हों हमारे प्राण के प्यासे भले ही सूर्य सारे
हम न मांगेंगे कभी भी छाँव अब वंशीवटों से
भिक्षुकों का क्या प्रयोजन, स्वर्ण के सम्मोहनों से
भूख का नाता रहा कब राजसी आयोजनों से
हम अभागों को रुचे हैं श्वास के अंतिम निवेदन
देह का नाता भला क्या स्वर्ग के आमन्त्रणों से
ढूंढना हमको नहीं आनन्द की अमरावती में
गन्ध आएगी हमारी सिर्फ़ शाश्वत मरघटों से
बोझ धरती का बढ़ाकर जी रहे, ये ही बहुत है
हम नहीं जग के, स्वयं के ही रहे, ये ही बहुत है
हम नहीं शंकर, गरल पीकर अमर हो जाएंगे जो
हम गरल होकर अमरता पी रहे, ये ही बहुत है
आग गोदी में सजाकर, क्यों छुएँ आकाशगंगा
प्यास लेकर लौट आए हम हमेशा पनघटों से
हम भला देवत्व पाकर, क्या करेंगे ये बताओ
देव मेरे! आदमी को, आदमी जैसा बनाओ
दो घड़ी ठहरो धरा पर भूल कर देवत्व सारा
और जीवन को ज़रा हो के मनुज जीकर दिखाओ
हो चलेगा प्रेम तुमको मृत्यु के एकांत से ही
ऊब जाओगे किसी दिन श्वास के इन जमघटों से
© मनीषा शुक्ला
18 May 2018
हों हमारे प्राण के प्यासे भले ही सूर्य सारे
13 May 2018
8 May 2018
निर्णय
फूल जिसके, गंध जिसकी, मेल खाएगी हवा से
अब यही हुआ है, बस वही उपवन हँसेगा
मालियों को कह रखा है, बीज वे अनुकूल बोएं
जो चुनिंदा उंगलियों में चुभ सकें, वो शूल बोएं
छांव का सौदा करें जो, पात हों वे टहनियों पर
जो उखड़ जाएं समय पर, वृक्ष वो निर्मूल बोएं
जो सदा आदेश पाकर बेहिचक महका करेगा
अब यही निर्णय हुआ है, बस वही चन्दन हँसेगा
है वही जुगनू, सदा जो रौशनी का साथ देगा
भोर को बांटे उजाला, रात के घर रात देगा
जो अंधेरा देख कर आँखें चुरा ले, सूर्य है वह
दीप जो तम से लड़ेगा, प्राण को आघात देगा
जो हमेशा धूप का आगत लिए तत्पर रहेगा
अब यही निर्णय हुआ है, बस वही आँगन हँसेगा
हर क़लम वैसा लिखेगी, जो उसे बतलाएंगे वे
जो चुनेंगे राह अपनी, कम प्रशंसा पाएंगे वे
स्याहियो! लेकर लहू तैयार बैठो तुम अभी से
चोट जनवादी बनाएगी अगर, बन जाएंगे वे
जो उन्हीं के गीत का स्वर साधकर कोरस बनेगा
अब यही निर्णय हुआ है, बस वही लेखन हँसेगा
© मनीषा शुक्ला
अब यही हुआ है, बस वही उपवन हँसेगा
मालियों को कह रखा है, बीज वे अनुकूल बोएं
जो चुनिंदा उंगलियों में चुभ सकें, वो शूल बोएं
छांव का सौदा करें जो, पात हों वे टहनियों पर
जो उखड़ जाएं समय पर, वृक्ष वो निर्मूल बोएं
जो सदा आदेश पाकर बेहिचक महका करेगा
अब यही निर्णय हुआ है, बस वही चन्दन हँसेगा
है वही जुगनू, सदा जो रौशनी का साथ देगा
भोर को बांटे उजाला, रात के घर रात देगा
जो अंधेरा देख कर आँखें चुरा ले, सूर्य है वह
