर मानो न मानो भार हो ना?

देख तुमको कनखियों से सोचता है आज उपवन
गन्ध का कैसे हवा से हो गया बेमेल गौना

व्यय हुआ तुम पर तभी तो हो गया बेरंग पानी
देख तुमको ही नहीं आई बहारों तक जवानी
हाँ! तुम्हीं को देखकर काँटे सभी इठला रहे हैं
ठूँठ, खर-पतवार तुममें ढूँढते हैं एक सानी

तोड़कर तुमको विदाई दे रही है डाल ऐसे
फेंकती हो आँधियों की राह में जैसे खिलौना

प्रेम के प्रस्ताव का अनुवाद बन पाए नहीं तुम
फिर प्रणय की सेज के भी काम कुछ आए नहीं तुम
तुम न सज पाए किसी नवयौवना के कुन्तलों में
देवताओं के हृदय को आजतक भाए नहीं तुम

तुम कसकते ही रहे हो हर किसी की आँख में यूँ
ज्यों किसी मीठे सपन की नींद को चुभता बिछौना

©मनीषा शुक्ला

26 Nov 2021

धरती पर आकाश सजेगा

उत्सव में उल्लास सजेगा, गीतों में मधुमास सजेगा

जिस दिन तुम लौटोगे उस दिन धरती पर आकाश सजेगा

बाँझ बनी सारी खुशियों की गोद भराई हो जाएगी
हर आँसू की, एक हँसी से आज सगाई हो जाएगी
रोज़ उदासी जिनपर झूली, उन गालों में भंवर पड़ेंगे
नैनों से उलझेगा काजल, लाल महावर पाँव भरेंगे 

एक दफ़ा चाहेंगे तुमको, सात जनम तक पाएंगे हम
एक तुम्हारा रूपक पाकर जीवन का अनुप्रास सजेगा 

तुम आओ तो छोर हवा के बाँध सकूँगी मैं आँगन से
तुम आओ तो करवा लूँगी समझौता कोई दरपन से
तुम आओ तो मुस्कानों के चौक पुरे जाएँगे द्वारे
तुम आओ तो दरवाज़े पर बाँहों के हों तोरण सारे 

एक तुम्हारी आहट भर से घर नन्दन वन हो जाएगा
तुलसी के चौरे पर कोई दीपक अन आयास सजेगा

तुम बिन कुछ तो कम है मुझमें, मुझ बिन तुम भी कैसे पूरे
मेरी साँसों  के बिन होंगे प्राण! तुम्हारे प्राण अधूरे
देह बिना जैसे अँगड़ाई, अँजुरी के बिन जैसे पानी
सुख बिन कैसा वैभव बोलो, बिन राजा के कैसी रानी

दक्ष सुता जो शिव पाने को कर बैठी हो प्राण प्रतिज्ञा
एक सती को पाकर ही तो शिव का भी कैलाश सजेगा

©मनीषा शुक्ला

28 Jul 2021

नयन से दूर दुखी काजल

नयन से दूर दुखी काजल
बिन साजन के सजनी जैसे रुनझुन बिन पायल

जैसे ख़ुश्बू से हो जाए साँसों की कुछ अनबन
या फिर हाथों से ही जैसे रूठ गया हो कंगन
तुम बिन सारी खुशियाँ मुझसे रूठ गईं हैं ऐसे
ज़्यादा ख़र्चों से जैसे रूठे हों थोड़े पैसे

अब या तो मुझको मिल जाओ, या कर दो पागल

जैसे पूजा के शगुनों में पड़ जाए कुछ अड़चन
सीने में थक कर रुक जाए चलते-चलते धड़कन
ठोकर से पल भर में जैसे दरके कोरा दरपन
दुनियादारी में खो जाए जैसे मन का कचपन
खोई हूँ; जैसे आँखों में सपनों का जंगल


तुम बिन कोई भी तो मुझको देख नहीं पाता है
और पते से मेरे हर ख़त बैरंग ही जाता है
सुनती हूँ, इस बार शहर में ज़्यादा बरसा पानी
मेरी इन प्यासी आँखों की है सारी नादानी

फिर भी मन सूखा है जैसे बिन पानी बादल


©मनीषा शुक्ला

24 Jun 2021

निंदिया छू मंतर

हुई है निंदिया छू मंतर
रात छतों पर टाँग रही है तारों के झूमर !

