रोज थके सपनें उनमें आकर सो जाते हैं
रातें, बादल, चँदा सब उनमें खो जाते हैं
रोया करती हैं जो याद किसी को करके शब भर
उन आँखों के आँसू भी मीठे हो जाते हैं
©मनीषा शुक्ला
10 Oct 2020
15 Sept 2020
बाबुल का 'सरनेम'
करूँगी पूरा-पूरा प्रेम;
केवल कुछ दिन और लिखूँगी बाबुल का 'सरनेम'
आँगन का झूला गोदी में भरकर कहता मुझसे
जितना पाएगी, उतना ही छूट रहा है तुझसे
चौरे की तुलसी ने मुझको आज निहारा दिनभर
बिटिया! हम दोनों इक जैसे "घर में, घर से बाहर"
पिंजरे का मिट्ठू कहता है "हम दोनों हैं सेम"
सौंप रही है मुझको मेरा बचपन इक अलमारी
गुड़िया के शीशे ने हँसकर मेरी नज़र उतारी
हद से ज़्यादा मुस्काती हैं मेरी प्यारी सखियाँ
इनसे ज़्यादा बोल रही हैं इनकी भोली अँखियाँ
काश घड़ी ग़ायब कर देता 'पोषम-पा' का गेम
मेरे सपनों से ऊँचा है शादी का शमियाना
मेरा अम्बर माँग रहा है पँखों का नज़राना
मुझको देख सुबह से खिलते, रात सरीखे भरते
लेकिन बेटी तो बेटी है, माँ-बाबा क्या करते
दादी कहती पँख लगा कर उड़ जाता है 'टेम'
वर के चंदन और वधू की मेहंदी की हमजोली
'बन्ना-बन्नी', 'गारी' के गीतों की मीठी बोली
दरवाज़े पर वन्दनवार लिए मुस्काती कीलें
पलकों तक आ-आ कर लौटें नम आँखों की झीलें
कैसे इतनी याद समेटे फ़ोटो का इक 'फ्रेम'
केवल कुछ दिन और लिखूँगी बाबुल का 'सरनेम'
आँगन का झूला गोदी में भरकर कहता मुझसे
जितना पाएगी, उतना ही छूट रहा है तुझसे
चौरे की तुलसी ने मुझको आज निहारा दिनभर
बिटिया! हम दोनों इक जैसे "घर में, घर से बाहर"
पिंजरे का मिट्ठू कहता है "हम दोनों हैं सेम"
सौंप रही है मुझको मेरा बचपन इक अलमारी
गुड़िया के शीशे ने हँसकर मेरी नज़र उतारी
हद से ज़्यादा मुस्काती हैं मेरी प्यारी सखियाँ
इनसे ज़्यादा बोल रही हैं इनकी भोली अँखियाँ
काश घड़ी ग़ायब कर देता 'पोषम-पा' का गेम
मेरे सपनों से ऊँचा है शादी का शमियाना
मेरा अम्बर माँग रहा है पँखों का नज़राना
मुझको देख सुबह से खिलते, रात सरीखे भरते
लेकिन बेटी तो बेटी है, माँ-बाबा क्या करते
दादी कहती पँख लगा कर उड़ जाता है 'टेम'
वर के चंदन और वधू की मेहंदी की हमजोली
'बन्ना-बन्नी', 'गारी' के गीतों की मीठी बोली
दरवाज़े पर वन्दनवार लिए मुस्काती कीलें
पलकों तक आ-आ कर लौटें नम आँखों की झीलें
कैसे इतनी याद समेटे फ़ोटो का इक 'फ्रेम'
14 Sept 2020
वो घर से आज तुझको याद करने निकला है
फ़क़ीर दिल को भी शहज़ाद करने निकला है
मेरी तनहाइयाँ आबाद करने निकला है
ये कहने आई थी हिचकी मुझे तसल्ली रख
वो घर से आज तुझको याद करने निकला है
©मनीषा शुक्ला
मेरी तनहाइयाँ आबाद करने निकला है
ये कहने आई थी हिचकी मुझे तसल्ली रख
वो घर से आज तुझको याद करने निकला है
©मनीषा शुक्ला
अख़बार
हमें इक़रार है लेकिन, तुम्हीं इज़हार कर लेना
हमारे प्यार की ख़ातिर, हमें बस प्यार कर लेना
हमें मुश्किल बयां करना मुहब्बत का फ़साना है
लबों की सुर्खियां पढ़ के, हमें अख़बार कर लेना
हमारे प्यार की ख़ातिर, हमें बस प्यार कर लेना
हमें मुश्किल बयां करना मुहब्बत का फ़साना है
लबों की सुर्खियां पढ़ के, हमें अख़बार कर लेना
©मनीषा शुक्ला
इश्क़ कैसा जो, सलामत छोड़ देता है
मुहब्बत हो जिसे जाए, इबादत छोड़ देता है
डरा जो दर्द से अक्सर, मुहब्बत छोड़ देता
न जाए जान जब तक, दिल बहुत बेचैन रहता
भला वो इश्क़ कैसा जो, सलामत छोड़ देता है
न जाए जान जब तक, दिल बहुत बेचैन रहता
भला वो इश्क़ कैसा जो, सलामत छोड़ देता है
©मनीषा शुक्ला
हमने दो आंखों में पूरी दुनिया देखी है
लम्हों में कट जाने वाली सदियां देखी है
सागर की बाहों में कलकल नदिया देखी है
सागर की बाहों में कलकल नदिया देखी है
दुनिया वालो तुम देखो सूरज-चाँद-सितारे
हमने दो आंखों में पूरी दुनिया देखी है
हमने दो आंखों में पूरी दुनिया देखी है
तुम्हारे नाम की चिट्ठी, हमारे नाम
अगर तुम दर्द दे दो सब दवाएँ काम आ जाए
तुम्हारी याद में कुछ नींद को आराम आ जाए
इन्हीं बदनामियों में नाम हम कर जाएं जो इक दिन
तुम्हारे नाम की चिट्ठी, हमारे नाम आ जाए
©मनीषा शुक्ला
तुम्हारी याद में कुछ नींद को आराम आ जाए
इन्हीं बदनामियों में नाम हम कर जाएं जो इक दिन
तुम्हारे नाम की चिट्ठी, हमारे नाम आ जाए
©मनीषा शुक्ला
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