22 Jan 2021

रास्ते को हारकर रुकना पड़ा

आज पहली बार नीचा है गगन
आज पहली बार है झुकना पड़ा

आज से पहले कभी ऊँचाइयाँ
सिर उठाने पर नहीं थी कम पड़ी
देहरी ने की नहीं अवमानना
द्वार पर तोरण लिए हरपल खड़ी
आज तन सम्मान से दूना हुआ
इसलिए अभिमान से चुकना पड़ा

आज से पहले सदा परछाइयाँ
क़द बढ़ाती थीं क़दम को चूमकर
दिन चढ़े, सूरज ढले या रात हो
हो गई अब ज़िन्दगी इक दोपहर
ढूँढता कोई नहीं; इस खेल में
आज अपने-आप से लुकना पड़ा

आज से पहले कभी चलते हुए
बोझ लगते थे न अपने पाँव ख़ुद
आज से पहले न दीखा पेड़ वह
माँगता अपने लिए जो छाँव ख़ुद 
इस तरह भटके बटोही के चरण
रास्ते को हारकर रुकना पड़ा

मनीषा शुक्ला


20 Jan 2021

सुख का कोई योग नहीं है

हम-तुम एक धरा पर फिर भी मिलने का संयोग नहीं है
प्रेम गणित है ऐसा  जिसमें सुख का कोई योग  नहीं  है

दूरी जिससे कम हो जाए ऐसी कोई राह नहीं है
और तुम्हारे बिन मंज़िल से मिलने की भी चाह नहीं 
पत्थर का सीना पिघलाए फूलों में वो आह नहीं है 
आज मरें हम, कल मर जाएं, दुनिया को परवाह नहीं 

बादल से सावन, सागर से मोती, नदियों से गंगाजल
सारे जल-जीवन में केवल 'आँसू' का उपयोग नहीं है

साँसों का संगीत जिन्हें लगता है धड़कन की मजदूरी
मृगछौने से ज़्यादा प्यारी होती है जिनको कस्तूरी
कैलेंडर बदले जाने को हैं जिनके दिन-रात ज़रूरी
रंग महज़ लगती है जिनको दुल्हन जैसी साँझ सिंदूरी

उनको ही तो मुस्कानों का सारा क़ारोबार फलेगा 
जिनकी आँखों के पानी का पीड़ा से उद्योग नहीं है 

हमने ख़ुद अपने आँचल पर काँटों को अधिकार दिया है
हमने पीड़ा से ही केवल पीड़ा का उपचार लिया है
प्रेम-कथा में अपने हिस्से आया हर क़िरदार जिया है
हम हर दुःख के अधिकारी हैं, आख़िर हमने प्यार किया है

हम दोनों के पास नयन हैं, हम दोनों ने सपनें देखें
हम दोनों ने प्रेम किया है, जग पर कुछ अभियोग नहीं है

©मनीषा शुक्ला



6 Jan 2021

सच बोल देता है

 रहे ख़ामोश राही, क़ाफ़िला सच बोल देता है

सदा मंज़िल पे आके रास्ता सच बोल देता है 


©मनीषा शुक्ला




1 Jan 2021

नया साल


उदासी और मायूसी पुराना फ़लसफ़ा बदले
गुलों के रंग बदले तो कभी गुलशन हवा बदले
नए इस साल से कहना पुराने साल बस इतना
अगर कुछ ख़्वाब तोड़े तो हक़ीक़त भी ज़रा बदले

©मनीषा शुक्ला

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26 Dec 2020

नींद के साथ सफ़र कौन करे

सीलते घर में गुज़र कौन करे
जागकर रोज़ सहर कौन कर
इसलिए ख़्वाब ने बदली राहें
नींद के साथ सफ़र कौन करे




©मनीषा शुक्ला

24 Dec 2020

किसी ने देखा टूटा चाँद

किसी ने देखा टूटा चाँद
अम्बर के कोने में सिमटा रूठा-रूठा चाँद

चिंगारी से रूठ गया हो जैसे घर का चूल्हा
मुझसे रूठ गया है चँदा ज्यों दुल्हन से दूल्हा
लाड़ लड़ाऊँ या फिर ख़ूब सुनाऊँ मीठा-कोसा
या उसके माथे पर रख दूँ इन आँखों का बोसा

दुनिया के हिस्से में आए मेरा जूठा चाँद!


पूरा, आधा और कभी तो दिखता है चौथाई
और कभी ग़ुम हो जाता; बदली की ओढ़ रज़ाई
ऐसे साजन से कोई भी कैसे प्रीत लगाए
इक पल में 'साथी'; दूजे पल में 'मामा' बन जाए

तीजे पल पलने में खेले चूस अँगूठा चाँद !

इतनी सी थी बात इसी पर रूठा है हरजाई
सबसे आँख बचाकर मिलने छत पर रात न आई
क्या बतलाऊँ, घात लगाए बैठा था ध्रुव तारा
मैंने जल्दी में उसको ही 'मेरा चाँद' पुकारा

सचमुच ही तबसे गुस्सा है झूठा-मूठा चाँद !

©मनीषा शुक्ला

4 Dec 2020

किसान

हमारी भी सुन लो सरकार
खेतों के हल सड़कों पर उतरे बनकर हथियार

हम खेतों में सपने बोया करते हैं नेताजी
ख़ून-पसीने से लगती है हार-जीत की बाज़ी
भाषण सुनकर एक निवाला भी जो धरती देती
धरती के हर टुकड़े पर होती वोटों की खेती

लेकिन माटी पर चलते हैं मेहनत के औज़ार


एक फ़सल से एक पराली तक की कितनी दूरी
हो जाएगा कब बड़की बिटिया का ब्याह ज़रूरी
कब गेहूँ की बाली में सोने के फूल खिलेंगे
जाने कब वापिस लाला से गिरवी खेत मिलेंगे

हम कैलेंडर में पढ़ते हैं बस ये ही त्योहार

उस हरिया को भी तुमने आतंकी बतला डाला
पंचायत में जिसने तुमको पहनाई थी माला
धरती के बेटों पर तुमने फव्वारा चलवाया
देह गली माटी की, उस पल पानी बहुत लजाया

फिर कहते हो; तुम भी हो माटी की पैदावार


© मनीषा शुक्ला