यादों की टकसाल हुई है दो आँखों की जोड़ी
बेचैनी के हाट जिया में; चैन न फूटी कौड़ी
सारी रैन लगा रहता है सपनों पर जुर्माना
करवट से भरना पड़ता है बिस्तर का हर्जाना

काले धन जैसा अँधियारा, चँदा है फुटकर

गूँगा हो कंगन, जैसे पायल को लकवा मारे
बिंदिया उतनी लाल नहीं, कुछ फीके हैं लश्कारे
हारी मैं तो, लाख जतन कर गलहारों से हारी
और नहीं देखी जाती अब झुमके की लाचारी

क्या बिरहन का रूप सँवारें सोने के ज़ेवर

रात पहन ली पुरवाई ने ख़ुश्बू वाली साड़ी
या शायद लौटी थी पगली छूकर देह तुम्हारी
जमुहाई से फूल बिखरते; महकी है अँगड़ाई
छूकर तुमको आज हमारी साँसे बहुत लजाई

आज न बीते रैन, ग़लत हो घड़ियों का अटकर

©मनीषा शुक्ला

22 Jun 2021

हीर बूढ़ी हो गई है

हर प्रतीक्षा अब समय की देहरी को लाँघती है
देह के संग अब हृदय की पीर बूढ़ी हो गई है

बिन तुम्हारे भी धड़कता है कलेजा; जान पाई
अब नहीं रहती वहाँ पर एक भी धड़कन पराई
हो गया अरसा तुम्हारी याद से बिछड़े हुए भी
आज पहली बार बिन रोए मुझे भी नींद आई

जो हमें बाँधे हुए थी एक कच्ची डोर जैसे
अब समर्पण की वही ज़ंजीर बूढ़ी हो गई है

आँसुओं में अब हँसी के फूल भी खिलने लगे हैं
एक कमरे से मुझे मेरे निशाँ मिलने लगे हैं
पत्तियों की देह पर फिर ओस के चुंबन सजे हैं
दूर; उड़ने को क्षितिज के पँख भी हिलने लगे हैं

अब विरह की आग में वैसी अगन बाक़ी नहीं है
हो न हो अब प्यार की तासीर बूढ़ी हो गई है

साथ कैसा भी रहे, मिलता वही जो छूटता है
प्रेम होते ही लकीरों से विधाता रूठता है
है अमर वो ही कहानी जो रही आधी-अधूरी
गीत भी मीठा वही जिसमें कलेजा टूटता है

तुम उधर राँझा हुए लौटे न अब तक जोग लेकर
आँख रस्ते पर गड़ाए हीर बूढ़ी हो गई है

©मनीषा शुक्ला

27 May 2021

तुम गए...

भोर की देह कुछ सांवली हो गई
रात पर रात का रंग चढ़ता नहीं
तुम गए, बुझ गए दीप आकाश के
चाँद भी रोशनी में उतरता नहीं 

अब अमलतास रहने लगा है दुखी
धूप से बोलती ही न सूरजमुखी
अब कहीं भी न सेमल दहकता मिले
रंग करने लगा रूप से बेरुखी

तुम गए तोड़कर हर नदी का भरम
झील में कोई मुखड़ा सँवरता नहीं

प्यास के काम आती दुआ ही नहीं
बादलों को हवा ने छुआ ही नहीं
तुम गए, खो गई है ज़मीं की नमी
ज्यों कि सावन कभी भी हुआ ही नहीं

थक गए रोज़ चलकर समय के चरण
पास पल भर, कोई पल ठहरता नहीं

हर घड़ी बर्फ़ सी गल रही है उमर
ओस जैसे टिकी कास के फूल पर
भाग्य में शीत का सूर्य था; इसलिए
शाम ज़्यादा हुई, कम हुई कुछ सहर

प्रेम करना सभी को सुहाता अगर
कोई मिलकर किसी से बिछड़ता नहीं

© मनीषा शुक्ला


25 May 2021

फिर याद आते हो तुम

रातरानी खिली आज फिर
आज फिर याद आते हो तुम

एक सपना कि जैसे नयन से मिले
देह जैसे अचानक छुअन से मिले
मिल रहे तुम हमें आज कुछ इस तरह
टूटकर चैन जैसे थकन से मिले

लो हथेली थमा दी तुम्हें
चाँद-सूरज उगाते हो तुम ?

आ रही हैं तुम्हें क्या अभी हिचकियाँ
क्या चुभा पैर में द्वार का सातिया
क्या तुम्हें भी चिढ़ाती मिली हैं कभी
एक-दूजे से उलझी हुई खिड़कियाँ

जो तुम्हें याद करती, उसे
किस तरह भूल जाते हो तुम?

प्यार करना, नहीं कुछ जताना कभी
रूठना, पर नहीं है मनाना कभी
है नदी की अगर प्यास से दोस्ती
तो हमें भी हुनर ये सिखाना कभी

मैं लगा ना सकूँ आलता
किस तरह जी लगाते हो तुम?

