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27 May 2021

तुम गए...

भोर की देह कुछ सांवली हो गई
रात पर रात का रंग चढ़ता नहीं
तुम गए, बुझ गए दीप आकाश के
चाँद भी रोशनी में उतरता नहीं 

अब अमलतास रहने लगा है दुखी
धूप से बोलती ही न सूरजमुखी
अब कहीं भी न सेमल दहकता मिले
रंग करने लगा रूप से बेरुखी

तुम गए तोड़कर हर नदी का भरम
झील में कोई मुखड़ा सँवरता नहीं

प्यास के काम आती दुआ ही नहीं
बादलों को हवा ने छुआ ही नहीं
तुम गए, खो गई है ज़मीं की नमी
ज्यों कि सावन कभी भी हुआ ही नहीं

थक गए रोज़ चलकर समय के चरण
पास पल भर, कोई पल ठहरता नहीं

हर घड़ी बर्फ़ सी गल रही है उमर
ओस जैसे टिकी कास के फूल पर
भाग्य में शीत का सूर्य था; इसलिए
शाम ज़्यादा हुई, कम हुई कुछ सहर

प्रेम करना सभी को सुहाता अगर
कोई मिलकर किसी से बिछड़ता नहीं

© मनीषा शुक्ला


5 Feb 2021

यही सबकी कहानी है

नहीं  चलती  खिलौनों  की  कभी  तक़दीर के  आगे

जुड़े   हैं  आसमानों   में   कहीं   पर   प्रीत के   धागे

यही  है  बेबसी  सबकी,   यही   सबकी   कहानी  है

किसी की आंख का सपना, किसी की आंख में जागे


©मनीषा शुक्ला


11 Jun 2020

तुम सँजो लो!

हर घड़ी जिसको लुटाती जा रही है भाग्यरेखा;
हो सके तो तुम सँजो लो!

जिस नयन में एक आँसू भी नहीं ठहरा ख़ुशी से
पढ़ रहे हैं होंठ जिसके, मंत्र तर्पण के अभी से
दान ऐसा; जो अखरता ही रहा बस याचना को
मौन ऐसा; कह न पाया बात अपनी जो किसी से

मर गया वह दुःख अभागा, आज भरकर आँख रो लो!
हो सके तो तुम सँजो लो!

एक सूरज के लिए जलता रहा आकाश सारा
और धरती माँगती ही रह गई कोई सितारा
बाँटनेवाला बहुत अनुदार अपनी भूमिका में
मिल गए दोनों जहाँ, पर दे न पाया वह किनारा

अब तुम्हीं बढ़कर ज़रा आकुल क्षितिज के पँख खोलो!
हो सके तो तुम सँजो लो!

अब समर्पित है तुम्हीं को, चाह लो या राह अपनी
धर्म ख़ुश्बू का बिखरना, कब उसे परवाह अपनी
तुम निठुर हो भी गए तो मन बनेगा आज बादल
ख़ूब बरसेंगे नयन जो सह न पाए दाह अपनी

आज इस गीले हृदय में प्रार्थना के बीज बो लो !
हो सके तो तुम सँजो लो!

©मनीषा शुक्ला

24 May 2020

हर किसी की आँख में है एक टुकड़ा घर



हर किसी की आँख में है एक टुकड़ा घर

पेट में ईंधन नहीं पर पैर चलते हैं
मंज़िलों की चाह में रस्ते मचलते हैं
दुधमुँहे को ख़ून देकर पालती ममता
धूप में तपते बदन को सालती ममता
रोटियों में देखती तस्वीर सपनों की
हाय! थकने ही न देती फ़िक़्र अपनों की
जीभ से बिखरे निवाले को उठाते जब
सीज जाता है सड़क का भी कलेजा तब
इस सफ़र को देख रोया मील का पत्थर