दीप जो तम से लड़ेगा, प्राण को आघात देगा
जो हमेशा धूप का आगत लिए तत्पर रहेगा
अब यही निर्णय हुआ है, बस वही आँगन हँसेगा
हर क़लम वैसा लिखेगी, जो उसे बतलाएंगे वे
जो चुनेंगे राह अपनी, कम प्रशंसा पाएंगे वे
स्याहियो! लेकर लहू तैयार बैठो तुम अभी से
चोट जनवादी बनाएगी अगर, बन जाएंगे वे
जो उन्हीं के गीत का स्वर साधकर कोरस बनेगा
अब यही निर्णय हुआ है, बस वही लेखन हँसेगा
© मनीषा शुक्ला
7 May 2018
दिल की नासमझी
कहीं पुरज़ोर कोशिश हो रही है
गगन छूने की साज़िश हो रही है
हमारे दिल की नासमझी तो देखें
इसे भी आज ख़्वाहिश हो रही है
© मनीषा शुक्ला
गगन छूने की साज़िश हो रही है
हमारे दिल की नासमझी तो देखें
इसे भी आज ख़्वाहिश हो रही है
© मनीषा शुक्ला
3 May 2018
शुभकामनाएँ
हार कर हमको गया जो, है उसे शुभकामनाएँ
प्रेम के हर इक समर में, वो अधूरी जीत पाए
होंठ पर कलियां खिलाए, पीर बस पोसे नयन में
चन्दनी बाँहें गहे फिर कसमसा जाए घुटन में
प्राण के बिन देह जैसा, बिन समर्पण प्रेम पाए
फूल को अंगिया लगाए तो चुभन पाए छुअन में
सौंप कर हमको गया जो, पीर की पावन कथाएँ
गीत हमको कर गया जो, वो हमेशा गीत गाए
रूठने वाला मिले ना, वो जिसे जाकर मनाए
मोल पानी का रही हैं, प्यास की सम्भावनाएँ
चाह कर भी कर न पाए प्रेम का सम्मान अब वो
देवता बिन लौट जाएं, अनछुई सब अर्चनाएँ
इक नदी जो मांगने इक बूंद सागर, द्वार आए
एक आंसू भी न बरसे, वो उसी दिन रीत जाए
एक पत्थर पूजने को, एक पत्थर ही मिलेगा
हां! उसे इक दिन हमारे नेह का वर भी फलेगा
रेत पर लगते नहीं हैं बाग हरसिंगार वाले
इक बसंती प्रार्थना से, कब तलक पतझर टलेगा ?
चांद को ख़ाली कटोरा, अश्रु को पानी बताए
शेष ये ही कामना है, वो, उसी-सा मीत पाए
© मनीषा शुक्ला
प्रेम के हर इक समर में, वो अधूरी जीत पाए
होंठ पर कलियां खिलाए, पीर बस पोसे नयन में
चन्दनी बाँहें गहे फिर कसमसा जाए घुटन में
प्राण के बिन देह जैसा, बिन समर्पण प्रेम पाए
फूल को अंगिया लगाए तो चुभन पाए छुअन में
सौंप कर हमको गया जो, पीर की पावन कथाएँ
गीत हमको कर गया जो, वो हमेशा गीत गाए
रूठने वाला मिले ना, वो जिसे जाकर मनाए
मोल पानी का रही हैं, प्यास की सम्भावनाएँ
चाह कर भी कर न पाए प्रेम का सम्मान अब वो
देवता बिन लौट जाएं, अनछुई सब अर्चनाएँ
इक नदी जो मांगने इक बूंद सागर, द्वार आए
एक आंसू भी न बरसे, वो उसी दिन रीत जाए
एक पत्थर पूजने को, एक पत्थर ही मिलेगा
हां! उसे इक दिन हमारे नेह का वर भी फलेगा
रेत पर लगते नहीं हैं बाग हरसिंगार वाले
इक बसंती प्रार्थना से, कब तलक पतझर टलेगा ?
