26 Jul 2017

अनबन

आज मेरी इन दो आंखों में फिर से थोड़ी अनबन है
एक ने तुमको देखा है और एक तुम्हारा दरपन है

© मनीषा शुक्ला

25 Jul 2017

अकेलापन

ज़िन्दगी में थोड़ा अकेलापन बहुत ज़रूरी है। क्योंकि यही वो जगह है जहां आपकी मुलाक़ात आपसे होती है।

© मनीषा शुक्ला

7 May 2017

जाने क्या ग़ुम है



जीवन से जाने क्या ग़ुम है
दिन सूना रातें गुमसुम हैं

© मनीषा शुक्ला

5 Apr 2017

अधूरा ख़्वाब

जो रह-रह कर उमड़ता है, वही सैलाब रक्खा है 

ज़रा सी आब रक्खी है, ज़रा सा ताब रक्खा है

अभी नींदों से कह दो मेरी आंखों में नहीं आएँ

मेरी पलकों के नीचे इक अधूरा ख़्वाब रक्खा है


©मनीषा शुक्ला

27 Dec 2016

दुखों की मांग

क्यों सुखों को ब्याहने की चाह में
तुम दुखों की मांग फिर से भर चले?

कब कहा था जुगनुओं के प्राण ले
तुम उजाला घर हमारे बांटना?
हम न मांगेंगे कभी अब रश्मियां
बस नयन में रजनियाँ मत आंजना
हम नहीं उस ओर आएँगे कभी
तुम जिसे प्राची दिशा कहकर चले

है अभागे भाग्यवीरो का चयन
चल पड़ें हैं नापने नियति चरण
ये न हो इच्छाओं के अमरत्व को
मिल सके उस लोक बस जीवन-मरण
सब उड़ाने टूटकर बिखरी वहीं
जिस तरफ़ उन पंछियों के पर चले

चंद्रहारों की दमक विष घोलती
चूड़ियों से चूड़ियां अनबोलती
डस न ले उसको कहीं काली घटा
अब नहीं वो कुन्तलों को खोलती
तुम गए परदेस क्या ऐसा लगा
ज्यों सुहागिन के सभी ज़ेवर चले

© मनीषा शुक्ला