तुम्हारी याद का सामान होना
सफ़र की मुश्किलें आसान होना
© मनीषा शुक्ला
16 Mar 2019
तुम्हारी याद का सामान
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Manisha Shukla,
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अशआर
14 Mar 2019
तुम ख़ुश्बू हो
तुम ख़ुश्बू हो, जिस आँचल में बिखरोगे गन्ध लुटाओगे
मेरी पंखुरियों से बँध कर केवल मुझतक रह जाओगे
इतिहास सँवारोगे या फिर आने वाला कल देखोगे
खुशियों की मांग भरोगे या ये बहता काजल देखोगे
तुम पर है, पालोगे कोई सतरंगी सपना नैनों में
या फिर काजल के घेरे में बंदी गंगाजल देखोगे
मैं भूला-भटका रस्ता हूँ, क्या पाओगे मुझ तक आकर
उस पथ को पूजा जाएगा तुम जिस पर चरण बढ़ाओगे
तुम चन्दा का सिंदूर बनो, इक माथे पर सूरज टाँको
मैं ठहरा एक जलाशय हूँ, मत मुझमें रह-रह कर झाँको
वह रेल कहीं कैसे जाए, जिसकी पटरी से यारी हो
मुझमें अटका रह जाएगा, जल्दी-जल्दी मन को हाँको
वह कुमकुम दूर कहीं, जिसका सौभाग्य तुम्हीं को बनना है
वे प्राण प्रतीक्षा में बैठे, जिनके तुम प्राण कहाओगे
मिलते हैं ये बासन्ती दुःख, सौ पुण्य फलित हों तब जाकर
जब आँगन में रोए तुलसी, पाटल झरते हैं तकिए पर
है भाग्य, अकेला खिलता है सेमल सूनी-सी डाली पर
है भाग्य, सजाए गुलमोहर फूलों के केसरिया झालर
अपने-अपने हिस्से का दुःख, सब जीते हैं, सब गाते हैं
मुझको चुननी है नागफ़नी, तुम हरसिंगार सजाओगे
© मनीषा शुक्ला
मेरी पंखुरियों से बँध कर केवल मुझतक रह जाओगे
इतिहास सँवारोगे या फिर आने वाला कल देखोगे
खुशियों की मांग भरोगे या ये बहता काजल देखोगे
तुम पर है, पालोगे कोई सतरंगी सपना नैनों में
या फिर काजल के घेरे में बंदी गंगाजल देखोगे
मैं भूला-भटका रस्ता हूँ, क्या पाओगे मुझ तक आकर
उस पथ को पूजा जाएगा तुम जिस पर चरण बढ़ाओगे
तुम चन्दा का सिंदूर बनो, इक माथे पर सूरज टाँको
मैं ठहरा एक जलाशय हूँ, मत मुझमें रह-रह कर झाँको
वह रेल कहीं कैसे जाए, जिसकी पटरी से यारी हो
मुझमें अटका रह जाएगा, जल्दी-जल्दी मन को हाँको
वह कुमकुम दूर कहीं, जिसका सौभाग्य तुम्हीं को बनना है
वे प्राण प्रतीक्षा में बैठे, जिनके तुम प्राण कहाओगे
मिलते हैं ये बासन्ती दुःख, सौ पुण्य फलित हों तब जाकर
जब आँगन में रोए तुलसी, पाटल झरते हैं तकिए पर
है भाग्य, अकेला खिलता है सेमल सूनी-सी डाली पर
है भाग्य, सजाए गुलमोहर फूलों के केसरिया झालर
अपने-अपने हिस्से का दुःख, सब जीते हैं, सब गाते हैं
मुझको चुननी है नागफ़नी, तुम हरसिंगार सजाओगे
© मनीषा शुक्ला
3 Mar 2019
बहुत कठिन है
प्यासा होना बहुत सरल है, बहुत कठिन है पनघट होना
जीवन होना बहुत सरल है, बहुत कठिन है मरघट होना
© मनीषा शुक्ला
जीवन होना बहुत सरल है, बहुत कठिन है मरघट होना
© मनीषा शुक्ला
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15 Feb 2019
इंसाफ