ख़ुद मुसाफ़िर हैं, बनाते दूसरों के घर
है थकन इनआम इनका, भूख है ज़ेवर
हर महल की नींव में, दीवार, ज़ीने में
हैं अजब ये लोग, हँसते हैं पसीने में
ज़िन्दगी है ख़्वाब, साँसे ही हकीक़त हैं
ये रहें ज़िंदा, यही इनकी ज़रूरत है
योजनाओं में हमेशा आख़िरी दिखता
शून्य, जिस पर देश का सारा गणित टिकता
गिनतियों में छूट जाता है यही अक्सर

पटरियों पर लाश 'शायद' आदमी की है
मौत से बदतर कहानी ज़िन्दगी की है
देह पर कुछ बोटियाँ जिनकी सलामत हैं
वो चुनावी वोट हैं, इतनी ग़नीमत है
लोग ज़िंदा थे, तरक़्क़ी बस यही तो थी
आदमी की ज़ात अब तक 'आदमी' तो थी
हर तरफ़ आँसू दिलासे को तरसते हैं
दीप जलते, फूल मातम पर बरसते हैं
हो गई छाती सियासत की बहुत ऊसर

©मनीषा शुक्ला

26 Apr 2020

बिछड़ने का वादा करना

बिछड़ने का वादा करना,
इतना भी आसान नहीं था, जीवन भर मरना!

जैसे कोई नाव बिछड़कर लहरों से पछताए
नदिया को तो पार करे पर तट पर डूबी जाए
गीली लकड़ी सा कोई जैसे मन को सुलगाए
तेल बिना बाती पर जैसे अँधियारा मुस्काए
पागल होकर परछाईं को बाँहों में भरना!

अम्बर के सीने में जैसे कोई चाँद छिपाए
भीतर जेठ तपे, जीने पर सावन शोर मचाए
अंगारा कोई जैसे शबनम की माँग सजाए
निरवंशी सपना कोई आँखों से प्रीत लगाए
अनरोया आँसू पलकों की कोरों पर धरना!

जिस पानी में आग नहीं वो कैसे प्यास बुझाए
मेघ बिना बदली, प्रिय बिन, विधवा मधुमास कहाए
बिन प्राणों के साँस किसी का जीवन क्या महकाए
हर पूजन का भाग्य कहाँ जो मनचाहा वर पाए
लेकिन तुम बिन क्या पाना, क्या खोने से डरना!

©मनीषा शुक्ला

17 Apr 2020

ज़िंदगी के सवालात थे

ज़िंदगी के सवालात थे, इसलिए लाजवाबी रही
सब मिला, सब गया छूटता, एक ये ही ख़राबी रही

पेट भरना सरल जब हुआ
भूख ने तब क्षमा माँग ली
प्रेम ने जब हृदय को छुआ
देह ने यातना माँग ली
चुक गई प्यास से दूध की हर नदी
एक लम्हे बिना, रो रही है सदी
भोर को चल न पाया पता, साँझ कितनी गुलाबी रही

ढल गई धूप, साए सभी
एड़ियों का बिछौना बने
आदमी की नियति है यही
खेलकर, फिर खिलौना बने
एक दिन जिस जगह से चला था कभी
ख़ूब दौड़े मग़र लौट आए वहीं
घट न पाया अँधेरा मग़र रौशनी बेहिसाबी रही

मुस्कुराहट रहे सींचते
आँसुओं का गला घोंटकर
ख़ुश दिखें, ख़ुश रहें ना रहें
ये सबक़ ही ग़लत था मग़र
हारकर जीतना, जीतकर हारना
जी सका ही न जो, क्या उसे मारना
अनुभवों की परीक्षा हुई, सीख लेकिन किताबी रही

©मनीषा शुक्ला

12 Nov 2019

'गीत' रक्खा नाम आँसू का!



हर तरफ़, हर आँख क्यों नम है;
गिर गया क्या दाम आँसू का?

चांदनी की चांद से अनबन हुई
या कि रूठा है समंदर ज्वार से
धर्म त्यागा है समर्पण ने अगर
हो गई क्या चूक कुछ अधिकार से
भावनाएँ अब अहिल्या हैं
क्या करेंगे राम आँसू का?

