7 Nov 2019

गीत मेरे



गीत मेरे किसी से न कहना कभी
दर्द इतना बढ़ा हिचकियाँ बंध गईं
शब्द में ढल गया जो वही है बहुत
बस उसी से कई सुबकियां बंध गईं

इक रंगोली सजाने नयन द्वार पर
रातभर आंसूओं से है आंगन धुला
इक पहर जुगनुओं को सुलगना पड़ा
तब कहीं एक रश्मि का घूंघट खुला
दिख रहें हैं सभी को चरण राम के
पत्थरों में कई देवियां बंध गईं

जीतने की सहजता सभी से मिली
हारने की कसक अनछुई ही रही
मुस्कुराहट बनी मीत सबकी यहां
और पीड़ा सदा रह गईं अनकही
मौन के आखरों को लिए गर्भ में
उँगलियों में कई चिट्ठियां बंध गईं

नैन मूँदें तुम्हें देखकर हर दफ़ा
भावना ने हमेशा पुकारा तुम्हें
वो सहज तो हमें भी कभी ना हुआ
जो कठिन से हुआ था गंवारा तुम्हें
घर का सौहार्द बच जाए इस चाह में
क्यारियों में कई तुलसियाँ बंध गईं

© मनीषा शुक्ला

4 Nov 2019

ह्रदय चढाऊँ, तब मानोगे?

श्रद्धा की अनदेखी करके
अपना ही उपहास किया है
ईश्वर होकर लज्जित अपना
पूजन, व्रत, उपवास किया है
आँसू के कच्चे मोती का
आभूषण स्वीकार नहीं है
तो फिर तुमको पूजे जाने
का कोई अधिकार नहीं है
दरपन लेकर द्वार तुम्हारे आई हूँ, कब पहचानोगे ?
ह्रदय चढाऊँ, तब मानोगे?

प्रेम अगर परखा जाए तो
अग्नि-परीक्षा भी सह लेगा
और किसी तुलसी के मुख से
ख़ुद को, दुनिया से कह लेगा
लेकिन प्रश्न करेगा निश्चित
हर रघुकुल के सिंहासन से
किस धोबी का, कैसा हित था
एक सिया के निर्वासन से?
तन सोना है, मन है लोहा, पीर पराई क्या जानोगे ?
ह्रदय चढाऊँ, तब मानोगे?

कौन प्रमाण दिया करता है
प्राणों को जीवित होने का?
कैसे भोर छिपाए ज़ेवर
सूरज के पीले सोने का?
रजनीगंधा, देह चुरा ले
सबकुछ फिर भी गन्ध कहेगी
उगता हो या ढलता चंदा
किरण हमेशा किरण रहेगी
रातों से अंधियारा, दिन से धूप भला कैसे छानोगे ?
ह्रदय चढाऊँ, तब मानोगे?

आज अगर ठुकराओगे, कल
आलिंगन से मर जाएगा
और अगर ज़िद पर आया तो
जो कहता है, कर जाएगा
प्यासी धरती पर बरसेगा
तब सावन का सानी होगा
वरना बारिश का हर क़तरा
केवल पानी-पानी होगा
जब माटी का मोल न होगा, किसको जीवन वरदानोगे ?
ह्रदय चढाऊँ, तब मानोगे?

©मनीषा शुक्ला

3 Nov 2019

ख़्वाब

हमें आए भला अब नींद कैसे
हमारा ख़्वाब मुमकिन हो रहा है

© मनीषा शुक्ला

17 Oct 2019

घुला है चाँद पानी में

न सोचो रोशनी का बुलबुला है चाँद पानी में
ये आंखें ख़ूब रोईं, तब धुला है चाँद पानी में
नहीं रंगत निखरती है कभी भी झील की यूं ही
किसी ने धो लिया चेहरा, घुला है चाँद पानी में

©मनीषा शुक्ला

16 Oct 2019

उत्तर में अभियोग



औषधियों की काया से ही तन को भीषण रोग मिलेगा,
जिज्ञासा ने प्रश्न किया तो उत्तर में अभियोग मिलेगा !

©मनीषा शुक्ला

12 Oct 2019

न झुकती हैं, न मिलती हैं, तमाशा ख़ूब करती हैं

मुहब्बत के ठिकानों को, तलाशा ख़ूब करती हैं
ज़रा सी बात को नज़रें तराशा ख़ूब करती हैं
झलक भर देख कर तुमको, तरसती हैं निगाहें पर
न झुकती हैं, न मिलती हैं, तमाशा ख़ूब करती हैं

©मनीषा शुक्ला

4 Oct 2019

तब तक प्यार किया जाएगा

गन्ध रहे जब तक फूलों में,
जब तक भौरों में यौवन है;
प्यास बचे जब तक धरती में,
जब तक बादल में सावन है;
जब तक मन में पीर रहेगी,
और नयन में होगा पानी,
जब तक सांस न भूले सरगम,
और न भूले रक्त रवानी;

एक किसी का इंगित पाकर, सबकुछ वार दिया जाएगा;
तब तक प्यार किया जाएगा!

दीपों का आमंत्रण पाकर,
शलभों को अमरत्व मिलेगा;
पंचतत्व निर्मित काया में,
प्रेम छठा इक तत्व मिलेगा;
बादल की पूँजी है पानी,
प्यास किसी चातक का धन है;
तब तक यह अनुबन्ध रहेगा,
जब तक प्राणों में कम्पन है;

आँसू को पंचामृत कहकर, सब सत्कार किया जाएगा;
तब तक प्यार किया जाएगा!

प्रेम बिना कैसे रह पाए,
जो 'मन' लेकर जग में आए;
चाहे विषधर कण्ठ लगाए,
चन्दन, चन्दन ही कहलाए;
पूरी रात जलेगा फिर भी,
चाँद सुबह शबनम ही देगा;
प्रियतम दुःख देता हो, दे दे,
जितना देगा, कम ही देगा;

फूलों से काँटों की नीयत का उपचार किया जाएगा;
तब तक प्यार किया जाएगा!

देह अगर, छूकर बढ़ जाए,
प्रेम-समर्पण बन जाता है;
एक यही पाने को ईश्वर,
ख़ुद भी धरती पर आता है;
नारायण दुनिया की ख़ातिर,
राम, कभी घनश्याम रहेंगे;
तुलसी के चरणों में लेकिन,
केवल शालिग्राम रहेंगे;

जब तक भी ब्रम्हा की रचना में विस्तार किया जाएगा;
तब तक प्यार किया जाएगा!

©मनीषा शुक्ला