मैंने एक मुस्लिम कॉलेज से पढ़ाई की है। जहां 95% मुसलमान और मुश्किल से 5% हिन्दू छात्र होंगे। मेरा विश्वास कीजिए, अपने सभी सहपाठियों में मैंने उतना ही हिंदुस्तान धड़कता देखा जितना मेरे अंदर है। उनके अंदर भारतीय क्रिकेट टीम के किसी भी मैच के लिए उतना ही रोमांच देखा जितना मेरे अंदर है। ओलम्पिक में भारत के मेडल जीतने पर उनके साथ कैंटीन में चिल्ला-चिल्ला कर जश्न मनाया है मैंने। हर साल छठ पूजा का प्रसाद देकर अपनी माँ का आशीर्वाद बांटा है उनके साथ और ईद की सिवईयों से हर साल अपनी दोस्ती में चाशनी घोली है। फिर ये लोग कौन हैं? कौन हैं ये जिन्हें अपने लिए एक अलग दुनिया चाहिए? कौन हैं ये जिन्हें लगता है कि 133.97 करोड़ लोगों का ख़ून बहाकर 19.7 करोड़ लोगों की ज़िंदगी में खुशहाली लाई जा सकती है? दरअसल ये लोग, लोग है ही नहीं। ये एक भीड़ है। एक ज़िंदा भीड़। एक ऐसी भीड़ जिसकी अपनी कोई सोच नहीं। जिसे बहला-फुसलाकर इस्तेमाल किया जा रहा। एक मशीन की तरह इन्हें ऑपरेट किया जा रहा है और ये रिमोट के इशारों पर नाच रहे हैं। ये लोग किसी के नहीं हैं। न हमारे देश के न अपने वतन के। इन्हें जब मौक़ा मिलेगा, लड़ेंगे। आज हिन्दू-मुस्लिम बनके, कल शिया-सुन्नी बनके...ये लड़ते रहेंगे। जाने क्या करेंगे ये ऐसी दुनिया लेकर जहां इनके अलावा कोई होगा ही नहीं... जाने ये क्यों नहीं समझते कि अगर अल्लाह और ईश्वर अलग हों भी तब भी ऐसे पाप की कोई माफ़ी कहीं नहीं मिलेगी इन्हें, जन्नत मिलना तो दूर की बात। हिंदुस्तान वीरों का देश है, रण-बाँकुरों का देश है। इस देश में 42 की जगह 4200 सैनिक भी अगर लड़ाई लड़ते हुए अपनी जान गंवा दें तो भी हमारी आंख से एक आँसू न टपके, उनकी शहादत का जश्न अपनी जीत के साथ मनाएंगे हम, लेकिन कल जो हुआ वो "हत्या" है, शहादत नहीं। कल जो हुआ वो एक ऐसा कुकृत्य है, जिसका औचित्य किसी भी धर्म की किसी भी किताब में नहीं। कल जो हुआ वो अपराध है, जिसके लिए केवल दंड ही दिया जाना चाहिए। कल जो हुआ, उसका हमें पूरा इंसाफ चाहिए।
... मनीषा शुक्ला
14 Feb 2019
पुलवामा
शौर्य का इतिहास लिखना था हमें अपने लहू से
इसलिए हम प्रेम की गाथा अधूरी छोड़ आए
उत्सवों की आंख गीली, प्रेम का त्योहार रूठा
चाँद की चूड़ी दिलाना फिर उसे इस बार छूटा
हम कलेजे को कलेजे से लगाकर रो न पाए
मज़हबों की साज़िशों ने प्यार का संसार लूटा
पंखुरी से होंठ, उलझी लट, नए मेहंदी-महावर
काम जाने और भी कितने ज़रूरी छोड़ आए
गांव का पनघट, कहीं आँगन तरसता छोड़ आए
हम किसी की आँख में सावन बरसता छोड़ आए
छोड़ आए हम बुढ़ापे को दिलासे के सहारे
अनसुनी किलकारियां, यौवन लरजता छोड़ आए
थी बसन्ती रंग से रँगनी हमें ये ज़िंदगानी
हम प्रणय की सेज पर सपने सिंदूरी छोड़ आए
मां! तुम्हारी आंख का तारा, सितारा बन गया है
मृत्यु का अभिमान, जीवन का दुलारा बन गया है
भारती की आरती जिससे उतारी जा सकेगी
अब पिता के ख़ून का क़तरा अँगारा बन गया है
एक अम्बर में नहीं दो सूर्य शोभित हो सकेंगे
इसलिए धरती-गगन के बीच दूरी छोड़ आए
© मनीषा शुक्ला
इसलिए हम प्रेम की गाथा अधूरी छोड़ आए
उत्सवों की आंख गीली, प्रेम का त्योहार रूठा
चाँद की चूड़ी दिलाना फिर उसे इस बार छूटा
हम कलेजे को कलेजे से लगाकर रो न पाए