एक ख़ालीपन कलेजे में भरा
रीतता ही जो नहीं संसार से
छीनना जिसने नहीं सीखा यहाँ
पा सका है कब किसी को प्यार से?
पत्थरों के गाँव में घर हो
तब भला क्या काम आँसू का?

पीर ने देकर क़लम हमसे कहा
ओस लिखनी है तुम्हें, अंगार से
किस तरह थे प्राण रक्खे चोट पर
बाँचनी है ये कथा विस्तार से
राम जाने क्यों विधाता ने
'गीत' रक्खा नाम आँसू का!

©मनीषा शुक्ला

7 Nov 2019

गीत मेरे



गीत मेरे किसी से न कहना कभी
दर्द इतना बढ़ा हिचकियाँ बंध गईं
शब्द में ढल गया जो वही है बहुत
बस उसी से कई सुबकियां बंध गईं

इक रंगोली सजाने नयन द्वार पर
रातभर आंसूओं से है आंगन धुला
इक पहर जुगनुओं को सुलगना पड़ा
तब कहीं एक रश्मि का घूंघट खुला
दिख रहें हैं सभी को चरण राम के
पत्थरों में कई देवियां बंध गईं

जीतने की सहजता सभी से मिली
हारने की कसक अनछुई ही रही
मुस्कुराहट बनी मीत सबकी यहां
और पीड़ा सदा रह गईं अनकही
मौन के आखरों को लिए गर्भ में
उँगलियों में कई चिट्ठियां बंध गईं

नैन मूँदें तुम्हें देखकर हर दफ़ा
भावना ने हमेशा पुकारा तुम्हें
वो सहज तो हमें भी कभी ना हुआ
जो कठिन से हुआ था गंवारा तुम्हें
घर का सौहार्द बच जाए इस चाह में
क्यारियों में कई तुलसियाँ बंध गईं

© मनीषा शुक्ला

6 Sept 2019

तुम्हारी याद में इक और सावन

जी लिया अभिशाप थोड़ा, कम हुआ कुछ और जीवन
कट गया फिर से तुम्हारी याद में इक और सावन

आँख में मौसम गुलाबी सूखकर मरने लगा है
टूटकर हर ख़्वाब, घायल नींद को करने लगा है
हीर-रांझे की कहानी झूठ अब लगने लगी है
उम्र के इस मोड़ पर, मन प्रेम से डरने लगा है
प्रेम में बिछड़े हुओं का है यही परिणाम अंतिम
ज्यों बिछड़ कर जी रहे हों, एक तुलसी, एक आँगन

चंद्रमा छत नापता है, पर नहीं मुझको सुहाता
अब नहीं कोई सितारा टूटकर नथ को सजाता
बादलों की गोद में बिजली लगे जैसे पतुरिया
अब हवाओं की शरारत पर नहीं मन रीझ पाता
इक बुढ़ापा और बचपन, ज़िंदगी में ये बहुत हैं
किसलिए कोई जिए, बदनामियों के साथ यौवन?

भाग्यरेखा हाथ में कुछ और गहराने लगी है
आँच अनुभव की समय से रोज़ टकराने लगी है
क्लास में छूटी किताबों में न रख दे फूल कोई
ज़िंदगी इस भूल से अब रोज़ कतराने लगी है
देखकर तुमने नज़र भर कर दिए थे प्राण जूठे
देखती हूँ रोज़ चेहरा, तोड़ती हूँ रोज़ दरपन
कट गया फिर से तुम्हारी याद में इक और सावन

© मनीषा शुक्ला

24 Jul 2019

इस पर कुछ अधिकार नहीं था

मेरा कंठ मिले पीड़ा को, मुझको यह स्वीकार नहीं था
पर पीड़ा को कंठ न देना, इस पर कुछ अधिकार नहीं था

जैसा भोगा, वैसा गाया, इसमें कुछ अपराध न पाया
मैंने हर टूटे तारे को लाकर मन्नत से मिलवाया
अनबाँची पुरवाई का दुःख, मेरा वैभव, मेरी थाती
धरती की प्यासी छाती पर मैं बादल की गीली पाती
आँसू, पीड़ा, सपने, अँखियाँ, प्रेम, विरह और बैरन सुधियाँ
सब कुछ मेरी ही ख़ातिर था, केवल यह संसार नहीं था

