फिर मिले या मिल न पाए, जग! तुझे दीपित अँधेरा
मांग! परिचय मांग मेरा!
सूर्य से पहले जली हूँ, चाँद से पहले ढली हूँ
चूमकर पदचिन्ह अपने, नाश पथ पर मैं चली हूँ
मैं सृजन का वंश हूँ, मैं ही प्रलय की उत्तरा हूँ
सेज पर अंगार के सोई हुई मादक कली हूँ
प्राण में मेरे पलेगा मृत्यु का कोई चितेरा
मांग! परिचय मांग मेरा!
वेदना का मोल पाकर, पीर की टकसाल होकर
मैं सदा फूली-फली हूँ आंसुओं के बीज बोकर
एक जुगनू सा अकेला जल रहा मुझमें दिवाकर
जागते मुझमें गगन के दीप सारी रात सोकर
रोज़ मेरे नैन का काजल उगलता है सवेरा मांग!
परिचय मांग मेरा!
है ह्रदय में आग बाक़ी, मेघ नैनों में सँवरते
कंठ में पीड़ा बसी है, गीत अधरों पर उतरते
पीर का यह गाँव मैंने ही बसाया है, अभागे!
दो घड़ी सुख-चैन जिसकी छांव में आकर ठहरते
सृष्टि सारी मांगती जिस टूटते घर में बसेरा
मांग! परिचय मांग मेरा!
© मनीषा शुक्ला
22 Apr 2019
परिचय
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17 Apr 2019
महावीर जयंती
प्रेम से पीर धोना कठिन है बहुत
पीर में धीर होना कठिन है बहुत
त्याग से विश्व को जीतने के लिए
फिर महावीर होना कठिन है बहुत
© मनीषा शुक्ला
पीर में धीर होना कठिन है बहुत
त्याग से विश्व को जीतने के लिए
फिर महावीर होना कठिन है बहुत
© मनीषा शुक्ला
11 Apr 2019
तुम्हारे प्यार की मीठी रसीदें याद हैं अब भी
26 Mar 2019
मंदोदरी की पीर
राम, रावण मारने को अब अगर आना धरा पर
दो घड़ी मंदोदरी की पीर से आँखे मिलाना
देखना वैधव्य पाकर तेज पर क्या बीतती है
द्वंद में पुरुषार्थ के देखो त्रिया क्या जीतती है
पुण्य को क्या-क्या मिला है, पाप की सहधर्मिणी बन
पूरने को हठ समंदर के नदी ही रीतती है
सौंप देना पत्थरों को जब समंदर के हवाले
हो सके तो बूंद भर उस नीर से आँखें मिलाना
एक जीवित माँ मिलेगी लाख पूतों के शवों पर
भाग्य पर रोते मिलेंगे हर जगह बिछुए महावर
मौन की चीत्कार बनकर लोरियां गाती मिलेंगी
देखना दुर्भाग्य सूनी गोदियों के साक्ष्य बनकर
तार आए हो अहिल्या, मृत शिला में प्राण भरकर
अब ज़रा जीवित शिला के धीर से आँखे मिलाना
जय पराजय हो किसी की, फ़र्क़ क्या विध्वंस तय था
हर किसी की देह में बस काठ का शायद ह्रदय था
धर्म ने जब रक्त का टीका लगाया भाल पर, तब
थम गया रण, चूड़ियों के टूटने का वह समय था
सातिए, तोरण सजाते द्वार पर जिसके विभीषण
उस किले की चीखती प्राचीर से आंखे मिलाना
© मनीषा शुक्ला
दो घड़ी मंदोदरी की पीर से आँखे मिलाना
देखना वैधव्य पाकर तेज पर क्या बीतती है
द्वंद में पुरुषार्थ के देखो त्रिया क्या जीतती है
पुण्य को क्या-क्या मिला है, पाप की सहधर्मिणी बन
पूरने को हठ समंदर के नदी ही रीतती है
सौंप देना पत्थरों को जब समंदर के हवाले
हो सके तो बूंद भर उस नीर से आँखें मिलाना
एक जीवित माँ मिलेगी लाख पूतों के शवों पर
भाग्य पर रोते मिलेंगे हर जगह बिछुए महावर
मौन की चीत्कार बनकर लोरियां गाती मिलेंगी
देखना दुर्भाग्य सूनी गोदियों के साक्ष्य बनकर
तार आए हो अहिल्या, मृत शिला में प्राण भरकर
अब ज़रा जीवित शिला के धीर से आँखे मिलाना
जय पराजय हो किसी की, फ़र्क़ क्या विध्वंस तय था