©मनीषा शुक्ला

17 Feb 2021

कोई कहानी चाहिए

इतिहास जिसको पढ़ सके

जिसकी लकीरें गढ़ सके

जो हर दिशा में बढ़ सके ऐसी रवानी चाहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


हर घाव पर चंदन बने

हर आह पर क्रंदन बने

सपनें भले कम हों, नयन में ख़ूब पानी चाहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


जो चाँद को पहलू भरे

जो रात पर क़ाबू करे

छूकर हवा जिसको थमे, वह रातरानी चहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


रंगीन है हर ओढ़नी

खबरें हुई हैं सनसनी

इस गाँव को अब खेत में मेहंदी उगानी चाहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


हो चाँद पर बंगला जहाँ

बादल बने जंगला जहाँ

सब प्रेमियों को एक दुनिया आसमानी चाहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


हर ज्ञान, संयम खो चला

है भाग्यहीन शकुंतला

दुष्यंत को भूली हुई कोई निशानी चाहिए

कोई कहानी चाहिए ।।


©मनीषा शुक्ला

23 Jan 2021

अलग बात है

प्रेम करना अलग बात है, प्रेम  पाना  अलग  बात है
युद्ध लड़ना अलग बात है, जीत जाना अलग बात है

है गगन तो सभी का मग़र, पँख सबको कहाँ मिल सके
नींद सबको मिली है मग़र, ख़्वाब  सबके नहीं  हैं  पके

फूल खिलना अलग बात है, रंग आना अलग बात है

जीत बैठें मुक़दमा मग़र फैसला हक़ में आया नहीं
एक बंधन न टूटा कभी, एक जाए निभाया नहीं 

रो न पाना अलग बात है, मुस्कुराना अलग बात है

एक छत चाहिए जो बने, एक टुकड़ा निजी आसमाँ
एक मलबा मिला है मग़र तोड़कर ख़्वाहिशों का मकां

ईंट-पत्थर अलग बात है, आशियाना अलग बात है

आँसुओं को भला किस तरह शब्द से कोई सिंगार दे
आह से आह कैसे जुड़े, टीस को क्या अलंकार दे

पीर सहना अलग बात है, गीत गाना अलग बात है

©मनीषा शुक्ला

22 Jan 2021

रास्ते को हारकर रुकना पड़ा

आज पहली बार नीचा है गगन
आज पहली बार है झुकना पड़ा

आज से पहले कभी ऊँचाइयाँ
सिर उठाने पर नहीं थी कम पड़ी
देहरी ने की नहीं अवमानना
द्वार पर तोरण लिए हरपल खड़ी
आज तन सम्मान से दूना हुआ
इसलिए अभिमान से चुकना पड़ा

आज से पहले सदा परछाइयाँ
क़द बढ़ाती थीं क़दम को चूमकर
दिन चढ़े, सूरज ढले या रात हो
हो गई अब ज़िन्दगी इक दोपहर
ढूँढता कोई नहीं; इस खेल में
आज अपने-आप से लुकना पड़ा

आज से पहले कभी चलते हुए
बोझ लगते थे न अपने पाँव ख़ुद
आज से पहले न दीखा पेड़ वह
माँगता अपने लिए जो छाँव ख़ुद 
इस तरह भटके बटोही के चरण
रास्ते को हारकर रुकना पड़ा

मनीषा शुक्ला


20 Jan 2021

सुख का कोई योग नहीं है

हम-तुम एक धरा पर फिर भी मिलने का संयोग नहीं है
प्रेम गणित है ऐसा  जिसमें सुख का कोई योग  नहीं  है

दूरी जिससे कम हो जाए ऐसी कोई राह नहीं है
और तुम्हारे बिन मंज़िल से मिलने की भी चाह नहीं 
पत्थर का सीना पिघलाए फूलों में वो आह नहीं है 
आज मरें हम, कल मर जाएं, दुनिया को परवाह नहीं 

बादल से सावन, सागर से मोती, नदियों से गंगाजल
सारे जल-जीवन में केवल 'आँसू' का उपयोग नहीं है

साँसों का संगीत जिन्हें लगता है धड़कन की मजदूरी
मृगछौने से ज़्यादा प्यारी होती है जिनको कस्तूरी
कैलेंडर बदले जाने को हैं जिनके दिन-रात ज़रूरी
रंग महज़ लगती है जिनको दुल्हन जैसी साँझ सिंदूरी

उनको ही तो मुस्कानों का सारा क़ारोबार फलेगा 
जिनकी आँखों के पानी का पीड़ा से उद्योग नहीं है 

हमने ख़ुद अपने आँचल पर काँटों को अधिकार दिया है
हमने पीड़ा से ही केवल पीड़ा का उपचार लिया है
प्रेम-कथा में अपने हिस्से आया हर क़िरदार जिया है
हम हर दुःख के अधिकारी हैं, आख़िर हमने प्यार किया है

हम दोनों के पास नयन हैं, हम दोनों ने सपनें देखें
हम दोनों ने प्रेम किया है, जग पर कुछ अभियोग नहीं है

©मनीषा शुक्ला