मैंने कुछ भी हेय न समझा, भाग्य मिला जो, शीश चढ़ाया
अधरों का सत्कार किया तो आँसू का भी मान बढ़ाया
दीपक की काया ढोने को अंधियारे का रूप लिया है
तुलसी का हर शाप उठाया, जीवन शालिग्राम किया है
शापित वरदानों को पूजा, खंडित भगवानों को पूजा
इतने पर भी इस दुनिया पर मेरा कुछ उपकार नहीं था

दुःख वाली सारी रेखाएँ जिनके हाथों में आई थी
मैंने बस उनकी ही ख़ातिर जीवन की साखी गाई थी
खिलने को तैयार नहीं थी नागफनी भी जिनके आंगन
बस उनकी ही ख़ातिर, मैंने कर डाला पीड़ा को चंदन
मैंने ही केवल समझा है, सागर में कितनी तृष्णा है
मेरे हिस्से में सब कुछ था, सिर्फ़ किसी का प्यार नहीं था

© मनीषा शुक्ला

13 Jul 2019

तन के पिंजरे में मन

आँसू में डूब वचन रोए, नयनों में डूब सपन रोए
तन तो विहँसे मन भर लेकिन, तन के पिंजरे में मन रोए

अनजाने सागर से मिलकर, नदिया का सच खो जाता है
बस एक छुअन के अंतर से पारस, पत्थर हो जाता है
बादल की बाँहों में जैसे, चंदा काला पड़ जाता है
जब भाग, अभागे होते हैं, उगता सूरज सो जाता है
कुछ ऐसा ही संजोग बना, जब प्रेम हृदय का रोग बना
हम रोएँ सावन से मिलकर, हमसे मिलकर सावन रोए

धरती की छाती पर कोई हमको अपनाता, भाग्य नहीं
जिसको हम गाते नयनों से, अधरों तक आता, भाग्य नहीं
जिनकी ख़ातिर हम टूट सकें, ऐसे नक्षत्र नहीं नभ में
पतझर के आँगन में कोई फागुन बौराता, भाग्य नहीं
किससे, क्या मांगे जीवन में, पाने-खोने की अनबन में
कंचन होकर रोए काँसा, काँसा होकर कंचन रोए

जग की आँखों में सच ढूंढ़ा, दरपन को झूठा मान लिया
अधरों-अधरों जब प्यास मिली, सावन को झूठा मान लिया
हमने जीवन से सीख लिया, हर दिन जीना, हर दिन मरना
काग़ज़ के फूल मिले जिस दिन, उपवन को झूठा मान लिया
भावुकता से संबंध हुआ, सुख से दुःख का अनुबंध हुआ
ख़ालीपन में आँखें रोएँ, आँखों में ख़ालीपन रोए

©मनीषा शुक्ला

18 Jun 2019

विवशताएँ

जब विवशताएँ खड़ी हों द्वार पर हर इक चयन के
मुस्कराते ओंठ ही तब गीत गाते हैं नयन के

प्रेम के गलते शवों पर, फूलती-फलती प्रथाएँ
मांग में सिंदूर, तारों की जगह भरती निशाएँ
जो जिधर ले जाएगा, उस ओर ही अब चल पड़ेंगी
एक ध्रुव की चाह में भटकी हुईं व्याकुल दिशाएँ
नींद का टुकड़ा न आया हो कभी भी भाग्य जिनके
वो अभागे नैन युग-युग गीत गाते हैं सपन के

मौन काजल बन रहा है आँसुओं के घर निवाला
ओढ़नी के चांद-तारे पी गए सारा उजाला
हस्तरेखा की मरम्मत कर नहीं पाईं हिनाएँ
चूड़ियों के सँग महावर का पड़ा है रंग काला
टूटना जिनकी नियति है, बस उन्हें वरदान है ये
वो सपन ही हर जनम में गीत गाते हैं सजन के

टूटता तन, अनछुआ मन, अंत दुहराती कहानी
भाग्य के चाकर हुए हैं एक राजा, एक रानी
सावनों की देहरी पर प्यास तो बंदी रहेगी
हाँ! मग़र बरसा करेगा आँख का नमकीन पानी
अनमिले ही रह गए हों जो नदी के कूल जैसे
दूर वो सजनी-सजन ही गीत गाते हैं मिलन

© मनीषा शुक्ला

18 May 2019

मीत मेरे सच बताना!