मज़हबों की साज़िशों ने प्यार का संसार लूटा
पंखुरी से होंठ, उलझी लट, नए मेहंदी-महावर
काम जाने और भी कितने ज़रूरी छोड़ आए
गांव का पनघट, कहीं आँगन तरसता छोड़ आए
हम किसी की आँख में सावन बरसता छोड़ आए
छोड़ आए हम बुढ़ापे को दिलासे के सहारे
अनसुनी किलकारियां, यौवन लरजता छोड़ आए
थी बसन्ती रंग से रँगनी हमें ये ज़िंदगानी
हम प्रणय की सेज पर सपने सिंदूरी छोड़ आए
मां! तुम्हारी आंख का तारा, सितारा बन गया है
मृत्यु का अभिमान, जीवन का दुलारा बन गया है
भारती की आरती जिससे उतारी जा सकेगी
अब पिता के ख़ून का क़तरा अँगारा बन गया है
एक अम्बर में नहीं दो सूर्य शोभित हो सकेंगे
इसलिए धरती-गगन के बीच दूरी छोड़ आए
© मनीषा शुक्ला
7 Feb 2019
विवशता
बालपन की लोरियों, जाओ कहीं सन्यास लेकर,
हम समय के राग पर अपनी विवशता गा रहे हैं
मीत अपने फूल थे तब, तितलियां अपनी सगी थीं
बोल मीठे बोल, कितनी कोयलें हमने ठगी थीं
बादलों से यारियां थी, चाँदनी पक्की सहेली
रोज़ नानी की कहानी में वही संग-संग जगी थीं
अब ज़रूरत चरखियाँ हैं, देह अपनी हैं पतंगें,
काल का उलझा हुआ मांझा सभी सुलझा रहे हैं
हम समय के राग पर अपनी विवशता गा रहे हैं
मीत अपने फूल थे तब, तितलियां अपनी सगी थीं
बोल मीठे बोल, कितनी कोयलें हमने ठगी थीं
बादलों से यारियां थी, चाँदनी पक्की सहेली
रोज़ नानी की कहानी में वही संग-संग जगी थीं
अब ज़रूरत चरखियाँ हैं, देह अपनी हैं पतंगें,
काल का उलझा हुआ मांझा सभी सुलझा रहे हैं
साथ चलने के लिए अब मांगते हैं ब्याज साए
हर सुबह केवल हमारी नींद ही हमको जगाए
हम सितारे पीसकर मेहंदी रचाना चाहते थे
बस इसी उम्मीद में हमने कई सूरज बुझाए
ठोकरों की राह में है टूट जाता हर खिलौना,
हम यहां पर आंख में सपने लिए इठला रहे हैं
हर सुबह केवल हमारी नींद ही हमको जगाए
हम सितारे पीसकर मेहंदी रचाना चाहते थे
बस इसी उम्मीद में हमने कई सूरज बुझाए
ठोकरों की राह में है टूट जाता हर खिलौना,
हम यहां पर आंख में सपने लिए इठला रहे हैं
एक टुकड़ा ज़िंदगी पर रोपते अरमान कितने
प्रश्नपत्रों सी हँसी, आंसू हुए आसान कितने
प्यास है तेज़ाब की, पर कोसते हैं बारिशों को
उम्र के इस मोड़ पर हम हो गए नादान कितने
रोज़ नदियों ने हमारे द्वार पर आ प्राण त्यागे,
हम मसानों के लिए गंगाजली भरवा रहे हैं
प्रश्नपत्रों सी हँसी, आंसू हुए आसान कितने
प्यास है तेज़ाब की, पर कोसते हैं बारिशों को
उम्र के इस मोड़ पर हम हो गए नादान कितने
रोज़ नदियों ने हमारे द्वार पर आ प्राण त्यागे,
हम मसानों के लिए गंगाजली भरवा रहे हैं
© मनीषा शुक्ला
1 Feb 2019
सुरूर
नया-नया सा सुरूर है वो, अभी नया है कमाल उसका
अभी नज़र में वही रवां है, अभी नया है जमाल उसका
न रात गुज़रे, न चाँद भाए, न नींद आए, न जान जाए
अभी जगाएगा रात भर वो, अभी नया है ख़याल उसका
अभी नज़र में वही रवां है, अभी नया है जमाल उसका
न रात गुज़रे, न चाँद भाए, न नींद आए, न जान जाए
अभी जगाएगा रात भर वो, अभी नया है ख़याल उसका
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