हर किसी की देह में बस काठ का शायद ह्रदय था
धर्म ने जब रक्त का टीका लगाया भाल पर, तब
थम गया रण, चूड़ियों के टूटने का वह समय था
सातिए, तोरण सजाते द्वार पर जिसके विभीषण
उस किले की चीखती प्राचीर से आंखे मिलाना
© मनीषा शुक्ला
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16 Mar 2019
तुम्हारी याद का सामान
तुम्हारी याद का सामान होना
सफ़र की मुश्किलें आसान होना
© मनीषा शुक्ला
सफ़र की मुश्किलें आसान होना
© मनीषा शुक्ला
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14 Mar 2019
तुम ख़ुश्बू हो
तुम ख़ुश्बू हो, जिस आँचल में बिखरोगे गन्ध लुटाओगे
मेरी पंखुरियों से बँध कर केवल मुझतक रह जाओगे
इतिहास सँवारोगे या फिर आने वाला कल देखोगे
खुशियों की मांग भरोगे या ये बहता काजल देखोगे
तुम पर है, पालोगे कोई सतरंगी सपना नैनों में
या फिर काजल के घेरे में बंदी गंगाजल देखोगे
मैं भूला-भटका रस्ता हूँ, क्या पाओगे मुझ तक आकर
उस पथ को पूजा जाएगा तुम जिस पर चरण बढ़ाओगे
तुम चन्दा का सिंदूर बनो, इक माथे पर सूरज टाँको
मैं ठहरा एक जलाशय हूँ, मत मुझमें रह-रह कर झाँको
वह रेल कहीं कैसे जाए, जिसकी पटरी से यारी हो
मुझमें अटका रह जाएगा, जल्दी-जल्दी मन को हाँको
वह कुमकुम दूर कहीं, जिसका सौभाग्य तुम्हीं को बनना है
वे प्राण प्रतीक्षा में बैठे, जिनके तुम प्राण कहाओगे
मिलते हैं ये बासन्ती दुःख, सौ पुण्य फलित हों तब जाकर
जब आँगन में रोए तुलसी, पाटल झरते हैं तकिए पर
है भाग्य, अकेला खिलता है सेमल सूनी-सी डाली पर
है भाग्य, सजाए गुलमोहर फूलों के केसरिया झालर
अपने-अपने हिस्से का दुःख, सब जीते हैं, सब गाते हैं
मुझको चुननी है नागफ़नी, तुम हरसिंगार सजाओगे
© मनीषा शुक्ला
मेरी पंखुरियों से बँध कर केवल मुझतक रह जाओगे
इतिहास सँवारोगे या फिर आने वाला कल देखोगे
खुशियों की मांग भरोगे या ये बहता काजल देखोगे
तुम पर है, पालोगे कोई सतरंगी सपना नैनों में
या फिर काजल के घेरे में बंदी गंगाजल देखोगे
मैं भूला-भटका रस्ता हूँ, क्या पाओगे मुझ तक आकर
उस पथ को पूजा जाएगा तुम जिस पर चरण बढ़ाओगे
तुम चन्दा का सिंदूर बनो, इक माथे पर सूरज टाँको
मैं ठहरा एक जलाशय हूँ, मत मुझमें रह-रह कर झाँको
वह रेल कहीं कैसे जाए, जिसकी पटरी से यारी हो
मुझमें अटका रह जाएगा, जल्दी-जल्दी मन को हाँको
वह कुमकुम दूर कहीं, जिसका सौभाग्य तुम्हीं को बनना है
वे प्राण प्रतीक्षा में बैठे, जिनके तुम प्राण कहाओगे
मिलते हैं ये बासन्ती दुःख, सौ पुण्य फलित हों तब जाकर
जब आँगन में रोए तुलसी, पाटल झरते हैं तकिए पर
है भाग्य, अकेला खिलता है सेमल सूनी-सी डाली पर
है भाग्य, सजाए गुलमोहर फूलों के केसरिया झालर
अपने-अपने हिस्से का दुःख, सब जीते हैं, सब गाते हैं
मुझको चुननी है नागफ़नी, तुम हरसिंगार सजाओगे
© मनीषा शुक्ला
3 Mar 2019
बहुत कठिन है
प्यासा होना बहुत सरल है, बहुत कठिन है पनघट होना
जीवन होना बहुत सरल है, बहुत कठिन है मरघट होना
© मनीषा शुक्ला
जीवन होना बहुत सरल है, बहुत कठिन है मरघट होना
© मनीषा शुक्ला
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