प्रेम में कुछ गुनगुनाने की अभी संभावना है?
मीत मेरे सच बताना!

हर तरफ जब कोयलों के शव जलाए जा रहे हों
जब वचन के फूल मुर्दों पर चढ़ाए जा रहे हों
गुनगुना पाए न अल्हड़ सी नदी कोई तराना
हर लहर के होंठ पर पत्थर बिछाए जा रहे हों
क्या वही नवगीत गाने की अभी संभावना है?
मीत मेरे सच बताना!

सात जन्मों के लिए संकल्प माँगा जा रहा हो
एक क्षण से एक पूरा कल्प माँगा जा रहा हो
किस तरह कोई समर्पण से भरे सौगन्ध कोई
प्राण से जब देह का वैकल्प माँगा जा रहा हो
इस प्रणय में प्रीत पाने की अभी संभावना है?
मीत मेरे सच बताना!

अनछुई-सी इक छुअन से मन अचानक डर रहा है
देखकर तस्वीर कोई, आंख का काजल बहा है
आज पहली बार यौवन देह को भारी लगा है
रूप ने पहली दफ़ा ही आज दरपन को सहा है
क्या तुम्हें भी भूल जाने की अभी संभावना है?
मीत मेरे सच बताना!

© मनीषा शुक्ला

16 Jan 2019

किसी का दम निकलना चाहता है

कहीं टूटा हुआ दिल है दुआ में,
कोई पत्थर पिघलना चाहता है
कहीं हक़ के लिए कोई लड़ा है,
तभी माज़ी बदलना चाहता है
कहीं फिर से मुहब्बत में किसी ने,
मुक़द्दर आज़माया है यक़ीनन
किसी ने फूल से है चोट खाई,
किसी का दम निकलना चाहता है

©मनीषा शुक्ला

12 Jan 2019

मेरी ख़ातिर मत रो

इस उपवन की हर सोनजुही अब कांटो से विस्थापित है
मेरी ख़ातिर मत रो अम्बर! मेरी धरती अभिशापित है

मेरी जानिब बढ़ता तारा, टूटे बिन लौट नहीं पाया
मेरी रातों के हिस्से में केवल टूटा सपना आया
हर दिन मेरा आधा चन्दा, रोता है मुझसे दूर कहीं
हर दिन मैंने पीड़ा का सुख, पूरा भोगा, आधा गाया
मेरी तृष्णा का मोल नहीं, मेरे घट का सम्मान नहीं
मेरी ख़ातिर मत रो बादल! मेरा सावन प्रतिबन्धित है

चन्दा से चातक की दूरी, गा-गा कर मुझको कहनी थी
पल भर आराम न हो मन को, पीड़ा उपजा कर सहनी थी
सपनों को पलकें देनी थी, पानी की प्यास बुझानी थी
नैनों ने मेरे दम पर ही काजल की रेखा पहनी थी
मेरा आंसू ही सम्बल है, हिचकी पर ठहरी सिसकी का
मेरी ख़ातिर मत रो कलरव ! मेरा उत्सव अपमानित है

सबका अनरोया रोना था, जीवन ही आंसू करना था
जलकर सूरज पिघलाना था, मेघों में नीरज भरना था
जाने कब से दुखियारे दुःख, मेरा रस्ता गुहराते थे
सुख के चौराहों से मुझको, बस आँखे मूंद गुज़रना था
मेरी सांसों का बोझ रहा प्राणों के हर इक झोंके पर
मेरी ख़ातिर मत रो जीवन! मेरा मरना प्रस्तावित है