चांद को ख़ाली कटोरा, अश्रु को पानी बताए
शेष ये ही कामना है, वो, उसी-सा मीत पाए
© मनीषा शुक्ला
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गीत
27 Apr 2018
मेरे गीतों का कहना है
मेरे गीतों का कहना है, मैं उनसे छल कर बैठी हूँ
लिखने बैठी थी नेह मग़र पीड़ा के छंद बना बैठी
अनुबंधों की सीमाओं तक, बिखरे संबंध बना बैठी
इक ताना-बाना बुनने बैठी थी मैं अपने जीवन का
शब्दों से मन के आँचल में झीने पैबन्द बना बैठी
बतलाते हैं मुझको अक्षर, अपराध नहीं ये क्षम्य कभी
रच कर सारे उल्टे सतिये, पल-पल मंगल कर बैठी हूँ
इन गीतों को विश्वास रहा, मैं अक्षर चंदन कर दूंगी
अमरत्व पिए आनंद जहां, कविता नंदनवन कर दूंगी
सुख गाएगा कविता मेरी, दुख गूंगा होकर तरसेगा
जिस रोज़ स्वरा बन गाऊँगी, धरती में स्पंदन कर दूंगी
लेकिन पन्नों पर वो उतरा, जो मेरे मन में बैठा था
गीतों की दुनिया में तबसे, परिचय 'पागल' कर बैठी हूँ
सुन गीत! प्रभाती मन रख कर, संध्या का गान नहीं गाते
सूखे सावन के आंगन में मेघों के राग नहीं भाते
प्यासे के कुल जन्मीं कोई, गंगा अभिजात नहीं होती
हो भाग अमावस जिनके वो, चंदा को ब्याह नहीं लाते
इतने पर भी 'मन हार गया', मुझको ऐसा स्वीकार नहीं
सपनों के बिरवे बो-बो कर, आंखे जंगल कर बैठी हूँ
कैसे समझाऊं इन सबको, ये गीत नहीं हैं, दुश्मन हैं
इनसे कुछ भी अनछुआ नहीं, ये गीत नहीं, मेरा मन है
इनको तजना असमंजस तो इनसे बचना अपराध हुआ
ये राधा हैं, ये कान्हा हैं, ये गीत नहीं, वृंदावन है
जैसे भी हो मुस्काना है, गीतों की ख़ातिर गाना है
दो-चार उजालों की ख़ातिर, जीवन काजल कर बैठी हूँ
© मनीषा शुक्ला
लिखने बैठी थी नेह मग़र पीड़ा के छंद बना बैठी
अनुबंधों की सीमाओं तक, बिखरे संबंध बना बैठी
इक ताना-बाना बुनने बैठी थी मैं अपने जीवन का
शब्दों से मन के आँचल में झीने पैबन्द बना बैठी
बतलाते हैं मुझको अक्षर, अपराध नहीं ये क्षम्य कभी
रच कर सारे उल्टे सतिये, पल-पल मंगल कर बैठी हूँ
इन गीतों को विश्वास रहा, मैं अक्षर चंदन कर दूंगी
अमरत्व पिए आनंद जहां, कविता नंदनवन कर दूंगी
सुख गाएगा कविता मेरी, दुख गूंगा होकर तरसेगा
जिस रोज़ स्वरा बन गाऊँगी, धरती में स्पंदन कर दूंगी
लेकिन पन्नों पर वो उतरा, जो मेरे मन में बैठा था
गीतों की दुनिया में तबसे, परिचय 'पागल' कर बैठी हूँ
सुन गीत! प्रभाती मन रख कर, संध्या का गान नहीं गाते
सूखे सावन के आंगन में मेघों के राग नहीं भाते
प्यासे के कुल जन्मीं कोई, गंगा अभिजात नहीं होती
हो भाग अमावस जिनके वो, चंदा को ब्याह नहीं लाते
इतने पर भी 'मन हार गया', मुझको ऐसा स्वीकार नहीं
सपनों के बिरवे बो-बो कर, आंखे जंगल कर बैठी हूँ
कैसे समझाऊं इन सबको, ये गीत नहीं हैं, दुश्मन हैं
इनसे कुछ भी अनछुआ नहीं, ये गीत नहीं, मेरा मन है
इनको तजना असमंजस तो इनसे बचना अपराध हुआ
ये राधा हैं, ये कान्हा हैं, ये गीत नहीं, वृंदावन है
जैसे भी हो मुस्काना है, गीतों की ख़ातिर गाना है
दो-चार उजालों की ख़ातिर, जीवन काजल कर बैठी हूँ
© मनीषा शुक्ला
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18 Apr 2018
आदाब नींदों के
न तो सूरज हुए इनके, न हैं महताब नींदों के
हमें मुद्दत हुई, आए नहीं आदाब नींदों के
हमारी और उनकी नींद का हासिल यही बस है
उधर हैं ख़्वाब नींदों में, इधर हैं ख़्वाब नींदों के
©मनीषा शुक्ला
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