14 May 2019

चोट खाना सीखते हैं

देखकर कोई सहारा लड़खड़ाना सीखते हैं
इक उमर में फूल से सब चोट खाना सीखते हैं

© मनीषा शुक्ला

2 May 2019

बीमार सोच

अभी-अभी एक वीडियो देखी। जिसमें एक अधेड़ उम्र की महिला कुछ 20-25 साल की लड़कियों को अपने अनुभव की आंच पर पकी सीख दे रही है कि उन्हें "ढंग" के कपड़े पहनने चाहिए, अन्यथा महिलाओं के साथ होने वाली वारदातें जैसे बलात्कार आदि और भी ज़्यादा होंगे। वीडियो में लड़कियां महिला की इस बीमार सोच का पुरज़ोर विरोध करती दिख रही हैं। बहरहाल, महिला का तर्क उचित है या नहीं, इस पर कुछ कहने से पहले मैं इतना अवश्य कहना चाहूंगी कि वीडियो में लड़कियों द्वारा महिला के साथ किया गया व्यवहार देखकर बहुत निराशा हुई। ये वीडियो देखकर मुझे अनायास ही वो दिन याद आ गए जब मेरी माँ मुझे दुपट्टा ढंग से लेना सिखाती थी, इसलिए नहीं कि यदि मैंने दुपट्टा ढंग से लेना नहीं सीखा तो मेरे साथ कुछ ग़लत हो जाएगा, बल्कि इसलिए क्योंकि पुरुष और स्त्री की शारीरिक संरचना(केवल शारीरिक संरचना) का अंतर वह बख़ूबी जानती थी और मुझे भी वही समझाना चाहती थी। कई बार दिमाग़ की नसों पर पर्याप्त ज़ोर डालने के बाद भी मैं ये नहीं समझ पाती कि ऐसी कौन सी स्वतंत्रता है जो कपड़े उतारने से मिलती है? ऐसी कौन सी समानता है जो हम महिलाएं पुरुषों की नकल कर के हासिल करना चाहती हैं? मैं कभी भी पाश्चत्य परिधानों के विरोध में नहीं रही। न ही कभी पर्दे का समर्थन किया। मैं तो हमेशा से मानती हूँ कि अपने शरीर को कितना ढकना है, कितना दिखाना है, ये निर्णय मेरा होना चाहिए। मग़र मैं ये भी जानती हूँ कि ये निर्णय मेरे कम्फर्ट, मेरी सहूलियत के हिसाब से होना चाहिए। न कि दूसरों की दृष्टि में अपनी स्वतंत्रता या समानता सिद्ध करने के लिए। "महिलाओं को ये समझना चाहिए कि यदि कम कपड़े पहनना आपका अधिकार और स्वतन्त्रता है, तो आपको घूरने की हद तक घूरना पुरुषों की क्षमता और सामर्थ्य। अपनी वेश-भूषा, अपना व्यवहार ऐसा रखें कि करना चाहें या न करना चाहें, आपका सम्मान करना पुरुषों की विवशता बन जाए।" 

© मनीषा शुक्ला

26 Apr 2019

धरती की मनुहार

कितने सारे पनघट रीते, कितनी ही नदियां हार गईं
लेकिन बादल के कानों तक, कब धरती की मनुहार गई?

© मनीषा शुक्ला

22 Apr 2019

परिचय

फिर मिले या मिल न पाए, जग! तुझे दीपित अँधेरा
मांग! परिचय मांग मेरा!

सूर्य से पहले जली हूँ, चाँद से पहले ढली हूँ
चूमकर पदचिन्ह अपने, नाश पथ पर मैं चली हूँ
मैं सृजन का वंश हूँ, मैं ही प्रलय की उत्तरा हूँ
सेज पर अंगार के सोई हुई मादक कली हूँ
प्राण में मेरे पलेगा मृत्यु का कोई चितेरा
मांग! परिचय मांग मेरा!

वेदना का मोल पाकर, पीर की टकसाल होकर
मैं सदा फूली-फली हूँ आंसुओं के बीज बोकर
एक जुगनू सा अकेला जल रहा मुझमें दिवाकर
जागते मुझमें गगन के दीप सारी रात सोकर
रोज़ मेरे नैन का काजल उगलता है सवेरा मांग!
परिचय मांग मेरा!

है ह्रदय में आग बाक़ी, मेघ नैनों में सँवरते
कंठ में पीड़ा बसी है, गीत अधरों पर उतरते
पीर का यह गाँव मैंने ही बसाया है, अभागे!
दो घड़ी सुख-चैन जिसकी छांव में आकर ठहरते
सृष्टि सारी मांगती जिस टूटते घर में बसेरा
मांग! परिचय मांग मेरा!

© मनीषा शुक्ला

17 Apr 2019

महावीर जयंती

प्रेम से पीर धोना कठिन है बहुत
पीर में धीर होना कठिन है बहुत
त्याग से विश्व को जीतने के लिए
फिर महावीर होना कठिन है बहुत

© मनीषा शुक्ला

11 Apr 2019

तुम्हारे प्यार की मीठी रसीदें याद हैं अब भी



तुम्हारे साथ की शॉपिंग, ख़रीदें याद हैं अब भी
बिछड़ कर साथ रहने की उम्मीदें याद हैं अब भी
कभी थामा था तुमने हाथ मेरा हाथ में लेकर
तुम्हारे प्यार की मीठी रसीदें याद हैं अब भी

© मनीषा शुक्ला

26 Mar 2019

मंदोदरी की पीर

राम, रावण मारने को अब अगर आना धरा पर
दो घड़ी मंदोदरी की पीर से आँखे मिलाना

देखना वैधव्य पाकर तेज पर क्या बीतती है
द्वंद में पुरुषार्थ के देखो त्रिया क्या जीतती है
पुण्य को क्या-क्या मिला है, पाप की सहधर्मिणी बन
पूरने को हठ समंदर के नदी ही रीतती है
सौंप देना पत्थरों को जब समंदर के हवाले
हो सके तो बूंद भर उस नीर से आँखें मिलाना

एक जीवित माँ मिलेगी लाख पूतों के शवों पर
भाग्य पर रोते मिलेंगे हर जगह बिछुए महावर
मौन की चीत्कार बनकर लोरियां गाती मिलेंगी
देखना दुर्भाग्य सूनी गोदियों के साक्ष्य बनकर
तार आए हो अहिल्या, मृत शिला में प्राण भरकर
अब ज़रा जीवित शिला के धीर से आँखे मिलाना

जय पराजय हो किसी की, फ़र्क़ क्या विध्वंस तय था
हर किसी की देह में बस काठ का शायद ह्रदय था
धर्म ने जब रक्त का टीका लगाया भाल पर, तब
थम गया रण, चूड़ियों के टूटने का वह समय था
सातिए, तोरण सजाते द्वार पर जिसके विभीषण
उस किले की चीखती प्राचीर से आंखे मिलाना

© मनीषा शुक्ला