© मनीषा शुक्ला

3 Nov 2018

उन आंखों से गीत तुम्हारे बहते हैं

जिन आँखों में मीत रहा करते थे तुम
उन आंखों से गीत तुम्हारे बहते हैं

अब नदियों का शोर नहीं सुन पाती हूँ
रेती पर कुछ लिखने से कतराती हूँ
फूलों की तरुणाई से डर लगता है
तितली के रंगों से आँख बचाती हूँ
मेरे बचने की कोई उम्मीद नहीं
अब तो सारे दुनियावाले कहते हैं

जाने कैसे मैं इतनी आसान हुई
हर महफ़िल के कोने की पहचान हुई
तन्हाई की घड़ियों से हमजोली की
दरपन के बतियाने का सामान हुई
मुझसे अक्सर मेरी अनबन रहती है
“मुझमें“ जाने कितने “मुझ-से“ रहते हैं

दीप, बिना दीवाली जैसे जलता है
बिन धागे के जैसे मोम पिघलता है
तुम बिन मुझको भी कुछ ऐसा लगता है
साया मेरा मुझसे दूर टहलता है
मुझसे प्रेम सहा ना जाए पल भर भी
लोग तुम्हारी नफ़रत कैसे सहते हैं?

© मनीषा शुक्ला

24 Oct 2018

पूजा का प्रतिफल

देव! तुम्हारी प्रतिमाओं को प्यास नहीं है आंसू भर की
ऐसे में पूजा का प्रतिफल मिल पाए, कहना मुश्किल है

शीशमहल के दीपक हो तुम,तेज़ हवा का भय क्या जानो
प्रेम नहीं पाया जीवन में, पीड़ा का आशय क्या जानो
चरणों ने बस फूल छुए हैं, कांटो का परिचय क्या जानो
सूरज पाल रखे हैं तुमने, जुगनू का संशय क्या जानो
माना तुम ईश्वर हो, सुनते रहते हो सबकी फरियादें
पत्थर की आंखों से लेकिन आँसू का बहना मुश्किल है

जिसके दरवाज़े पर पहरों अक्षत, मन्त्र लगाएं फेरी
पीड़ा को सुनने में उससे हो ही जाती है कुछ देरी
जिसने अम्बर के माथे पर इंद्रधनुष की रेखा हेरी
सम्भव है उसपर भारी हो, प्राण-प्रिये आकुलता मेरी
अगर मिले अधिकार तुम्हारा, अभिलाषी हूँ वरदानों की
लेकिन इस अभिमानी मन से करुणा को सहना मुश्किल है

एक घरौंदा रोज़ बनाकर, उसको रोज़ उजड़ता देखो
जीवन देना कौन बड़ाई, उसको हरदिन मरता देखो
चार लकीरों से किस्मत को बनता और बिगड़ता देखो
पल-पल जीने का जुर्माना कुछ सांसों को भरता देखो
तुमने ख़ुद स्वीकार किया है, सीमित दीवारों में रहना
देव, तुम्हारी इस दुनिया में ईश्वर बन रहना मुश्किल है

© मनीषा शुक्ला

18 Sept 2018

आंसुओं का व्यय

आंख को ये है शिकायत आंसुओं का व्यय बहुत है
मान रखने को सभी का होंठ का अभिनय बहुत है

जो हृदय की आंच पाकर, बन गया जल आज ईंधन
हो चलेगी बूंद रस की, जग-प्रलय का एक साधन
जो न पाएगी कहीं पर दो घड़ी सम्मान पीड़ा
तोड़ देगा आज आंसू भी नयन से मोह-बन्धन
मानते हैं हम कठिन है, धैर्य कम, पीड़ा अगिन है
ठान ले तो आंधियों पर, दूब का निश्चय बहुत है

