इतिहास जिसको पढ़ सके
जिसकी लकीरें गढ़ सके
जो हर दिशा में बढ़ सके ऐसी रवानी चाहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
हर घाव पर चंदन बने
हर आह पर क्रंदन बने
सपनें भले कम हों, नयन में ख़ूब पानी चाहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
जो चाँद को पहलू भरे
जो रात पर क़ाबू करे
छूकर हवा जिसको थमे, वह रातरानी चहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
रंगीन है हर ओढ़नी
खबरें हुई हैं सनसनी
इस गाँव को अब खेत में मेहंदी उगानी चाहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
हो चाँद पर बंगला जहाँ
बादल बने जंगला जहाँ
सब प्रेमियों को एक दुनिया आसमानी चाहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
हर ज्ञान, संयम खो चला
है भाग्यहीन शकुंतला
दुष्यंत को भूली हुई कोई निशानी चाहिए
कोई कहानी चाहिए ।।
©मनीषा शुक्ला
17 Feb 2021
5 Feb 2021
यही सबकी कहानी है
नहीं चलती खिलौनों की कभी तक़दीर के आगे
जुड़े हैं आसमानों में कहीं पर प्रीत के धागे
यही है बेबसी सबकी, यही सबकी कहानी है
किसी की आंख का सपना, किसी की आंख में जागे
©मनीषा शुक्ला
4 Feb 2021
तुम्हारा फ़ोन आने पर
बहुत होती है रुसवाई, तुम्हारा फ़ोन आने पर
हुआ सिग्नल भी हरजाई, तुम्हारा फ़ोन आने पर
तुम्हारी एक फ़ोटो से हुआ रंगीन मोबाइल
चहक उट्ठी है तन्हाई, तुम्हारा फ़ोन आने पर
31 Jan 2021
27 Jan 2021
कभी वो भी तो कहे
किसी जवाब का कब इंतज़ार करता है
वही सवाल मुझसे बार - बार करता है
उसे यक़ीन है मैं उससे प्यार करती हूँ
कभी तो वो भी कहे-'मुझसे प्यार करता है'
©मनीषा शुक्ला
23 Jan 2021
अलग बात है
प्रेम करना अलग बात है, प्रेम पाना अलग बात है
युद्ध लड़ना अलग बात है, जीत जाना अलग बात है
है गगन तो सभी का मग़र, पँख सबको कहाँ मिल सके
नींद सबको मिली है मग़र, ख़्वाब सबके नहीं हैं पके
फूल खिलना अलग बात है, रंग आना अलग बात है
जीत बैठें मुक़दमा मग़र फैसला हक़ में आया नहीं
एक बंधन न टूटा कभी, एक जाए निभाया नहीं
रो न पाना अलग बात है, मुस्कुराना अलग बात है
एक छत चाहिए जो बने, एक टुकड़ा निजी आसमाँ
एक मलबा मिला है मग़र तोड़कर ख़्वाहिशों का मकां
ईंट-पत्थर अलग बात है, आशियाना अलग बात है
आँसुओं को भला किस तरह शब्द से कोई सिंगार दे
आह से आह कैसे जुड़े, टीस को क्या अलंकार दे
पीर सहना अलग बात है, गीत गाना अलग बात है
22 Jan 2021
रास्ते को हारकर रुकना पड़ा
आज पहली बार नीचा है गगन
आज पहली बार है झुकना पड़ा
आज से पहले कभी ऊँचाइयाँ
सिर उठाने पर नहीं थी कम पड़ी
देहरी ने की नहीं अवमानना
द्वार पर तोरण लिए हरपल खड़ी
आज तन सम्मान से दूना हुआ
इसलिए अभिमान से चुकना पड़ा
आज से पहले सदा परछाइयाँ
क़द बढ़ाती थीं क़दम को चूमकर
दिन चढ़े, सूरज ढले या रात हो
हो गई अब ज़िन्दगी इक दोपहर
ढूँढता कोई नहीं; इस खेल में
आज अपने-आप से लुकना पड़ा
आज से पहले कभी चलते हुए
बोझ लगते थे न अपने पाँव ख़ुद
आज से पहले न दीखा पेड़ वह
माँगता अपने लिए जो छाँव ख़ुद
इस तरह भटके बटोही के चरण
रास्ते को हारकर रुकना पड़ा
मनीषा शुक्ला
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