भावना का रक्त है जो, व्यर्थ क्यों उसको बहाएं
पीर के इस मूलधन को, हो सके जितना; बचाएं
ये ज़रूरी है, दुलारें आज मन की वेदना को
यूं न हम सागर उछालें, प्यास से ही चूक जाएं
जो समझना चाह लेगा, बस वही मन थाह लेगा
है कथानक एक ही, पर बात के आशय बहुत हैं

शोर से कहनी भला क्या एक गूंगे की कहानी
भूलने वाला भला कब, याद रखता है निशानी?
जो सुखों की साधना है और दुख का एक साधन
वो ज़माने के लिए है, आंख का दो बूंद पानी
पीर का दर्शक रहा जो, नीर का ग्राहक बनेगा?
इस कुटिल संसार के व्यवहार पर संशय बहुत है

© मनीषा शुक्ला

4 Sept 2018

पीड़ा का संगम

आंसू में आंसू मिलने से पीड़ा का संगम होता है
औरों के संग रो लेने से, अपना भी दुःख कम होता है

हृदय लुटाया पीर कमाई, सबकी केवल एक कहानी
प्रेम नगर में सब दुखियारे, कैसा राजा, कैसी रानी
हर आंसू का स्वाद वही है, कैसा अपना, कौन पराया
दुःख तो केवल दुःख होता है, जिसके हिस्से, जैसा आया
चूम पसीने के माथे को, पुरवाई पाती है ठंडक
धरती को तर करने वाला बादल ख़ुद भी नम होता है

डूब रहे को अगर सहारा दे दे, तो तिनका तर जाए
जो मानव की पीड़ा लिख दे, गीत उसी के ईश्वर गाए
प्यासे अधरों को परसे बिन, पानी कैसे पुण्य कमाए
सावन में उतना सावन है, जितना धरती कण्ठ लगाए
भाग्य प्रतीक्षारत होता है, सिर्फ़ हथेली की आशा में
स्नेह भरा बस एक स्पर्श ही छाले का संयम होता है

अनबोला सुन लेने वाला, स्वयं कथानक हो जाता है
जो आंसू को जी लेता है, वो मुस्कानें बो जाता है
जो मन डाली से पत्ते की बिछुड़न का अवसाद चखेगा
उसको पाकर मोक्ष जिएगा, जीवन उसको याद रखेगा
उजियारे के रस्ते बिखरा हर इक तारा केवल जुगनू
अँधियारे को मिलने वाला दीपक सूरज-सम होता है

© मनीषा शुक्ला

13 Aug 2018

भगवान नहीं है

इक जीवन है, दो नैना है, आंसू चार मग़र दुःख इतने
कितना गाएँ, कितना रोएँ, कुछ भी तो अनुमान नहीं है

जितनी दूर चले आए हम, उतनी दूर अभी जाना है
फिर पीड़ा का आमंत्रण है, फिर से अधरों को गाना है
नैनों का कर्तव्य यही है, रोते-रोते मुस्काना है
चाहे सौ टुकड़े हो जाए, दरपन को सच दिखलाना है
विपदाओं से लग्न मिला है, कष्ट हुए संबंधी अपने
दुःख से जन्मों का नाता है, सुख से कुछ पहचान नहीं है

बिखरे पन्ने, कोरी स्याही, इतना सा इतिहास हमारा
उस अम्बर के सूरज, हम ही इस धरती का टूटा तारा
गीत हमारे गाकर कलकल होती है नदिया की धारा
इक दिन हमसे मिलकर रोया, तबसे है ये सागर खारा
हम आंसू का परिचय, हम ही वंश बढ़ाते हैं पीड़ा का
इस दुनिया में हम जैसों का कोई भी उपमान नहीं है

हम धरती पर आए जग में कुछ पापों का भार घटाने
यौवन के कुछ गीत सुनाकर बदनामी में नाम कमाने
हम आए सूखे चंदन में नम आंखों का अर्क मिलाने
हम आए हैं जीवन रेखा से थोड़ा दुर्भाग्य चुराने
हमने बस अभिशाप उठाएं, वरदानों के दरवाज़े से
जान चुके हम इस धरती पर सबकुछ है, भगवान नहीं है

© मनीषा शुक्ला